सफर जारी है.......839
06.02.2022
सखि,बसन्त आयो है।सब ओर बासन्ती छटा बिखरी पड़ी है। गेंदा ,सरसों, कनेर के साथ प्रकृति तो पीताभ हो ही रही है ,लोगों के मन भी बासन्ती हो गए हैं।देशभक्त रंग दे बसंती चोला गाकर मन के उत्साह को प्रकट कर रहे हैं, मेरा रंग दे बसंती चोला माई रंग दे बसंती चोला, जिस चोले को पहन शिवाजी मिट गए अपनी शान पर, जिसे पहन झांसी की रानी मिट गई अपनी आन पर,आज उसी को पहन कर निकला हममस्तों का टोला।ये बसन्त क्या आता है सबके मन बासन्ती हो जाते हैं।हवा हवा हूँ बसन्ती हवा हूँ अपना राग अलग अलापती है।
सब बासन्ती हुए जा रहे हैं आखिर हो भी क्यों न, आज वीणा वादिनी मां सरस्वती का दिन जो है।विद्या की देवी सरस्वती ,धन की देवी लक्ष्मी और शक्ति की देवी दुर्गा इन तीन के बिना जीवन की संकल्पना ही नहीं है।जीवन ज्ञान, शक्ति और अर्थ के संतुलन पर ही चलता है।इनमें से एक भी कम हो तो जीवन की गाड़ी डगमगाने लगती है।कहते तो ऐसा भी हैं कि सरस्वती और लक्ष्मी का वैर है ।दोनों कभी साथ नहीं रहती पर विरले दोनों को साध लेते हैं।इन त्रिदेवियों से तीन बड़े त्योहार जुड़े हैं दीपावली लक्ष्मी गणेश के पूजन का पर्व है तो दुर्गा शक्ति की आराधना का और बसन्त पंचमी तो विद्या की देवी की उपासना है ही।ध्यान आता है विद्यारथी जीवन में किताब कॉपी लेखनी पट्टी स्लेट सब मां सरस्वती के आगे रख देते कि हम खूब विद्यावान बनें ,विद्वान बनें, मां सरस्वती का वरद हस्त हम पर बना रहे।अध्यापिका समझाती थी स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते, फिर मां सूक्ति याद करवाती थी विद्या धनम सर्व धनम प्रधानम, न इसे चोर चुरा सकता है न राजा छीन सकता है व्यय करने से बढ़ता है ले जाने में भारी नहीं है अतः इसकी प्राप्ति में ही जीवन लगा देना चाहिए।
तब से पढ़ ही तो रहे हैं पढ़ते पढ़ते कुछ कुछ पढ़ाते भी रहते हैं।इसी पढ़ने पढ़ाने के दरम्यान सरस्वती पुत्र निराला को पढ़ने का सौभाग्य मिला, आज उनका जन्मदिन है ।याद आ रही हैं पंक्तियाँ जिसे विद्यालय में क्या आज भी गाते गुनगुनाते हैं...वर दे वीणा वादिनी वर दे,प्रिय स्वतंत्र रव अमृत मन्त्र नव भारत में भर दे।काट अंध उर के बंधन सब, बहा जननी ज्योतिर्मय निर्झर,कलुष भेद तम हर प्रकाश भर जग मग जग कर दे ,वर दे वीणा वादिनी वर दे।नव गति नव लय ताल छंद नव, नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव,नव नव के नव विहग वृन्द को नव पर नव स्वर दे, वर दे वीणा वादिनी वर दे।आज सबसे अधिक प्रचलित वंदना है।इसके रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचना राम की शक्ति पूजा मन को साहस से भर देती है कि विपरीत परिस्थितियों से आहत होकर निराश नहीं बैठ जाना चाहिए, उद्यम करना चाहिए।राम आसुरी शक्तियों के भय से साहस नहीं छोड़ देते, वे उनसे लड़ने के लिए उनसे लोहा लेने के लिए शक्ति की उपासना करते हैं।रोज नील कमल लाकर चढ़ाते हैं एक दिन मां उनकी परीक्षा लेती है, वे हाथ बढाते हैं फूल लेने के लिए पर वहां फूल तो है नहीं, बीच पूजा में से उठ नहीं सकते क्या करें तभी ध्यान आता है माँ उन्हें राजीव नयन कहा करती थी, वाण के फलक से अपने नेत्र निकालने को उद्यत होते हैं तभी मां प्रकट होती है राम का हाथ पकड़ लेती है और उन्हें जयी होने का आशीर्वाद देती है जय हो राम पुरुषोत्तम नवीन।राम जयी होते हैं आततायी रावण का संहार करते हैं।संत समाज की प्रसन्नता का कारण बनते हैं।
