सफर जारी है...965
16.06.2022
जो दिल खोजा आपना.......
आत्ममंथन तो कबीर बरगे लोग करते हैं जिन्हें अपनी और दुनियां की चिंता एक साथ होती है।जो कभी बीच बाजार लाठी लेकर खड़े हो जाते है, सबको नसीहत देते हैं तो कभी डांट फटकारते हैं।कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ, अब अपने घर को कोई क्यों फूंके भला तो कबीर अकेले के अकेले खड़े रह जाते हैं लेकिन अकेले ही भीड़ पर भारी पड़ते है, एक एक को चुन चुन के निशाना बनाते हैं, छूट किसी को नहीं है।कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद लई बनाए, तापर मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय कहते हैं तो माला फेरने वालो को भी नहीं बख्शते।माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख मांहि, मनवा तो चहुँ दिशि फिरे ये तो सुमिरन नाहि या बकरी पाती खात है ताकी मोटी खाल, जे जन बकरी खात हैं तिनको कौन हवाल।दैनन्दिन जीवन में कबीर इतने हाबी रहते हैं कि दुनिया से मन उचट जाए तो कबीर याद आते हैं, सुख दुख हो तो कबीर मानस पर छा जाते हैं।जीवन की नश्वरता देखनी हो तो कबीर पोथी खुल जाती है।राम को भजना हो तो कबीर, जीवन की उलटवासी में कबीर ,भजन गायें तो कबीर,दोहों में कबीर,सबद में कबीर, निर्गुनी गाने हो तो कबीर ,पूरा जगत सियाराम मय सब जग जानी की तर्ज पर कबीरमय हो गया है।
और हो भी क्यों न, कबीर हैं ही इतने सशक्त व्यक्तित्व, उनसे ही तो सीखा कि जन्म भले ही जिस परिवार में, उन्नति और तरीके के रास्ते खोजे जा सकते हैं, काम कोई छोटा बड़ा नहीं हुआ करता।रैदास जूते गांठते और कबीर जुलाहागीरी करते कपड़े बुनते उसी में से जीवन का सच ग्रहण कर लेते हैं।दास कबीर जतन ते ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया, बीनी रे बीनी चदरिया।जो मर्जी माता पिता हो उन्हें क्या करना, नीरू नीमा हों तो भले विधवा ब्राह्मणी की संतान हो तो ठीक।व्यक्ति के कर्म उसे छोटा बड़ा बनाते हैं ।हां जब अपना परिवार बसाया तो कमाल कमाली को सुयोग्य बनाया, लोई के साथ सद्गृहस्थ बने रहे, परिवार को छोड़ के ज्ञान के लिए बोध पाने के लिए इधर उधर नहीं भटके।रैदास ने तो कठौती में ही गंगा प्रकट कर दी और एक किवदन्ती बन गई कि जो मन चंगा तो कठौती बीच गंगा।
कबीर को पढ़ना नहीं गुनना और जीना होता है फिर वे बात बात पर बिना प्रयास के प्रकट होते रहते हैं।हरि भक्ति की बात हो तो प्रेम की रीत बता देते हैं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहि, प्रेम गली।अति सांकरी जामे दोउ न समाय।भजो तो मन से भजो ये माला फेरने, तिलक छापे लगाने, जोगिया वस्त्र पहनने, बार बार नहाने से भगवान मिला करते तो अब तक तो सबको मिल जाते।तुम्हारी तो भजन करने की रीत ही न्यारी है दुख में भजते हो सुख में भुला देते हो, जो हमेशा भजो, उसके ध्यान में बने बने रहो तो दुख होय ही क्यों।दुख में सुमिरन सब करें दुख में करे न कोय, जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे होय।जीवन की नश्वरता समझ लोगे तो सब अभिमान चूर हो जॉयेगा, रोज इतनो को श्मशान जाते देखते हो फिर भी समझ नहीं पाते।पत्ते से ही ज्ञान ले लो पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उडाय, अब के बिछड़े कब मिले दूर पड़ेंगे जाय।तो मिल जुल के रहो, काहे ऐंठे से रहते हो मुंह फुलाते पड़े रहते हो, कुछ साथ नहीं जाना।जिनसे रूठे मटके रहते हो उनसे मिलने के लिए भी तरस जाओगे।
तो बाबलो ,कम से कम कबीर जयन्ती पर तो उनका स्मरण कर लो।उनके दोहे ही बांच लो, निर्गुनिया गा लो...दो पल का है डेरा अकेले जाना है, ये है जोगी वाला फेरा, अकेले जाना है।संतो भाई, आई ज्ञान की आंधी, भरम की टाटी सबे उड़ाने माया रहे न बांधी ही याद कर लो।अरे उन जैसे बड़े नहीं बन सकते तो उनके अनुयायी ही बन लो।कुछ भी करो पर उनके दो चार दोहे तो जीवन में उतार ही लो।तभी नैया पार लगेगी।
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