सफरनामा.......964
15.06.2022
सम्बन्धों के मायाजाल.......
बड़े मोहक होते हैं ये रिश्ते, ये नेह के बन्धन, ऐसे बांधते हैं, ऐसे लपेटे में लेते हैं कि गर्भ में उल्टे लटके जो बड़े बड़े वायदे भगवान जी किये थे कि बस एक बार इससे बाहर निकालो फिर तुम्हारा गुणगान करूंगा, क्षणभर भी तुम्हें नहीं भूलूंगा।पर जैसे ही धरती का स्पर्श हुआ, मां की स्नेहिल गोद और पिता का वटवृक्ष सा साया मिला, भाई बहिनों का स्नेह मिला, बाबा दादी ताऊ ताई चाचा चाची नाना नानी मामा मौसी ने दुलराया, ये संसार ऐसा भाया ऐसा भाया कि बस यहीं के हो के रह गए। फिर तो जो जो वायदे कर आये थे, उसका छटांक भर भी याद नहीं रहा।,सब का सब कपूर सा उड़नछू हो गया।
बस वह प्यारा सा घर ही दुनिया बन गया।स्कूल गये तो नये नये दोस्त बने,पर समय के बहाब में सहपाठी पीछे छूटते चले गये, मास्टर मास्टरनी भी स्कूल से कॉलेज में प्रवेश लेते वक्त की धुंध में न जाने कहाँ खो गये।अडोस पड़ोस के न जाने कितने कितने रिश्ते थे जिनसे इतना लगाव हो गया था कि इनके बिना कैसे रह सकेंगे।बचपन की सखियां जिनकी गलबाहीं डाल पैया पैया स्कूल जाते थे ,सब पीछे रह गए।नये नये सम्बन्ध जुड़ते चले जाते और पिछले न जाने किन गलियों में विलोप हो जाते।फिर एक दिन दीदी की शादी हो गई, उनका घर दूसरा हो गया तो बड़ी कोफ्त होती कि घर तो ये है दीदी का पर सब ये क्यों कहते रहते हैं ...चलो लड़की अपने घर में खुश है। तो इस घर में वे कौन सी दुखी थी।यहां तो सब अपने थे।जन्म के साथी थे।
दो दीदी की शादी और घर में भाभी आने के बाद ये तो पक्का हो गया कि लड़की की जात में जन्मे हो बेटा तो ये घर तो छोड़ना ही पड़ेगा चाहे पिनपिनाओ या भुनभुनाओ।ये गलियां ये चौबारा यहां आना न दोबारा हम तो भये परदेशी कि तेरा यहां कोई नहीं गाने की धुन पर डोली में बैठ चल दिये बाबुल के घर से ससुराल को।फिर सब पीछे छूटता रहा, समय समय पर जाते रहे पर सच तो यह था कि अब पराये तो हो ही गये थे। जमे हुए पौधे की जड़े एकदम तो दूसरी जगह नहीं जम जाती ,कुछ समय तो लगता ही है।फिर वही घर अपना हो जाता है।तो जैसे जैसे आगे बढ़ते जाते हैं, कुछ नए रिश्ते जुड़ते हैं, कुछ पिछले पक्के होते जाते हैं।जिन्हें खाद पानी न मिले, वे मुरझा जाते हैं और एक दिन दम ही तोड़ देते है।तो कुछ टूटे, कुछ से छद्म आवरण हट गया जैसे बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।कुछ मतलब के थे सो काम निकलते ही मानो किसी गुफा में जाकर छिप गये।लंबी दूरी तक वही साथ चल सके जो दिल से जुड़े थे, मानस में कहीं गहरे पैठे थे।
कितनी कितनी तह और परतें होती हैं रिश्तों और सम्बन्धों की, इस यात्रा में कितने कितने पड़ाव आते हैं, कितने साथ जुड़ते हैं,कितने बीच में छूट जाते हैं या छोड़ दिये जाते हैं।रक्त के रिश्ते, कोख के रिश्ते, परिवार के रिश्ते, ससुराल के रिश्ते,सामाजिक सम्बन्ध, दोस्ती के सूत्र, नौकरी के साथी ,ओहदे/ पद के सम्बन्ध, आभासी जगत के सम्बंध, काम काज से जुड़े परिचित अपरिचित सभी संपर्कों और सूत्रों में स्वयम को बेलाग रखना है तो थोड़ा कठिन पर यदि ये निभाव आ जाये तो जीना आसान हो जाता है।व्यक्ति से व्यक्ति का सम्बंध जुड़ा रहे, वह स्थिति सर्वश्रेष्ठ होती है।घर परिवार तो अपना होता है। वहां आप मानो न मानो पर पक्की मुहर लगी होती है।निभाना तो उन्हें होता है जिन्हें आप स्वयम चुनते हैं। और जब चुना तो निभाव की जिम्मेदारी भी आपकी ही होती है।कितने कितने लोगों के मध्य रहते आप अकेले होते हैं और अकेले होते भी हरि भाव में भरे पूरे होते हैं।जो अपने हैं वे तो हैं ही, पर जिनका साथ मिला ,उनमें भी अपनापन खोज सके तो कैसा अच्छा हो।सब नाते मतलब के ही नहीं हुआ करते।कुछ को यूं भी सहेजा जाता है।तो आये अकेले थे पर जुड़ते जुड़ते कारवां बन गया और जाएंगे जब तो अकेले ही जाना है, बाकी यहीं का यहीं छूट जाना है।जितना निभे निभाते चलो, साथ तो किसी को भी नहीं जाना होता।
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