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Saturday, August 20, 2022

कान्हा जन्म सुन आई

 सफ़र जारी है.....1030

20.08.2022

 कान्हा जन्म सुन आई.... 

घर घर लडडू गोपाल विराजे हैं, उनके श्रंगार की तैयारी पूरी है। हर बालक कान्हा का भेष धरने को आतुर है। स्कूलों में बालक बालिकाएं  कृष्ण राधा के रुप में सजे धजे सबको लुभा रहे हैं। आपस में बतिया रहे हैं वे....अरे कृष्ण बनना तो बहुत आसान है बस सिर पर मोर मुकुट धर लो, होठों पर बांसुरी रख हाथ से पकड़ लो, थोड़े तिरछे खडे हो जाओ, आंखों में बडा बडा कजरा लगा लो, मुस्कराते रहो, थोड़ा नटखट पन दिखा दो, मुख पर माखन मल लो, गोपियों की मटकी तोड़ दो, ग्वाल बालों के संग गेंद तड़ी खेल लो, जमुना में गेंद फैंक दो, फिर जमुना में कूद जाओ, काली नाग को नाथो, उसके सहस्त्र फन पर  ता था थैया करो, गईया चराओ, दूसरों के घर से माखन चुरा के खाओ, मां ऊखल से बांधे तो यमलार्जुन को मुक्ति दिला दो, पूतना वेश बदल कर आए तो स्तन पान कर उसके प्राण पखेरू उड़ा दो, उसे मुक्ति दे दो, कुब्जा का कूबड़ सीधा कर दो, ठुमक ठुमक नाच दो छोटी छोटी गइया छोटे छोटे ग्वाल, छोटो सो मेरो मदन गुपाल। सुदामा जैसे गरीब को दोस्त बना लो फिर उस दोस्ती को राजा बनकर अमीर बन कर निभा दो, बन गए कृष्ण। और क्या करना होता है कृष्ण बनने के लिए। राधा को तो बस सजना होता है, सुन्दर सी चुनरी ओढ़नी होती है, घाघरा चोली पहनना होता है, कृष्ण के साथ खड़ा होना होता है, बस बन गए झट से राधा।

        बच्चे इतना ही सोच समझ सकते हैं, इनकी बाल बुद्धि में इतनी ही बात समा सकती है। जन्माष्टमी है तो घरऔर मंदिरों में कृष्ण के जीवन की झांकियां सजेंगी, खूब सारे फल मिठाइयां खाने को मिलेंगी, रात बारह बजे कान्हा जी का जन्म होगा, टन टन घंटी बजाकर आरती होगी, धनिए की पंजीरी और चरणामृत का प्रसाद मिलेगा और बस मन गई जन्माष्टमी। कमोबेश जन्माष्टमी का यही अर्थ लिया जाता है। हम भी बचपन से यही सब देखते सुनते करते आ रहे हैं। खीरे को चीर उसमें सालिग्राम रख देना और फिर रात बारह बजे उन्हें सालिग्राम को दूध दही शहद बूरे से रगड़ कर नहलाना और मंदिर में सजे संवारे लडडू गोपाल के झूले में रख देना, झोटे दे देकर झुलाना, और प्रसाद पाना। दिन भर कृष्ण की बाल लीलाओं को मंचित होते देखना और भी सुखद अहसास देता। कितना मनमोहक लगते हैं कान्हा तभी तो उनके ढेरो ढेरो नाम हैं कन्हैया, मदन गोपाल, नटखट, सांवरा, सांबलिया, लाला,वासुदेव,जशोदानंदन, देवकी सुत और भी बहुत कुछ।

