Sunday, June 16, 2024

बोलते बतराते रहिये जनाब

सफर जारी है......1530

09.06.2024

बोलते बतराते  रहिये जनाब....

डिजिटल साधनों के चलते फिर चाहे स्मार्ट फोन हो टेबलेट  हो लैपटॉप हो कंप्यूटर हो या अन्य कोई और साधन ,सोशल मीडिया पर उपस्थिति बहुत जता ली,दिन भर मोबाइल पर दुनिया जहान की राजी खुशी लेते रहे,देश की राजनीति पर दंड पेलते रहे ,फेसबुक व्हाटस इन्स्टाग्राम पर अपने को जताते बताते रहे ,पुराने मित्रों को खोज खोज कर खैर खबर लेते रहे पर इस सब के बीच बिलकुल पास बैठे व्यक्ति को बिल्कुल भुला दिया गया .गूगल से पुरानी रिश्तेदारियां तो खोजी जाती रहीं पर जीते जागते इन्सानों  और  आपसदारी के रिश्तों से  गुफ्तगू तक के समय का टोटा पड गया.सफर पर निकलते रास्ते भर दुनिया भर के लोगों से लंबी  बातचीत तो होती रही पर साथ में बैठे व्यक्ति उपेक्षित होते चले गये. ढेरों दृश्य कैमरे में कैद होते रहे पर प्रकृति के सुंदर नजारे देखने उन्हें आंखों में कैद कर लेने के सौभाग्य से वंचित रह गये.बस यही सोचते रह गये कि तसल्ली से बैठकर देखेंगे. पर जीवन की आपाधापी और व्यस्तता के  चलते कभी सुकून के दो पल नसीब न हो पाये या हम ही बेहद बिजी होने का   बाना ओढे उन फुरसत के पलों को धकियाते रहे. अपने को फोन के स्क्रीन में ऐसा कर लिया  किया कि बस पूछो ही मत.सोशल मीडिया  और देश की राजनीति में ऐसे खो गये कि संबंधियों और इष्ट मित्रों का कोई ख्याल ही नहीं रहा.नतीजन चार अपनों को छोडकर पूरी दुनिया जेब में लिये घूमते हैं.फेसबुक पर पांच हजार  से ऊपर की मित्रता सूची देख फूले नहीं समाते.मार इतराते डोलते हैं और भाई भाई के मध्य ,भाई बहिन, माता पिता संतानों के मध्य इतनी दूरी  इतनी बढ गई है कि एक दूसरे को जन्म दिन और वैवाहिक वर्षगांठ की बधाई भी पटल पर समूह में देते हैं.

 संवाद हीनता इतनी अधिक बढ चुकी है कि एक ही घर परिवार के चार सदस्य चार अलग अलग कमरों में बैठे चैट बाक्स में या संदेश में बधाई लिख कर भेजते हैं.सुप्रभात और शुभ रात्रि के मैसेज भेजते रहते हैं.अकर्मण्यता का आलम यह है कि अपने सुविधा जोन को छोड कर दूसरे कमरे तक जाते प्रणाम करते नानी मरती है.अरे चार कदम चलकर बडे बुजुर्गों को प्रणाम कर लोगे तो आशीर्वाद ही पाओगे.ज्ञान गंगा में ही नहाओगे.

    मोबाइल का नशा सिर चढ कर बोलता है कि यदि घंटे दो घंटे मोबाइल न मिले तो लगने लगता है दुनिया ही समाप्त हो गई.अब क्या करें.करने के लिए कुछ बचा ही नही.मार बैचेनी होने लगती है लगता है कुछ बहुत जरुरी छूट गया है..ब्लू टिक आंखों के आगे घूमते रहते हैं .पैर हिलना शुरु हो जाता है.दस मिनट में ही लगने लगता है कुछ खो गया है हमारा.उस मध्य बैचेनी का ऐसा आलम होता है कि दुनिया ही ठहर गई हो हमारी.किसी से बात करने का मन ही नहीं होता हमारा.बस जैसे खुशियों की सारी चाबीं इस मुए मोबाइल में बंद हो.हवा के बिहना सांस लेना संभव भले हो पर मोबाइल के बिना जिंदगी बेकार हो जाती है.हमने अपने चारों और तंत्र का ऐसा वितान तान रखा है कि उसके बिना जीने की कल्पना ही नहीं कर पाते.यंत्र की सुविधा आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए थी उनसे दूरी बढाने और उन्हें भुला देने बिसारने के लिए नहीं.पाया बहुत कुछ निश्चित ही होगा पर जो महत्वपूर्ण खोया है उसका अंदाजा भी नहीं है हमें.हमारी श्रवण दक्षता कुशलता का रेट भले बढा हो पर हमें बतराने बोलने की आदत ही नहीं रही.दिन दिन भर बस कानों में लीड लगाये उल्टा सीधा सुनते  ही तो रहते हैं. कोई  कुछ पूछे तो जबाब देने के लिए  समय नहीं होता.अगला बात करने बैठे तो हम कह देते हैं कि क्या बात करें.निजी संबंधों में बातों का खजाना चुक जाये और आपको बात करने के लिए विषय खोजना पडे इससे अधिक लाज की बात और क्या होगी भला.

बोलने बतराने के अपने सुख हैं.आप रिलीज होते हैं अपने को बांटते है शेयर करना सीखते हैं.बात तो किसी भी विषय पर की जा सकती है.याद आता हैहऔर जब महीने पन्द्रह दिन में पडोसियों से मिलने बात करने जाया जाता था और परिवार के सदस्यों से तो किसी भी समय बात की जा सकती थी.मां बाकायदा शाम के समय बच्चों के साथ बात करने बैठती.कितने किस्से कहानी बुन सुन गुन लिए जाते.परिवार के किस्से साझा होते.पिता के साथ यात्रा में बातों के खजाने खुलते.उनके बचपन की कहानी सुनते.स्थानों के विवरण साझा किये जाते.बात बात में जरुरी सीख हम बच्चों को दे दी जाती.उस समय की बात बात में बताई गई सीख जीवन का पाथेय बन गई हैं.बिजली चले जाने पर चारपाई घेर हम भाई बहिनों की बातें उस समय तक चलती रहतीं जब तक बिजली रानी का पुनरागमन न हो जाता या किसी जरुरी काम के लिए उठने की आवाज न लग जाती.आज जिस बतराने को हद दर्जे की बेबकूफी कहा जाता है वह व्यक्तित्व विकास का जरुरी सोपान था.आपके बात करने के तरीके से आपके विषय  ज्ञान और संप्रेषण  योग्यता की पहचान होती थी.आप अपने को मांजते थे.बहुत कुछ सीखते थे.जब से बातों का सिलसिला खत्म हुआ बहुत कुछ पीछे छूट गया है.सब कुछ बस एक मोबाइल के बंद  डिब्बे में कैद होकर रह गया है.

आप खूब खूब एडवांस बनें, खूब यंत्र तंत्र का प्रयोग करें पर उसकी अति खतरनाक है.अति का बोलना ठीक नहीं तो चुप्पी भी खतरनाक है.बोलते बतराते रहिये.कुछ अपनी कहिये कुछ दूसरों।  की सुनिये .बस मोबाइल में सिर दिये मत बैठे रहिये.इससे इतर भी जीवन है.बतरस लाली लाल की.

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