सफर जारी है....936
16.05.2022
जीवन जैसा भी हो ,उसे जीना होता है।कुछ लोग जीते हैं और कुछ इसे काटते सा हैं।जब पूछो कैसे हो भाई तो घिसा पिटा सा एक ही जबाब मिलता है बस समय काट रहे हैं।और जो पूछो भाई क्या हुआ तो उनके पास मौसम से लेकर तबियत तक की इतनी शिकायतें होती हैं कि कई बार भरम हो जाता है ये मुसीबतों से घिरे हुए हैं या मुसीबतें इनसे घिरी हुई हैं।इन्हें झींकना बहुत पसंद है।छोटे छोटे ढेरों खुशी के अवसर आते हैं जिन्हें पकड़ा जा सकता है और हंसी खुशी जीया जा सकता है।पर नहीं, कुछ का स्वर तो हमेशा शिकायती और उलाहने तायने से भरा रहता है।उनके स्वर से खीझ सी टपकती रहती है।ऐसा लगता है दुनिया भर की कटाह इन पर ही पड़ गई है।जबकि सच तो यह है कि कम साधनों में भी खुशी खुशी जीया जा सकता है।खुशियां साधनों की मोहताज नहीं हुआ करती।हां ,आपका दृष्टिकोण जरूर मायने रखता है। अब आपने आदत ही बना ली हो कि हमें तो साब रोते पीटते ही जीना है तो उसमें भला कौन हथेली लगा सकता है।
जो मिला, वह आंख तर नहीं आता और जो पास नहीं,उसकी कमी हमेशा खलती रहती हैं कि देखो, सब खूब आराम से हैं, बस हम ही मुसीबत के मारे हैं या यों कह लीजिए कि पराई थाली का भात हमेशा मीठा लगता है।और कहीं वह थाली उन्हें मिल जाये तो मीन मेख उसमें भी खोज लिए जाते हैं कि नेक ऐसा और होता।ये नेक उनका पीछा कभी नहीं छोड़ता सो वे किसी भी अवसर को एन्जॉय नहीं कर पाते। कुछ की तो दृष्टि अगले के सुख पर ही लगी रहती है कि उसे देखो कैसे हंस रहा है, ठहाके लगा रहा है, खूब मौज में है, उसकी तो पांचों घी में और सिर कढ़ाही में है।यानी तुम्हारी कुढ़ने की आदत है तो तुम किसी भी बहाने से कुढ़ना शुरू कर सकते हो।अब तुम्हें सबसे कटे कटे रहने की आदत है तो अगला इसमें क्या कर सकता है भला।उसे सबसे मिलना जुलना पसन्द है,वह प्रसन्नचित्त रहता है और आपका सारा समय उसे खुश देख कुढ़ने में ही चला जाता है।सबका अपना अपना जीवन है, सबका जीने का तरीका अलग है।आपका अपना जीवन है।उसे आप कैसे जीते हैं ,यह आप पर निर्भर करता हैं।सुख दुख तो सबके साथ हैं, थोड़ी बहुत ऊंच नीच भी सबके साथ लगी रहती है।कोई परम् सुखी नहीं है।सुना तो होगा कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई पल पल रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी और सुखी राम के दास ।अब कुछ सुख दुख, कठिनाई मुसीबत को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं और उसे इसी भाव से लेते हैं।उसे बहुत व्हेटेज नहीं देते।लो तुम आ गए, बैठ जाओ एक तरफ, पड़े रहो कोने में, अभी टैम नहीं है तुम्हें अटेंड करने का।वे बड़ी से बड़ी घटना सुखद हो या दुखद, सामान्य रूप से लेते हैं तो कुछ इसे तिल का ताड़ बना देते हैं।कुछ छोटे से छेद को वहीं का वहीं रफू कर देते हैं और कुछ उसे अंगुली से फाड़ और चौड़ा कर देते हैं।फिर उसे लेकर रोते झींकते रहते हैं।
