सफर जारी है........838
05.02.2022
कितने कितने ऋण है आम व्यक्ति पर परिवार, समाज, और देश के।बार बार याद दिलाया जाता रहा माता पिता, गुरु और समाज /देश ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता।मातृभूमि के लिए तो स्पष्ट लिख दिया गया कि मां तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन,कर रहा फिर भी निवेदन थाल में लाऊं सजाकर भाल जब कर दया स्वीकार लेना यह समर्पण, प्राण अर्पित गान अर्पित और यह जीवन समर्पित, चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं।प्रकृति हमें देती है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें, सूरज हमें रोशनी देता हवा नया जीवन देती है, भूख मिटाने को हम सबकी धरती पर खेती होती है, जो पिछड़े हैं उन्हें बढ़ाएं जो चुप है उनको वाणी दें सूखी धरती को पानी दें, प्रकृति हमें देती है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।हम देना सीखें तो ऋण भी उतर जाएं पर हमें तो केवल लेना भर आता है देना तो सीखा ही नहीं, देते तो नानी मरती है आता अच्छा लगता है और कहीं छटांक भर भी देना पड़ जाए तो छठी का दूध याद आ जाता है, फूंक सरक जाती है।और कभी मजबूरी में देना भी पड़ जाए तो उसका खूब प्रचार प्रसार करते हैं, दो केले भी देंगे तो अखबार के पहले पेज पर बड़ा सा फोटो आना चाहिए उसमें बोल्ड अक्षरों में अंकित भी होना चाहिए।हम रहीम को बिल्कुल भूल जाते हैं जो देते समय सिर झुका कर देने की बात कहते हैं और गांठ बांधने की नसीहत देते हैं कि बाएं हाथ से दो तो दाएं हाथ को पता भी नहीं चलना चाहिए, नजर नीची रहनी चाहिए और जब उनसे पूछा गया कि कहां से सीखी साह जूं ऐसी देनी देन, ज्यों ज्यों कर ऊपर त्यों त्यों नीचे नैन। और फिर जबाब भी सुन लीजिए देनहार कोई और है भेजत है दिन रैन, लोग भरम हमरो करें ताते नीचे नैन।
सच दिया तो ऐसे ही जाता है चुपचाप, किसी को पता भी नहीं चले, याद हो तो सैंटा क्लॉज देता है तो ढिंढोरा नहीं पीटता,किसी बच्चे के जुराब में तो किसी की टोपी में उपहार रख देता है।बचपन में परियां भी तकिए के नीचे न जाने क्या क्या रख जाती थीं कभी पता ही नहीं चला।बस सब से लेकर पाकर खुश हो लेते थे।जीवन भर लिया ही लिया, माता पिता से लाड़ प्यार पाया तो गुरुओं से शिक्षा दीक्षा, जीवन भर सबसे कुछ न कुछ लेते ही रहे चाहे फिर पड़ौसी हों मित्र या कार्यालयी सहयोगी या कोई अन्य।किसी के आगे हाथ फैला लिया तो किसी से धौंसा के लिया, कहीं झपट्टा मारा तो कहीं चरणों में लोट गए, खुशामद कर ली, हाथ पैर जोड़ लिए, रिरिया लिए ,घिघिया लिए, उसके देहरी की धूल ले ली, इतनी इतनी बार जा पहुंचे कि जूतों के तलवे घिस गए और जैसे ही झोली भर गई ,मनचाहा हाथ आ गया,आंखे नटेर ली ,पतली गली से निकल लिए, फिर पलट कर तक नहीं देखा।तो एक ही सिद्धांत को कस के पकड़े बैठे रहें कछु हमें देबे की बात होय तो लाला कर ले, हम पे टैम नाने। ढीठ की तरह मेरा पेट हाऊ ,मैं न गिनू काऊ।बाकी सबको भाड़ में भेजते रहे।
कभी सोचा है कि किस किस का ऋण है आपके पास जिसे चुकता करना होगा।और नियत समय बीत गया तो ब्याज सहित चुकाना होगा।जितना मिला उसमें से अधिकांश को तो अपना अधिकार और अगले के दायित्व के रूप में परिभाषित करते हैं जिसे सामने वाले को करना ही था, नहीं करता तो और क्या करता।और कुछ को पैसों से चुकता करने की बात कह कर उड़ा देते हैं।गुरुजी शिक्षा देते हैं तो हम शुल्क देते हैं, माता दूध न उतरने की स्थिति में यदि डिब्बे का दूध पिलाती है तो उसका मूल्य पैसों से चुका देते हैं, लिखा पढा तो यह था कि जननी और जन्मभूमि का ऋण कभी उतारा नहीं जा सकता, हां,उनकी सेवा सुश्रूसा कर उनका आशीर्वाद लेकर अपनी जिंदगी को ख़ुशनुमा अवश्य बनाया जा सकता है।जैसे उन्होंने हमें जन्म दिया, हमें पाला पोसा, हमारा लालन पालन किया वैसे ही हम भी वंश बेल को बढाएंगे, भविष्य की जागरुक और समझदार पीढी तैयार करेंगे,जिनका कोई नहीं जो अनाथ हैं जो अकेले हैं जो असहाय हैं जिनके सिर पर छत नहीं पेट भरने को भोजन नहीं ,उनको आश्रय देंगे, उनके पैरों की जमीन और सिर की छत बनेंगे, उनके सिर पर हाथ फेरेंगे उनकी पीठ थपथपाएँगे,पर हमें अपने से मुक्ति तो मिले,स्वयम में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि किसी दूसरे का ख्याल कहां से आये।अपना ही नहीं निबट के देता अगले की तो सब सोचें।
भारतीय परंपरा तीन ऋण की बात करती है देव ऋण ,ऋषि ऋण और पित्र ऋण। हम घर के सामान को लोन पर लेते हैं,उनकी किश्तें भी चुकाते हैं पर जिन ऋनों को चुकाना जरूरी है उनकी बात तक नहीं करते।बिना ऋण चुकाए तो मुक्ति नहीं हुआ करती अर्थात फिर फिर आना होगा इसे चुकाने के लिए।बेहतर है थोड़ा थोड़ा रोज चुकता करते चले नहीं तो ये बोझ बढ़ता ही जायेगा।
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