सफर जारी है.....९८८
०९.०७.२०२२
मानुष से भले पशु.....
सा विद्या या विमुक्तये, विद्या हमें ज्ञानवान बनाती है, पशुता से दूर रखती है, हमें सच्चे अर्थों में मानव बनाती है। विवेक और बुद्धि हमें पशुता से बचाए रखते हैं, पाशाविकता से दूर रखते हैं,हममें मानवीयता का विकास करते हैं, मानुष और पशु के बीच रेखा खींचनी हो तो सबसे पहले पढ़ाई की बात की जाती है,व्यवहारिकता की बात हो तो कहा जाता है कि मनुष्य होते सोते इतनी तमीज भी नहीं कि बात कैसे की जाती है, यदि कोई ज़्यादा ही कांय कांय करें तो कह दिया जाता है कि निरे पशु हो क्या, कोई खाना खाते समय चपर चपर आवाज़ करे तो उसे भी टोक दिया जाता है कि मानुस की तरह रहा कर ।तो इसका सीधा सीधा अर्थ यही निकलता है न कि मानुष और पशु में भेद होता है, मानुस पशु से श्रेष्ठ है, यह श्रेष्ठता विवेक के कारण है। हमें जीवन में पशुता से उठ कर मानवता तक जाना है, निरंतर प्रगतिशील होना है तभी हमारा मानव होना सार्थक होगा।
अब सच यह है तो मुहावरे, लोकोक्ति और व्यंजना में पशुओं के आचरण को क्यों मानक मान लिया जाता है ?कुछ नमूने देखो जरा.... कुत्ता तक बैठता है तो पूंछ से जगह झाड़ कर बैठता है, गाय सा सीधापन हर मां अपनी बेटी पर आरोपित कर लेती है, कोयल की कूक की मधुरता का कोई सानी नहीं, कुत्ते की स्वामीभक्ति से भला किसको इंकार होगा , शेर सा वीर बालक सबको चाहिए ही पर बलि का बकरा बनने ,बकरी की मिमियाहट, बकरी से क्यों मिमियाते हो,बिल्ली की खिसआहट, खिसआनी बिल्ली खंभा नोचे, बंदर की घुड़की से भला कौन डरता है,कुत्ते का भों भों भौंकना, भैंस सी मोटी खाल, तोते सी रतंत विद्या, कौए की कांव कांव, चूहे की कुतराहट, भैंस की डकराहट, मेढक की टर्राहट, गधे की रेंकाहट , रंगा सियार, सांप सी टेढ़ी चाल , गधे सी बेवकूफी, उल्लू की सी मूर्खता, मेढकी का जुकाम, चील के झपट्टे और चील के घोंसले में मांस रखने से सबको परहेज है , बन्दर बांट कोई नहीं चाहता,पर मां बच्चे के लिए गाय सी रंभाती है, न्याय सबको नीर क्षीर विवेकी हंस सा चाहिए, प्रसन्नता में मन मयूर सा नाच उठता है, चीते की सी तत्परता भला किसे पसंद नहीं, बैल की श्रम शीलता, चींटी सी निरंतरता , चूहे का शेर का जाल काटना यानी जहां काम आबे सुई कहा करे तरवार, कबूतरों का शांति दूत बनना और एकता के साथ जाल लेकर उड़ जाना भला किसको पसंद नहीं आता। कभी कभी तीतर के हाथ बटेर भी लग जाती है और ऊंट पहाड़ तले आ जाता है तो कभी ऊंट के मुंह में जीरा रख दिया जाता है।
बचपन से इन पशु पक्षियों के मध्य ही तो मानुष रहता है , चिड़िया उड़ कौआ उड़ खेलता है, गाय हमारी माता है, हमको सब कुछ आता है। गाय , कुत्ता, बिल्ली,घोड़ा, ऊंट , हाथी जैसे पालतू पशुओं पर निबंध लिखता है,उनकी उपयोगिता जानता है, घोड़े की शक्ति से परिचित होता यह भी सीख लेता है कि घास और चने में बहुत शक्ति होती है ,गाय घास भूसा चरी खली खाकर पौष्टिक दूध देती है । ऊंट, घोड़ा, भैंसा गाडी में जोते जाते हैं, गधे बोझा ढोते हैं तो हाथी ऊंट की सवारी की जाती है, घोड़ी के अभाव में दूल्हे राजा की बारात की शोभा नहीं होती। चूहा गणेश का वाहन है तो मोर कार्तिकेय का, वृषभ नंदी शिव का तो शेर दुर्गा का, लक्ष्मी उलूक पर विराजती हैं तो माता सरस्वती हंस पर। मृत्यू के देवता यमराज को भैसे की सवारी रास आती है तो कन्हाई को धौरी श्यामा गाय पसंद है।
इन पशुओं से नाते रिश्ते भी जोड़ लिए गए हैं गाय माता तुल्य है, वह अमृत तुल्य दुग्ध का पान कराती है बिल्ली मौसी है तो बन्दर मामा। फिर पशु तो मनुष्य के सबसे अधिक नजदीक हैं। कभी कभी तो पशु की अन्य जीवो के प्रति ममता मानवों के लिए मिसाल बन जाती हैं। कैसे कहें कि पढ़ने से ही मानवता आती है। पशु तो बिना पढ़ाई के भी सहृदय होते हैं, बिना छेड़े वह भी नहीं काटते। अपनी रक्षा के लिए भौंकते जरुर हैं। अब प्राण रक्षा तो उनका भी धर्म है। तो सच यह नहीं कि पशुओं में पाशविकता होती है और ऐसा है भी तो वह उनका स्वभाव है। पर मनुष्य विवेक शील होकर ,विद्यावान होकर भी यदि पशु जैसा आचरण करें तो उसे किस श्रेणी में रखा जाए। पशु पशु होकर भी मानव के साथ मित्रता निभाने का बूता रखता है पर मनुष्य अपना सारा विवेक खो पशुवत आचरण करता है, इससे बड़ा दुर्भाग्य मानव जाति का क्या होगा।