जीवन जीने का सबका अपना अपना तरीका है।ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसी परिस्थिति के प्रति कैसे रिएक्ट करते हैं, उसके समाधान सोचते हैं या समस्या को मेग्नीफाई करते हैं, बढा चढ़ा कर सबके सामने गाते हैं, उसका इतिहास बताना शुरू कर देते हैं।अब समस्या है ये तो सबको पता है पर उससे कैसे सिलटा जा सकता है उस ओर सोचना जरूरी है।जीवन को जीने के लिए आपकी प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है।आपके उसूल बहुत जरूरी हैं, आप किस तरह समस्या को लेते हैं ।उसे हउआ बनाकर या उसका विश्लेषण कर के।जो लोग छोटे छोटे स्वार्थों के वशीभूत हो जाते हैं, अकर्मण्य होते हैं, हमेशा दूसरों पर डिपेंडेंसी रखते हैं, केवल समस्या का बयान करते हैं ,करने के नाम इधर उधर रस्ता बदल लेते हैं ,उन्हें हर बाधा बड़ी ही लगती है।उनका समस्या के निदान से कोई सरोकार नहीं होता।बस हो हल्ला मचाकर लाइम लाइट में बने रहते हैं और जब सब सिलट जाए तो सबसे पहले आकर यश लूटते हैं कि हमने तो पैले ही कई साब।
तो दुनिया रंग बिरंगी है दोस्तो, आपका मनोबल बढाने वाले कम और धकेलने वालों की संख्या अधिक है।संभल कर रहिये और चलिए।जीवन को भरपूर जीने के लिए प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है तो चाहे जो करो छोटा या बड़ा, उसके हर पहलू को समझो, नहीं आता तो सीखो,पूछो, सलाह लो, पर करो जरूर।चार बार गिरेंगे तो क्या फिर उठकर खड़े हो जाएंगे।ठोकरें भी तो सिखाती ही हैं।कभी न कभी तो सीख ही जायेंगे।बस, बढ़ना है आगे बढ़ना है और पूरी प्रतिबध्दता से बढ़ना है।आगे होय सो देखी जाएगी।सफर जारी है....936
16.05.2022
बहुत जरूरी है प्रतिबद्धता......
जीवन जैसा भी हो ,उसे जीना होता है।कुछ लोग जीते हैं और कुछ इसे काटते सा हैं।जब पूछो कैसे हो भाई तो घिसा पिटा सा एक ही जबाब मिलता है बस समय काट रहे हैं।और जो पूछो भाई क्या हुआ तो उनके पास मौसम से लेकर तबियत तक की इतनी शिकायतें होती हैं कि कई बार भरम हो जाता है ये मुसीबतों से घिरे हुए हैं या मुसीबतें इनसे घिरी हुई हैं।इन्हें झींकना बहुत पसंद है।छोटे छोटे ढेरों खुशी के अवसर आते हैं जिन्हें पकड़ा जा सकता है और हंसी खुशी जीया जा सकता है।पर नहीं, कुछ का स्वर तो हमेशा शिकायती और उलाहने तायने से भरा रहता है।उनके स्वर से खीझ सी टपकती रहती है।ऐसा लगता है दुनिया भर की कटाह इन पर ही पड़ गई है।जबकि सच तो यह है कि कम साधनों में भी खुशी खुशी जीया जा सकता है।खुशियां साधनों की मोहताज नहीं हुआ करती।हां ,आपका दृष्टिकोण जरूर मायने रखता है। अब आपने आदत ही बना ली हो कि हमें तो साब रोते पीटते ही जीना है तो उसमें भला कौन हथेली लगा सकता है।