        पर कान्हा होना क्या इतना आसान है। मां देवकी के गर्भ में भी नहीं आए तभी आकाशवाणी हो गई कि हे कंस जिस बहन को तू इतने प्यार से विदा कर रहा है, उसी की आठवीं संतान द्वारा मारा जाएगा।आकाशवाणी ने सारा परिदृश्य ही बदल कर रख दिया। कंस तो केवल आठवीं संतान को ही मारता पर ऐसे पाप का घड़ा भला कैसे भरता तो नारद ने कान भर दिए कि एक से लेकर आठ में तो कोई भी संतान आठवीं हो सकती है तो संदेह की गुंजायस ही क्यों छोड़ी जाए, खतरा क्यों मोल लिया जाय तो कंस ने देवकी वसुदेव को कारागार में डाल दिया गया, उनकी सात संतानों को क्रूर मामा कंस ने पत्थर की शिला पर पटक पटक कर मार दिया। भादों की अंधेरी रात जब कान्हा जन्मे तो कारागार के ताले अपने आप टूट गए, पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए , वसुदेव नवजात को सूप में रखकर निकले तो जमुना जी कान्हा के चरण चूमने को बेताब हो उठी, मेघ लगातार बरसते रहे, गोकुल में जशोदा की बगल में कान्हा को लिटा और कन्या को लेकर मथुरा लौटे उस पल तक सृष्टि थम गई। शिशु के रोने की आवाज सुनकर कंस को सूचित किया गया, ये आठवीं संतान थी तो कंस का भय चरम पर था। जैसे ही उसे पत्थर पर पटकने जा रहा था कंस, वह बालिका योगमाया उस दुष्ट के हाथ से छिटक गई और कंस को चेतावनी दे डाली कि तुझे मारने वाला तो पैदा हो चुका है कंस। कंस को काटो तो खून नहीं। आसपास के गांवों मे ढिंढोरा पिटवा दिया, सभी नवजात को खोजने और मारने के लिए पूतना भेजी गई, कृष्ण ने स्तन पान करते उसके प्राण हर लिए और उसे गति दे दी। जितने भी राक्षस भेजे गए, सबको मार दिया, जो जग का रखवाला है उसे भला कौन मार सकता है। ग्वाल बालों के साथ गैया चराते रहे, उनके साथ धमा चौकड़ी मचाते रहे, गेंद तड़ी खेलते गेंद को जानबूझकर जमुना में फेंक दिया, वह जमुना जिसका जल कालिया के प्रभाव से पीने लायक नहीं रहा, गेंद फैंकना और उसे लेने जाना तो बहाना था, सहस्त्र फन वाले कालिया नाग को नाथना जरुरी था माखन चोरी के ब्याज से सभी का दिल चुरा लिया, कर के रुप में सारा दूध दही मथुरा चला जाता था, उसे अपने हमजोली बालकों को बांटा, सदियों से चली आ रही इंद्र की पूजा बंद करवा कर गिरिराज की पूजा शुरू करवाई और जब कुपित इंद्र ने सात दिन तक लगातार मूसलाधार बारिश का जोर दिखाया तो ग्वाल बालों के साथ मिलकर कन्नी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया, कछु माखन को बल बढ़ो कछु गोपिन करी सहाय, श्री राधे जू की कृपा से गोबरधन लियो उठाय।

        वे कृष्ण हैं कृष्ण, मां जशोदा को मान देते हैं तो जन्मदात्री देवकी को सभी कष्टों को मुक्त कर देते हैं। कंस का बध कर नाना उग्रसेन को राज गद्दी पर बैठा देते है। शिक्षा दीक्षा के लिए सांदीपन गुरु के पास जाते हैं तो अन्य बालकों की तरह साधारण बन कर ही रहते हैं, गुरुमाता के आदेश पर जंगल से लकड़ी चुन कर लाते है, सुदामा उनके हिस्से के भुने चने खा लेते हैं तो उसकी शिकायत नहीं करते पर सुदामा के द्वारिका पहुंचने पर हाथों धरती छोड़, आंसुओं से उनके पैर धोते.. पानी परात को हाथ छुओ नहीं नैनन के जल सो पग धोए, गले लगाते मित्रता निभाते उपालंभ जरूर दे देते हैं पहले चना गुरुमात दए तुम चाब लए, हमें नहीं दीने और आज भी भाभी के भेजे स्नेहिल तंडुल की पोटरी को बगल में छिपा लिए हो, चोरी की बान में हो जो प्रबीने। तीन मुठ्ठी तंदुल के ब्याज से तीनों लोक की संपदा देते हैं पर सुदामा को पता भी नहीं चलने देते।

            उनके जीवन का हर प्रसंग बांध लेता है फिर चाहे महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी बनते गीता का ज्ञान हो या सखा भाव से द्रोपदी के चीर को बढ़ाना जिसे खींचते खींचते दुर्योधन पस्त हो जाता है पर उसे साड़ी का ओर छोर नहीं मिलता। कितनी कितनी कथाएं हैं, प्रसंग हैं, संदर्भ हैं उनकी भक्त वत्सलता के। उन्हें बस भाव से भजना होता है, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव। वे तो खिंचे चले आते हैं, सब दुख हर लेते हैं, बस उनके नाम की रट भर लग जाए। है कृष्ण हे मुरारी हमारी रक्षा करो, हमें अपनी शरण में लो, हम आपके आसरे हैं। प्रभु तुम तो अवतार लेते हो। आज अजन्मे का जन्म दिन है। माखन मिश्री का भोग लगेगा, हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की, कान्हा जन्म सुन आई, जशोदा तुम्हें ढेरो बधाई।

इत्ते उलायती हू मत बनो

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