सफ़र जारी है.....1077
29.09.2022
उपासी हो क्या सबरी.....
आश्विन अमावस्या यानी श्राद्ध पक्ष के समाप्त होते ही त्योहारी सीजन शुरू हो जाता है। शारदीय नवरात्रि से प्रारंभ होकर दशहरा, कार्तिक माह लगते ही करवा चौथ, अहोई अष्टमी, पंच दिवसीय दीपावली त्यौहार, देवोत्थान एकादशी से लेकर देवशयनी एकादशी तक कितने कितने त्योहार हैं जिनके ब्याज से ईश पूजा और व्रत उपवास संभव होते हैं । चातुर्मास को छोड़ लगभग हर माह में कोई न कोई त्यौहार अवश्य होता है जिसमें कथा कहानी, पूजन और उपवास की स्थिति होती है। और तो और सप्ताह के सातों दिन भी किसी न किसी देव इष्ट को समर्पित हैं। सोम शिवजी, मंगल हनुमान जी, बुध गणेश, गुरुवार साई, शुक्र देवी, शनि शनि देवता और रवि सूर्य भगवान को। यूं तो पूजा पाठ किसी एक वर्ग के हिस्से नहीं आते, इस पर छोटे से लेकर बड़े और गरीब से लेकर अमीर सभी का साझा अधिकार है पर आधी आबादी इसमें अधिक विश्वासी है। शायद उसकी आस्था अधिक प्रबल है या उसे अपने आराध्य पर अधिक विश्वास है कि इनकी शरण में जाओ, सब ठीक ठाक हो जायेगा, इन्हें ही दिनरात भजो, रटो, ध्याओ तो मन कहीं भटकेगा ही नहीं। सहज विश्वासी होती है इसलिए भगवान् पर अखंड विश्वास रखती हैं, उसी की पूजा उपासना में जीवन बिता लेती हैं।
आख़िर क्यों करते हैं हम पूजा, भजन, ध्यान, व्रत उपवास, क्या इसका भी कोई मनोविज्ञान है, क्या मिलता है व्यक्ति को यह सब करके, उपवास का अर्थ कया है, पूजा कैसे की जानी चाहिए। इस विषय पर सोचा कम जाता है, किया अधिक जाता है। जो जो बचपन से होते है, घर परिवार में अपने बड़ों को करते देखा है, सहज भाव से वैसा ही हम सब करना सीख जाते हैं। एक आले में भगवान् जी की मूर्ति और तस्वीर रख उन्हें नहलाते धुलाते पोशाक बदलते पुष्प हार चढ़ाते भोग लगाते टन टन घंटी बजा आरती करते, हाथ जोड ध्यान मग्न होते भजन श्लोक स्तुति गाते रामायण गीता शिव चालीसा हनुमान चालीसा दुर्गा चालीसा सुंदरकांड पढ़ते, अड़ोस पड़ोस के घरों में आए दिन सत्यनारायण कथा, भजन कीर्तन का आयोजन होते बचपन से देखा है, तो ये सब आदत में शामिल हो गया है, मंदिर देख हाथ अपने आप जुड जाते हैं, सिर श्रद्धा से झुक जाता है, प्रसाद पाने को हाथ बढ़ जाते हैं, इसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। मंदिर में प्रवेश करें और घंटा न बजाएं, उस शांत और दैवीय ऊर्जा से भरे स्थान पर जाकर मन कैसी अजब शान्ति से भर जाता है। देव प्रतिमाएं आशीष देती प्रतीत होती हैं। बचपन से इन्हीं के आगे तो सिर नवाते रहे हैं फिर चाहे शक्ति सुशील मंदिर हो, सनातन धर्म मंदिर, बलकेश्वर महादेव मंदिर अथवा लंगड़ा चौकी का हनुमान मंदिर। मंदिरों के साथ पूजा और प्रसाद का सदा से नाता रहा है तो बचपन में मंदिर जाने का एक बड़ा कारण प्रसाद में मिले बरफी, लडडू, बूंदी और गुलदाने भी रहे हैं। पूजा कैसे की जाती है, इसके लिए कोई अलग से कक्षा थोड़े ही लगती है, घर में परिवारी जनों को और स्कूल में हाथ जोड़कर आंखें बंद कर प्रार्थना करते यह भाव तो दृढ़ हो ही जाता है कि दिन की शुरुआत भगवद भजन, सबको प्रणाम करने, पैर छूने से होती है। भगवान् में अटूट आस्था आपको टूटने बिखरने भटकने से और व्रत उपवास आपको स्वस्थ बनाने में बड़ा योगदान देते हैं बशर्ते इन्हें सही रुप में ग्रहण किया जाए।
