सफर जारी है...834
01.02.2022
छायावाद के स्तम्भ जयशंकर प्रसाद को पढ़ना ही पर्याप्त नहीं, उन्हें गुनना, समझ लेना और मनस्थ कर लेना जरूरी है।उनके नाटक पढ़ें, कहानी पढ़ें, काव्य संसार का अवलोकन करें अथवा उनके उपन्यास पढ़ें, वे समन्वयवाद के पोषक हैं ।उनकी कामायनी, झरना आंसू,स्कंद गुप्त,अजातशत्रु, तितली, ध्रुव स्वामिनी,आकाशदीप,काव्य और कला,चन्द्रगुप्त जैसी रचनाओं से गुजरते छोटे छोटे क्लिप,अनमोल सूक्तियाँ दिमाग में ऐसे गहरी धंसी है कि जरा चोट लगी नहीं कि एक एककर सब बाहर आने लगती हैं।
मेरी सबसे पसंदीदा रचना कामायनी है और उसमें भी ये चार पंक्तियाँ जीवन को नए दिशा दे देती है... ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है इच्छा पूरी क्यों हो मन की, एक दूसरे से न मिल सके यही विडम्बना है जीवन की।सबरा सच तो यही है कि मानव जानता तो है पर मानता नहीं।जो सोया हो उसे झकझोर कर ढोल ताशे बजाकर जगाया जा सकता है पर सोने का बहाना कर जबरदस्ती आंख मूंद कर पड़े रहने वाले को नहीं।उसके जानने इच्छा करने और क्रिया करने में कोई समन्वय नहीं है।और जहां समन्वय नहीं होता वहां सब चौपट हो जाता है। सृष्टि के विद्युत कण जो व्यस्त विकल बिखरे हों निरुपाय समन्वय उनका करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाये।हो तो खूब जाए और कोई समन्वय करना तो सीखे।दुख आता है तो उसी में बंध कर रह जाता है मानव, बिल्कुल भूल जाता है दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात।जब घनघोर अंधेरा हो तभी सुबह के होने की आहट होती है, प्रकाश की मद्धिम सी किरण फूटती है।पर हम मानुख तो अपने दुख में ऐसे डूब जाते हैं, उस सागर में ऊब चूभ करते रहते हैं कि सुख के नवल प्रभात की आहट को देख ही नहीं पाते।
नारी के जिस रूप की चर्चा प्रसाद जी करते हैं, वह अलौकिक है।नारी में श्रद्धा लज्जा जैसे गुणों का समावेश उसे निखार कर रख देता है तभी इन सूक्ष्म से दिखने वाले विषयों पर पूरे के पूरे सर्ग रच दिए जाते हैं।चिंता, आशा, श्रद्धा काम वासना लज्जा कर्म ईर्ष्या इड़ा स्वप्न संघर्ष निर्वेद दर्शन रहस्य और आनन्द पन्द्रह सर्गो में मानव जाति का इतिहास सिमट आता है।उनके तीन प्रमुख पात्र मनु श्रद्धा इड़ा मानव प्रेम और बुद्धि के प्रतीक हैं।वे लिखते हैं नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पगतल में, पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।सच नारी श्रद्धा का जीता जागता रूप ही तो है।यदि साथी पर विश्वास बना रहे तो गाड़ी कैसे संतुलित सी चलती रहती है, पीयूश स्रोत प्राप्त हो जाये तो सब समतल हो जाए,सारा ऊबड़खाबड़ पन दूर हो जाये, दूर तो सब हो जाये पर श्रद्धा तो बनी रहे, विश्वास तो कायम रहे।
आज ये विश्वास ही तो कहीं खो गया है, श्रद्धा तेल लेने चली गई है ,लज्जा किसी अंधेरी कोठरी में जाकर छिप गई है।जीवन के वे सारे जरूरी भाव जिनसे पुरुष पुरुष और स्त्री स्त्री शोभित होती आज बचे ही कहाँ है।सब एक दूसरे जैसे होना चाहते हैं, अपने अपने कर्म और दायित्व क्षेत्रों की सीमाएं तो कब की लांघ ली गई, वह लक्ष्मण रेखा तो कब कीपार कर ली गई, अब श्रद्धा लज्जा आशा आनन्द जैसे जरूरी भावों की तो बाट लग गई है।हां,काम वासना ईर्ष्या कासाम्राज्य खूब फल फूल रहा है।तो मानवता कहां से विजयी हो जाये।चिंता का प्राधान्य है सब जगह उस पहली रेखा का विस्तार तो है पर उससे मुक्त होने का कोई सार्थक श्रम नहीं दीखता।लेखक तो लिखता है और पाठकों के बीच अपनी कृति रख देता है।अब आगे का काम तो पाठकों का है कि वह उसमें से क्या चयन करता है।न हम विकल बिखरे कणों को समेट पाते हैं और न ज्ञान इच्छा क्रिया में समन्वय बिठा पाते हैं बस कामायनी को परीक्षा पास करने के लिए थोड़ा बहुत पढ़ लेते हैं, कुछ मोस्ट इम्पोडेन्ट पंक्तियों का भावार्थ याद कर लेते हैं, दो चार प्रश्नों के उत्तर कुंजी गाइड से रट लेते हैं घोटा लगा लेते हैं और बस पासिंग मार्क्स लाकर खुश हो लेते हैं।अरे प्रसाद जी का साहित्य परीक्षा में अंक लाने भर के लिए नहीं है, वह तो जीवन जीने के सूत्र हैं जिन्हें सबको बहुत कस के पकड़ना होता है।
नाटक चन्द्रगुप्त में जन सामान्य में चेतना का संचार करने वाली इन पँक्तियो से मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूंगी... हिमाद्रि तुंग श्रंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयम्प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है बढ़े चलो बढ़े चलो।अराती सैन्य सिंधु में सुवाड़वाग्नि से जलो, प्रवीर हो जयी बनो बढ़े चलो बढ़े चलो।