सफर जारी है...840
07.02.2022
सब ने चूहे बिल्ली की कहानी अवश्य सुनी होगी कि बिल्ली से परेशान चूहे ये फैसला तो ले लेते हैं कि यदि बिल्ली के गले में घण्टी बांध दी जाए तो बिल्ली के आने पर टनटन की आवाज सुनकर सब चूहे सतर्क हो जाएंगे और भाग जाएंगे, सुरक्षित जगह छिप जाएंगे जिससे वे बिल्ली के हमले से बच सकेंगे ।बात सबको समझ भी आ गई पर एक बड़ा प्रश्न फिर सामने आ गया कि इस घण्टी को आखिर बांधे कौन, अब बेचारे चूहे तो चूहे हैं और जिन बुजुर्ग चूहे महाशय ने ये सुझाव दिया था वे तो अपनी अवस्था का बहाना कर कोने में छिप गये और छोटे बारे भी दुम दबाकर भाग खड़े हुए।तो समस्या का हल सबको चाहिये पर बताने मात्र से कार्य नहीं चला करता। उसे व्यावहारिक धरातल पर लाया जाना भी जरूरी होता है।यदि सब उससे बचते रहे तो फिर समाधान खोजने से भी क्या होने वाला है। जानते तो सब है कि बिल्ली के गले में घण्टी बांध जान बचाई जा सकती है पर बांधे कौन।जब आग लगी हो तब मात्र सुझाव देने कि अरे पानी लाओ, इमारत पर डालो, कोई भागकर अंदर आग में फंसे सदस्यो को बाहर निकालो ,ऐसा कहने भर से ,शोर मचाने मात्र से काम नहीं चला करता, आग नहीं बुझ जाती ।किसी को आगे आना पड़ता है ,साहस जुटाना पड़ता है ,बिल्ली के गले में घण्टी बांधने का दुस्साहस करना पड़ता है फिर भले ही बिल्ली पंजे से खूब खोंसा मारे, सारा दूध लुढ़का झपट्टा दर झपट्टा मारती रहे। ये सब उसे करना ही चाहिए , ये उसकी त्वरित प्रतिक्रियाएं होंगी।
आखिर आपने उसकी डाइट चूहा पर रोक लगाई है, उसकी सुचारू रूप से चलने वाली गतिविधियों पर विराम लगाने की जहमत उठाई है, उसके चक्क मलाई वाले दूध पर रोक लगा दी है और फिर आप चाहते हैं कि वह रायता भी न फैलाये, आपको खोंसे भी नहीं, दूध भी न लुढ़काये और शांति से बैठी रहे। ये तो वही बात हुई कि ढींगरा मारे और रोबन भी न दे।यानी आप पहले मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालेंगे और फिर ये कोशिश भी करेंगे कि अगला सूमसाम बैठा रहे।ओखली में सिर दिया तो ओखल से डर कैसा।फिर तो झेलो, प्रतिक्रिया तो छोटी मोटी बात है अभी तो आरोप प्रत्यारोप लगाए जाएंगे, खोज खोज कर सबूत इकठ्ठे किये जायेंगे, पूरी कोशिश होगी कि सत्य सामने न आये इसलिए दबाब की परिस्थितियों पैदा की जाएंगी, तनाव और निराशा के गर्त में डालने की कोशिश भरपूर होगी देखना यह है सत्य कितने दबाब झेल पाता है, कितने कुहरे ,बादल और अंधकारों को झेल पाता है, रीढ़ की हड्डी सीधी रख पाता है,सत्य सदा से परेशान होता है पर अडिगता उसे बादलों के बीच से निकाल लाती है, वह घोर अंधेरे को चीर प्रखरता से बाहर भी आता है और अपनी चमक से सबकी आंखें चुंधिया भी देता है पर सत्य की लड़ाई लंबी चला करती है, अर्जुन को दूर ले जाकर अभिमन्यु को सात द्वार के चक्रव्यूह में फांस लिया जाता है और निहत्थे पर महारथी हमला कर उसे मार ही देते है।अभिमन्यु की बलिदान व्यर्थ नहीं जाता और अंततः महाभारत का युद्ध जीत लिया जाता है, सत्य की जय होती है और असत्य को घुटने टेकने पड़ते है।पर जितनी जनहानि होती है उसका क्या।
तो सत्य जीतता तो अवश्य है फिर भले ही देर सबेर क्यों न हो, लाख क्षडयन्त्र क्यों न रचे जाएं,कुटिल चालें क्यों न चली जाएं, अनचाहे दबाब क्यों न बनाये जाएं,वातावरण में मनहूसियत क्यों न घोल दी जाए ।कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि हो तो सब जाता है, स्थिति से निपट भी लिया जाता है पर सामने कोई नहीँ आना चाहता, आगे कौन पड़े।बस सब पहले आप पहले आप करते हैं अपना समय जस तस पूरा कर लेते हैं ।झेलना तो उसे पड़ता है जो फ्रंट पर आता है, समस्याओं के समाधान चाहता है और अपनी जान जोखिम में डाल देता है, नदी के तेज प्रवाह में छलांग लगा देता है ,तैरना न जानते भी पूरी शक्ति से हाथ पैर मारता है और अक्सर विवर से बाहर भी आ जाता है।ईश्वर उसके सहायक होते हैं।पर बात वही है कि जो बोले सो कुंडा खोले।तो आपके सामने हमेशा दो विकल्प होते हैं जैसा चल रहा है वैसा चलने दें और आपको लगता है गलत है तो दखल दें ,सही करने की कोशिश तो करें।परिणाम आपके हाथ हो न हो पर अपनी सी मेहनत करना तो आपके हाथ है, उसे अवश्य कीजिये, बाकी राम जी पर छोड़ दीजिए।होना तो वही है जो ऊपर वाले को मंजूर हो पर कोई न कोई आगे आने की हिम्मत तो जुटाता ही है और अपनी भूमिका का निर्वाह अवश्य करते हैं,फिर उसकी नैया पार जरूर लगती है।ईश्वर किसी भी रूप में अपनी सहायता जरूर भेजता है।तो राम को भजते रहिये , बोलते रहिये और कुंडा खोलते रहिये।
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