जो मिला, वह आंख तर नहीं आता और जो पास नहीं,उसकी कमी हमेशा खलती रहती हैं कि देखो, सब खूब आराम से हैं, बस हम ही मुसीबत के मारे हैं या यों कह लीजिए कि पराई थाली का भात हमेशा मीठा लगता है।और कहीं वह थाली उन्हें मिल जाये तो मीन मेख उसमें भी खोज लिए जाते हैं कि नेक ऐसा और होता।ये नेक उनका पीछा कभी नहीं छोड़ता सो वे किसी भी अवसर को एन्जॉय नहीं कर पाते। कुछ की तो दृष्टि अगले के सुख पर ही लगी रहती है कि उसे देखो कैसे हंस रहा है, ठहाके लगा रहा है, खूब मौज में है, उसकी तो पांचों घी में और सिर कढ़ाही में है।यानी तुम्हारी कुढ़ने की आदत है तो तुम किसी भी बहाने से कुढ़ना शुरू कर सकते हो।अब तुम्हें सबसे कटे कटे रहने की आदत है तो अगला इसमें क्या कर सकता है भला।उसे सबसे मिलना जुलना पसन्द है,वह प्रसन्नचित्त रहता है और आपका सारा समय उसे खुश देख कुढ़ने में ही चला जाता है।सबका अपना अपना जीवन है, सबका जीने का तरीका अलग है।आपका अपना जीवन है।उसे आप कैसे जीते हैं ,यह आप पर निर्भर करता हैं।सुख दुख तो सबके साथ हैं, थोड़ी बहुत ऊंच नीच भी सबके साथ लगी रहती है।कोई परम् सुखी नहीं है।सुना तो होगा कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई पल पल रहत उदास, थोड़े थोड़े सब दुखी और सुखी राम के दास ।अब कुछ सुख दुख, कठिनाई मुसीबत को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं और उसे इसी भाव से लेते हैं।उसे बहुत व्हेटेज नहीं देते।लो तुम आ गए, बैठ जाओ एक तरफ, पड़े रहो कोने में, अभी टैम नहीं है तुम्हें अटेंड करने का।वे बड़ी से बड़ी घटना सुखद हो या दुखद, सामान्य रूप से लेते हैं तो कुछ इसे तिल का ताड़ बना देते हैं।कुछ छोटे से छेद को वहीं का वहीं रफू कर देते हैं और कुछ उसे अंगुली से फाड़ और चौड़ा कर देते हैं।फिर उसे लेकर रोते झींकते रहते हैं।
जीवन जीने का सबका अपना अपना तरीका है।ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसी परिस्थिति के प्रति कैसे रिएक्ट करते हैं, उसके समाधान सोचते हैं या समस्या को मेग्नीफाई करते हैं, बढा चढ़ा कर सबके सामने गाते हैं, उसका इतिहास बताना शुरू कर देते हैं।अब समस्या है ये तो सबको पता है पर उससे कैसे सिलटा जा सकता है उस ओर सोचना जरूरी है।जीवन को जीने के लिए आपकी प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है।आपके उसूल बहुत जरूरी हैं, आप किस तरह समस्या को लेते हैं ।उसे हउआ बनाकर या उसका विश्लेषण कर के।जो लोग छोटे छोटे स्वार्थों के वशीभूत हो जाते हैं, अकर्मण्य होते हैं, हमेशा दूसरों पर डिपेंडेंसी रखते हैं, केवल समस्या का बयान करते हैं ,करने के नाम इधर उधर रस्ता बदल लेते हैं ,उन्हें हर बाधा बड़ी ही लगती है।उनका समस्या के निदान से कोई सरोकार नहीं होता।बस हो हल्ला मचाकर लाइम लाइट में बने रहते हैं और जब सब सिलट जाए तो सबसे पहले आकर यश लूटते हैं कि हमने तो पैले ही कई साब।
तो दुनिया रंग बिरंगी है दोस्तो, आपका मनोबल बढाने वाले कम और धकेलने वालों की संख्या अधिक है।संभल कर रहिये और चलिए।जीवन को भरपूर जीने के लिए प्रतिबद्धता बहुत जरूरी है तो चाहे जो करो छोटा या बड़ा, उसके हर पहलू को समझो, नहीं आता तो सीखो,पूछो, सलाह लो, पर करो जरूर।चार बार गिरेंगे तो क्या फिर उठकर खड़े हो जाएंगे।ठोकरें भी तो सिखाती ही हैं।कभी न कभी तो सीख ही जायेंगे।बस, बढ़ना है आगे बढ़ना है और पूरी प्रतिबध्दता से बढ़ना है।आगे होय सो देखी जाएगी।