सफर जारी है....1529
08.06.2024
जमाना हुनरमंदो का है....
जीवन में आगे बढना है तो कोई न कोई हुनर तो होना ही चाहिए आपके पास मसलन खाना बनाना ,गाना बजाना, अभिनय ,नृत्य, हंसना हंसाना, वक्तृत्व कौशल ,पढना पढाना ,सुलेख ,लेखन दक्षता,दौडना भागना ,मिमिक्री करना.ये सब सकारात्मक कुशलताएं हैं .यदि इनमें से किसी पर भी दखल नहीं तो फिर चोरी चकारी , कटु आलोचना, दूसरों को परेशान करना, कमी निकालना ,हमेशा अगले को दोषी ठहराना, बात बात पर सबकी खिल्ली उडाना, इसकी टोपी उसके सिर रखना जैसी बातों में भी आपकी निपुणता और दक्षता हो सकती है.जो भी हो, कुछ न कुछ तो ऐसा आप में होना ही चाहिये जो दूसरों से हटकर हो और आपको विशिष्ट बनाता हो.कुछ अपनी बेबकूफी, सिधाई और भोलेपन के कारण चर्चा में होते हैं तो कुछ अपनी धूर्तता, चालाकी और बदमाशी के कारण बाजी मार ले जाते हैं.कुछ धन के घमंड में इतने चूर होते हैं कि उनका सब काम पैसों के जोर पर हो जाता है और कुछ सिफारिश के बल पर अपनी नैया खे ले जाते हैं.
पैसों की माया बहुत जादुई है.जो काम हुनर से एक बार को भले से न हो पर पैसों और सिफारिश के बल पर सब सध जाता है.तो आपके पास पैसा हो या सिफारिशी हथकंडे हों तभी जीवन की नैया पार लगती है.अब न पैसा न सिफारिश तो ऐसे व्यक्तियों को तो अपने हुनर से ही जग जीतना होता है.जग जीते न जीतें पर जीवन तो बिताना होता है.और जीवन का क्या है वह तो लस्टम पस्टम बीत ही जाता है.बीतती तो सीधे सादों की भी है और तेज तर्रारों की भी है.रोना झींकना तो उनका है जो घोर अभावों में ही बडे सपने देख लेते हैं.विपरीत परिस्थिति और हवा में काम करने के आदी होते हैं.हवा के साथ रुख नहीं बदलते बल्कि विपरीतता को धकियाते आगे बढते हैं.आप समझ सकते हैं कि हवा का रुख अनुकूल न हो तो पतवार खेने में बल अधिक लगता है.पांच मिनट
की दूरी पचास मिनट में तय होती है.बेकार के झंझटों से निबटने में समय लग जाता है.
तीसरे पडाव पर जाकर ये सब समझ में भरता है पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.जीवन का स्वर्णिम काल जब मन और तन जोश से भरे होते हैं,भूडोल को गोल गोल घुमाने का साहस होता है,आग अंतर में लिए पागल जवानी और लाल चेहरे हैं नहीं फिर लाल किसके पंक्तियों को जीने और कुछ कर गुजरने का समय होता है वह सारा का सारा चुरकुट कामों में निकल जाता है.तेरे मेरे के झंझटों की भेंट चढ जाता है.जिन बेकार के कामों के लिए ये बेशकीमती और गोल्डन समय बरबाद किया जाता है उसकी कीमत बाद में पता चलती है पर तब तक सब बीत चुका होता है.केवल हाथ मलना भर शेष रह जाता है.तो जीवन के लक्ष्य तीसरे पन में निर्धारित नहीं किये जाते .उन्हें तो जीवन प्रारम्भ होते ही तय कर लिया जाता है कि करना क्या है। .तरह तरह के हुनर बचपन और युवावस्था में ही सीख लिये जाते हैं.बाद का समय तो उनमें निखारने के लिए होता है.अब समझ आता है मां जो बचपन में जरा खाली समय मिलते ही सुई डोरा, ऊन सलाई , क्रोशिया, टाट पे कढ़ाई और कुछ नहीं तो ढोलक बाजा हाथ में पकडा देती या बेकार पडे सामान से कुछ नया और सार्थक बनाने को पकडा देती मसलन कपडे से गुडिया बनाओ या मोजे से खरगोश.रूई से बतख ,तार से कुत्ता बिल्ली,मैक्रम से वाल हैंगिग या सुतली से छींका स्टेंड.गर्मियों भर अचार मुरब्बे चटनी पापड बडी की रेसेपी सिखाई जाती रही.तब हाॅबी क्लासेज और समर कैम्प भले से न लगते हों पर परिवार में माताएं ताई चाची भाभी जीजी मौसी ये सब हुनर सिखा देती थीं.ऐसा नहीं था कि तब पढ़ाई का स्तर निम्न था या पढाई सरल थी .बस पढाई अपनी जगह थी और जीवन जीने के हुनर अपनी जगह.दोनों का साथ चलना जरुरी था.छोटे मोटे काम तो हर व्यक्ति की पहुंच में थे और छोटी मोटी बीमारियों के लिए घरेलू नुस्खे कारगर थे.बात बात पर डॉक्टर दर्जी बढई इलेक्ट्रिशियन प्लम्बर को बुलाना जरुरी नहीं था.खाट की अदवायन कसनी हो या पाये सीधे करने हो ,पाटी के बीच खपच्ची ठोकनी हो.कपडो की मरम्मत हो सब घर के लोग ही कर लेते थे..जिस कौशल विकास, योग्यता संवर्धन, क्षमता विकास और मूल्यपरक शिक्षा के पाठ्यक्रम में समावेश की माथापच्ची की जा रही है वह नये कवर में पुराना ही माल पैक कर थमा दिया गया है.वह स्टाम्पड है इसलिए स्वीकार है.हमारे पूर्वज पुस्तक को पाठ्यक्रम से देश निकाला देकर अब भारतीय ज्ञानपरंपरा और कला संस्कृति में स्नातक स्नातकोत्तर पीजी डिप्लोमा की शुरुआत जारी है.
तो जरुरत हुनरमंद बनाने की है न कि किताबी कीडा और सूचनाओं के बोझ से लादने की.बने रहिये हुनरमंद और अपने आसपास भी निखट्टुओं की बजाय हुनरमंदों की फौज तैयार कीजिये.
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