सफर जारी है....961
12.06.2022
बड़ी बड़ी बातें पुस्तकों की शोभा होती हैं लेकिन जब जीवन का यथार्थ बनती हैं तो भरी सर्दी में पसीने छूट जाते हैं।सत्य की औकात पता चलती है जब राहगीर भी व्यंग्य कस देता है देखो ये बड़े सत्यवादी बनने चले हैं ।अरे भाई तब सतयुग था तो हरिश्चन्द्र की वक़त थी, अब जहां चोर चोर मौसेरे भाई हों ,सब आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हों तब सत्य का उद्घोष करना मजाक सा लगता है।एक तरफ पहरेदार को जागते रहो की ड्यूटी पर लगा दो और दूसरी तरफ चोरों को घर का रास्ता दिखा दो।कक्षा में सच्चा बालक की कहानी पढाओ और जब बालक सच बोले तो उसे कहो सच के जमाने लद गये, अब ऐसा नहीं होता।दूध में पानी मिलाए बिना घोसी का काम नहीं चलता, सौ में दस झूठ मिलाना तो सामान्य बात है।जब सोना ही चौबीस कैरट शुद्ध नहीं होता तो बाकी का क्या।
सदा सत्य बोलो की खुश्कत और इमला तो खूब लिखवाई जाती रही, पाठ के प्रश्न उत्तर रटाये जाते रहे, सही लिखने पर झोली भर अंक दिए जाते रहे लेकिन जैसे ही उसे व्यवहार में लाना शुरू किया ,सबकी नजर ही बदल गई।अब कहा जाने लगा किताबी पढाई और जीवन जीने के अंतर को पाटा नहीं जा सकता।नियम हमेशा दूसरे के लिए होते हैं और अपवाद अपने और अपनों के लिए।क्यों भाई ये कौन सा गणित है।अभी तो सिखाया था दो और दो चार होते हैं और अब पार्टी बदलते ही दो और दो पांच कैसे हो गए, काली कामर पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता पर यहां तो सब रंग चढ़े जा रहे हैं।कल जब तक बेटी ब्याहनी थी ,नियम आदर्श कुछ और थे और अब घर में बहू के लिए सब नियम पलटा खा गए।ये तो कोई बात नहीं हुई मित्रो।ये तो सरासर चालबाजी है।अब ऐसे कितने दिनों तक बात को मूंद कर रखोगे, कभी न कभी तो भंडाफोड़ हो ही जायेगा।याद रखो
काठ की हांडी चूल्हे पर बार बार नहीं चढ़ा करती।अरे भाई सच को कब तक परदों में छिपाए रखोगे।सच तो सूर्य सा दीप्त होता है।सारे अंधकार को चीर कर सामने आ जाता है।वह किसी के रोके नहीं रुकता।
लाख कहते रहो तुम कि अब जमाना बदल गया है पर कान खोल के सुन लो बाबू, नैतिक मूल्य तो शाश्वत होते हैं, उन्हें
अदला बदला नहीं जा सकता।अरे झूठ के पैर नहीं होते तो नहीं होते, वह क्या और कैसे टिकेगा सत्य के आगे।हां, इतना सच है कि सत्य हारे न हारे पर परेशान बहुत होता है।अधैर्यशाली जल्दी साहस छोड़ देते हैं, जल्दी से पाली बदल लेते हैं और मोहक असत्य की टीम में जा खड़े होते हैं । सत्य को दुत्कारते और धता बताने लगते हैं।अब चमकना है तो तपना होता है, सोना आग में तप कर ही कुंदन बनता है।जब निखरना है तो मुसीबत से भय क्यों खाते हो, जल्दी से हाथ पैर क्यों छोड़ देते हो, हाय हाय क्यों करने लगते हो।ऐसे क्या मोम के बने हो जो जरा सी गर्मी पाते ही पिघल जाओगे।मजबूत बनो, कठिनाइयों से भागो मत, उन्हें फेस करना सीखो, उनका सामना करो, रास्ते खोजो, उपाय सोचो।ये क्या कि जरा सी मुसीबत आई नहीं कि फें फें रोना शुरू कर दिया, हाथ फैलाये सहायता मांगने चल दिये नहीं तो काम बीच में ही छोड़ के भाग आये कि हमसे नहीं होगा भाई, हमारे बूते का नहीं है।अरे दूसरा तीसरा जो भी करेगा उसके क्या चार हाथ पैर होंगे, उसके पास दिन में चौबीस घण्टे से अधिक का समय होगा।नहीं न, वह भी तुम्हारे जैसा मानुस ही होगा।बस फर्क इतना है कि तुमने हथियार डाल दिये हैं और अगले ने हौसला छोड़ा नहीं है।
सच की ताकत आजमा कर तो देखो पर सच निखालिस सच होना चाहिए, कोई मेल मिलावट नहीं, कोई धोखाधड़ी नहीं, कोई बेईमानी नहीं।बस सच्चे मन से शुद्ध मन से अपना काम किये जाओ, देर सबेर सफलता मिलेगी जरूर।।
आज मिलने आये युवा प्राध्यापको की आंखों में भविष्य के सपने बहुत साफ दिखे। बस उनकी लगन धीमी न पड़ जाए।वे थोडे कष्ट मुसीबत आते ही हाय हाय न करने लगे, अपने लक्ष्य से दूर न हो जाये, सत्य पर डटना जरूरी है।पूरी कायनात आपको डिगाने में सारी शक्ति लगा देगी।देखना है उनके साहस को, शक्ति को, धैर्य को, लगन को कि वे कितनी दृढ़ता से सब अलाय बलाय का सामना करते हैं।बस आंच कभी नहीं होती।सत्य परेशान हो सकता है पर अंततः विजयी होता ही है।
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