राम की शक्ति पूजा जन जन के लिए प्रमाण बन जाती है कि शक्ति अर्जित करो,शक्ति की उपासना करो।ये जग विद्या बुद्धि शक्ति और अर्थ से ही जीता जा सकता है।शक्तिहीन को कोई महत्व नहीं देता, उसे सब कुचल देते हैं।क्षमा सोहती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।तो सब राम जैसे शक्ति की उपासना करो, अपनी शक्ति को संगठित करो।सच ही निराला हमें जगा जाते हैं, हम में बोध भर जाते हैं।वे सरस्वती पुत्र कहे जाते हैं, सरस्वती का उन पर वरद हस्त रहा पर वे सांसारिक धर्म का पालन अर्थ के अभाव में नहीं कर पाते।सरोज स्मृति में उनका दुख झलक ही जाता है... बेटी मैं पिता निरर्थक था, तेरे हित कुछ न कर सका।सच जब निराला जैसा व्यक्तित्व केवल सरस्वती की उपासना से अपने पिता होने के दायित्व को नहीं निभा पाया तो सामान्य पिता की वेदना सहज समझ आ जाती है कि धन के अभाव में बेटियां घर से विदा नहीं हुआ करती।वे पिता की छाती पर बोझ बनी रहती है।
ये वसन्त भी न जाने क्या क्या याद दिला देता है।बसन्त का आगमन है तो कोयल अलग कूक रही है, आम पर बौर आ रहा है, ठंडी हवा हाड़ में चुभने के बजाय सुखद लग रही है।सब ओर बासन्ती रंग छाया हुआ है।कवि मन अलग फूट रहे हैं, सरस्वती का वरदान सब को मिलता रहे, माँ शारदे हमें तारती रहें, मन के अंधकार को अपने उजास से भरती रहें, सही रास्ता दिखाती रहें, जो गलत मार्ग पर चलें तो चेताती रहें।बस इतने से ही हमारा वसन्त मन जाएगा।वीरों का वसन्त अलग किस्म का होगा।वीरों का कैसा हो वसन्त रचना सुभद्राकुमारी चौहान की याद दिलाती है... आ रही हिमालय से पुकार,है उदधि गरजता बार बार,प्राची पश्चिम नभ भू अपार,सब पूछ रहे हैं दिग्दिगन्त, वीरों का कैसा हो वसन्त।हैं वीर देश में किंतु कन्त, मिलने को आये आदि अंत,अब यही समस्या है दुरंत,बतला अपने अनुभव वसन्त,दो जगा आज स्मृतियां ज्वलन्त,है कलम बंधी स्वछंद नहीं, फिर हमें बताये कौन हन्त,वीरों का कैसा हो वसन्त वीरों के वसन्त का स्मरण करा देती है।
हम जैसे सामान्य जन तो वसन्त पंचमी पर मां सरस्वती के पूजन आराधन, पीले वस्त्र, पीले मीठे चावल, पीले फूल पाकर ही अपना बसन्त मना लेते हैं फिर बचपन याद आता है कि यदि पीला वसन्ती परिधान नहीं मिला तो रूमाल को ही पीला रंग उसे फ्राक में पिन से टांग और प्रसाद की बूंदी या सूजी का हलवा जिसे केसर डाल पीला कर लिया जाता था, खाकर ताली बजा खुश हो लेते थे कि हमारा भी वसन्त मन गया।कवि पद्माकर की पंक्तियों को दोहराते सभी को वसन्त पंचमी की मंगल कामनाएं.... कूलन में केलिन में,कछारन में कुंजन में ,वनन में बागन में बगरयो बसन्त है।
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