सफर जारी है.....962
13.06.2022
खुशियां पैसों की मोहताज नहीं हुआ करती।अरे हंसने मुस्कराने में कौन पैसा लगता है।वैसे भी सब बिकाऊ ही नहीं हुआ करता।जिन्हें खुश रहना आता है वे अभाव में भी के प्रसन्न रहने के अवसर खोज लेते हैं।याद आती है उस राजा की कहानी जो बीमार हो जाता है और वैद्य जी उसके रोग का इलाज एक खुश मिजाज व्यक्ति की कमीज पहनना बताते है।खुश व्यक्ति की खोज शुरू होती है और आश्चर्य की बात तो यह निकली कि जो सदा प्रसन्न और मस्त रहता था उसके पास कमीज तो छोड़ो, फ़टे चिथड़े भी नहीं थे।वह नङ्गे वदन ही मस्त था।यदि सुख और प्रसन्नता वस्तु में होते तो अमीर तो कभी दुखी ही नहीं होते।पर सारे भौतिक संसाधनों के बाद वे बीमार दुखी और अप्रसन्न है।आरामदेह विस्तरों पर एसी कमरों में भी उन्हें नींद नहीं आती, खाने के लिए बहुत कुछ है उनके पास लेकिन भूख गायब है।जो थोड़ा बहुत खाते हैं उसे पचाने के लिए मुठ्ठी भर गोलियां फांकनी पड़ती है।वर्जिश व्यायाम की ढेरों मशीनें खरीद कर घर में ही जिम तो तैयार कर लिया गया है पर कसरत का समय ही नहीं मिलता।
भूख नींद कोई भोजन और विस्तर पर निर्भरथोड़े ही हुआ करती है।भूख में तो किवाड़ भी पापड़ लगते हैं और नींद ठौर नहीं देखा करती।जब आती है तो पत्थर पर भी आ जाती है, गर्मी सर्दी में भी आ जाती है।जिन्हें खुश रहने की आदत होती है वह हंसने मुस्कराने की कोई भी वजह खोज लेते हैं और जो रोतड़े हैं उन्हें सब कुछ होते सोते भी रोने झींकने से फुर्सत नहीं मिला करती।वे भरे गिलास पानी और परसी थाली में भी कोई न कोई नुस्ख निकाल लेते हैं।जो पास है वह आंख तर नहीं आता और पराई थाली का भात सदैव मीठा लगता है।दुखी होने के ऐसे ऐसे कारण खोज लाते हैं जिनके सिर पैर ही नहीं होते।अपना आत्मविश्लेषण करें न करें पर दूसरों के काम में नुक्ताचीनी निकालते रहते है।धीरे धीरे यह वृत्ति उनके स्वभाव का अंग बन जाती है।
अरे भाई हंसो ,खिलखिलाओ ,ठहाके लगाओ देखो मन प्रसन्न रहता है या नहीं।दुख कष्ट तो अपने रास्ते जाता है पर उसी के विषय में सोच सोच कर हम स्वयम को खूब परेशान कर लेते हैं।बिल्कुल भूल जाते हैं धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा फल तो ऋतु पर होय।और यदि हमारे रोज शोक मनाने,रोते झींकते रहने से यदि दुख वाकई में कम होते हों या मन को तसल्ली मिलती हो तो खूब रोओ,खीझो, झींको, किसी को क्या परवाह।बस तुम आप ही धीरे धीरे मन से कमजोर होते जाओगे, अच्छा सोच ही नहीं पाओगे।तो निर्भर तुम पर करता है कि तुम बड़े से बड़े दुख को कष्ट को हंसते मुस्कराते झेल जाओ या उसे पानी छिड़क छिड़क कर और बोझिल कर लो, विकल्प तुम्हारा है।जिंदगी मिली है तो उसमें फूल और कांटे दोनों होंगे ही।और जो तुम्हें ये लगता है देखो सामने वाला कितने आराम से है तो उसके कष्टों से आपका साबका नहीं पड़ा।आप किसी के लिए अपने मन में कुछ भीसोचने के लिए स्वतंत्र हैं पर वह सब सच और यथार्थ हो, यह आवश्यक नहीं होता।तो अपनी खीझ, गुस्सा ,झींकना ,हमेशा तनाव में बने रहना,चौबीस घण्टे टेन्स रहना को छोड़ो भाई, चीजें अपने आप बदलती हैं, समस्याएं उतनी बड़ी भी नहीं होती जितना हम अनुमान लगा बैठते हैं।और मान लो है भी तो मुंह सुजाये बैठे रहने से कौन कम हो जाएगी।उपाय खोजो, चिंतन करो, रास्ते निकालो ।हंसी खुशी रहो।जानते हो ये हंसना मुस्कराना समस्याओं की विकरालता को कम कर देता है और हम आसानी से उसके समाधान खोज पाते हैं।
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