01.06.2024
प्रेरणास्पद व्यक्तित्व....
लोकमाता पुण्य श्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर का तीन सौवां जयंती वर्तमान कई धूम है.दो दिन पूर्व जुलाई 31को देश भर में उनके जयंती समारोह बहुत धूमधाम से बनाये गये हैं.वे समाज के किसी एक वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करती अपितु भारत की हर उस महिला वर्ग की प्रतिबिंब है जो ग्रामीण परिवेश में पली बढी होकर पिता के द्वारा पोषित संस्कारों की धरोहर को सहेजे किसी कुलीन वंश की बहु बनती हैं और पुत्री पवित्र किये कुल दोऊ की उक्ति को साकार करती हैं.पाटिल परिवार के संस्कारों की धरोहर को सहेजती संभालती हैं और श्वसुर कुल की कीर्तमें भी चार चांद लगाती हैं.महाराष्ट्र और मालवा के मध्य सेतु बनती है.पिता उस काल में भी उन्हें शिक्षा दिलाने का साहस रखते हैं जब महिलाओं के लिए शिक्षा के रास्ते खुले नहीं थे और श्वसुर मल्हार राव होल्कर चार हाथ आगे बढ कुलवधू को राजकाज में दीक्षित करते हैं.होलकर परिवार की पुत्रवधू न केवल कुशल तीरंदाज है बल्कि हाथी पर बैठ कर दुश्मनों के छक्के छुडवाती है विरोधियों के बीच अपना लोहा मनवाती है.
दूरदर्शी है.विरोधियों को पटखनी देना जानती है.पति और श्वसुर के मृत्यु दुख से व्यथित जरुर है पर जब उसे पता चलता है कि पेशवा उसके राज्य पर आक्रमण करने की योजना में है तो अबला स्त्री की तरह विलाप करने नहीं बैठ जाती वरन उन्हें पत्र ख ये अहसास करा देती है कि आप युद्ध करने पर आमादा हैं तो आइये मेरी स्त्री सेना आपका डटकर मुकाबला करेगी पर आप विचार कर लें कि आप जीतें या हारें दोनों तरफ से आपको अपयश ही मिलना है.बात पेशवा को समझ आ जाती है और इस तरह कुशल प्रशासिका बिना लडे ही युद्ध जीत जाती है.संतान को प्यार करना और उसके मोहाविष्ट हो धृतराष्ट्र जैसा आचरण करना बात है.माता अहिल्याबाई अपने पुत्र मालेराव और पुत्री से अपार स्नेह करती है पर राजमाता होने के गौरव को भी नहीं भूलती.पुत्र के रथ से एक बछडे के मर जाने और उसकी माता गाय के अश्रुपूरित नयनों को देखकर इतनी विचलित हो जाती हैं कि पुत्र के लिए मृत्युदंड की घोषणा करते विचलित नहीं होतीं.ये अलग बात है कि गाय के बार बार रास्ता रोकने पर और प्रजा के आग्रह पर वे उसे क्षमादान दे देती हैं.
उनके जीवन के प्रसंगों को पढते लगता है कि बिना सेवाभावी हुए कोई मंदिरों धर्मशालाओ का निर्माण पुनर्निर्माण नहीं करवा सकता.परम शिव भक्त कि उनकी पूजा अर्चना किये जल की बूंद गले से नीचे नहीं उतारतीं.राजाज्ञा के नीचे श्री शंकर ही लिखा जाता रहा.मुद्रा पर नंदी और बेलपत्र उकेरे गये.आध्यात्मिक इतनी कि हमेशा भरोसा बना रहता कि प्रभु का हाथ हमारे ऊपर है.उनकी छत्रछाया में हम महफूज हैं.धर्म के जिन दस लक्षणों की चर्चा मनुस्मृति में वर्णित है धैर्य ,क्षमा ,दम ,अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी ,विद्या ,सत्य और अक्रोध उनका समवेशित रुप रूप लोकमाता अहिल्याबाई के चरित्र मे देखने को मिलता है.महिला सशक्तिकरण के जिन संदर्भो को आज हवा दी जारही है कि कामकाज और आगे बढने में साडी परिधान बाधक है और सिर पर पल्लू लेना पिछडे पन का सूचक है उसी साढे पांच गज की सडी को पहन सिर पर पल्लू डाले वे कुशल प्रशासिका का खिताब पाती हैं और तीन सौ वर्ष बाद भी अपनी उपस्थिति जोरदार तरीके से दर्ज कराती हैं.आज की युवा होती बच्चियों कोज उनके जीवन के प्रसंगों को पढना और उनके आदर्शों को जीवन में उतारना बहुत जरुरी है.इन प्रेरणास्पद चरित्रों की जीवनी साल में एक बार जयंती समारोहों में बताया जाना ही काफी नहीं है .इन्हें पाठ्यक्रम के रुप में रखा जाना और सत्साहित्य के रुप में पढा जाना बहुत जरुरी है.देश को आगे बढाना है तो ऐसे सेवाभावी नागरिक गढने बहुत जरुरी हैं जो स्व का बलिदान कर भी राष्ट्र रक्षा के लिए समर्पित हों.घर पास पडोस समाज जिला राज्य प्रदेश अगली इकाई के रुप में राष्ट्र आता है.जो राष्ट्रवादी हैं वे वसुधैव कुटुम्बकम का स्वप्न देखते हैं और विश्व में मानव धर्म के पोषक होते हैं.घर की नस्लों को सुधारिये.देश तो स्वत: मजबूत हो जायेगा.
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