सप्ताह में एक दिन उपवास का विधान शरीर को पाचन क्रिया से अवकाश देने के लिए है न कि गरिष्ठ भोज्य पदार्थों को पचाने की अतिरिक्त शक्ति व्यय के लिए। सच तो यह है कि हमने व्रत और उपवास का सही अर्थ ग्रहण किया ही नहीं है। व्रत संकल्प का सूचक है कि आज मैं दुर्गुणों यथा झूठ चोरी चकोरी अपशब्द प्रयोग से अपने को दूर रखूंगा, ईश ध्यान में रहूंगा, भोजन से विरत रहूंगाया उसमें परिवर्तन कर अपने पाचन यंत्र को विश्राम दूंगा। पर ऐसा कहां हो पाता है, रोजमर्रा के भोजन से हटकर इन दिनों के आहार में गरिष्ठता और कैलोरी अधिक पहुंचती है और मन बार बार दोहराता है आज तो व्रत है, कुछ ज्यादा ही कमजोरी महसूस हो रही है। ये संकेत मन ही दिमाग़ को भेजता है और हम उसी भाव में जीने लगते हैं। उपासी रहना बहुत अच्छी बात है फिर चाहे वह भोजन पानी का हो या मौन रहने का, हमें शक्ति संपन्न ही बनाता है। उप का अर्थ समीप, पास और वास का अर्थ रहना बैठना है अर्थात उपवास के दिनों में हम परम पिता सर्व शक्तिमान ईश्वर के पास, उसके चरणों में उसकी दया कृपा पाने को बैठे रहते हैं।
जब हर क्षण प्रभू के ध्यान में बने रहते हैं, उसके नाम की रटन लग जाती है, राधे कृष्ण हरे कृष्ण राम राम का अजपा जप चलता है तो मन में किसी के प्रति दुर्भाव पैदा नहीं होता, किसी से बदला लेने की भावना नहीं होती। आप भगवान् से इस उस की शिकायत नहीं करते बल्कि सबके कल्याण की सबको सद्बुद्धि देने की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना से चित्त निर्मल होता हैबशर्ते उसे भाव से किया जाए। माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनवा तो चहुं दिश फिरे ये तो सुमरिन नाही।मुंह में राम बगल में छुरी से तो बात नहीं बनती। कांकर पत्थर जोड़ के मस्जिद लई बनाय, ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय भी ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता नहीं है। उसे तो सच्चे भाव से भज कर ही पाया जा सकता है। जब उसके शरणागत हो जाते हैं, सच्चे ह्रदय से उसे पुकारते है तो उसके कानों तक पुकार जाती है, वह हमें विप्पत्ति से उबारता भी है और कष्टों से बचाता भी है तो सच्चे मन से उसके पास उसके चरणों में बैठते हैंड, उप वास करते जीने, उसकी शरण में चलते हैं, उसे बजते हैं हे प्रभू मैं तेरी शरण में हूं, मेरी रक्षा करो प्रभू, मेरा कल्याण करो, सबका कल्याण करो प्रभू। सच्चे दिल से की प्रार्थना उस तक जरुर पहुंचती है, हमारी भी पहुंचेगी। शरणागत हैं प्रभू रख माम, पाहि माम, त्राहि माने। उपासी रहो तो ऐसी, हर क्षण भजे तो ऐसे। जापे कृपा राम की होई, ताले कृपा करें सब कोई