सफर जारी है...837
04.02 2022
दुनिया में बिल्कुल परफेक्ट तो शायद ही कोई विरला होता होगा, सब में कुछ न कुछ मिसिंग रहता है और इसीलिए वह मनुष्य है।सबसे मिल जुल कर रहता है।जानता समझता है बहुत दौलत होने से कुछ नहीं होता,सब कुछ होते भी लोगों की ,नाते रिश्तों की जरूरत पड़ती है, आखिर मानुख सामाजिक प्राणी जो है।वह शून्य में परिवर्धित पल्लवित नहीं होता। अपने परायों के जनसमूह के बीच ही वह आकार लेता है, उसके व्यक्तित्व को शेप मिलती है।जितने कष्ट कंटको के मध्य जिनका जीवन सुमन खिला, गौरव गन्ध उन्हें उतना ही यत्र तत्र सर्वत्र मिला।विपरीत परिस्थितियों में ही आपके व्यक्तित्व की पहचान होती है।आप मुसीबतो से घबराकर रास्ते से हट जाते हैं या दृढ़ता से आने वाली परिस्थितियों का सामना करते हैं।आप धैर्य पूर्वक चिंतन करते हैं, चिंता नहीं।चिंता तो आपको भीतर ही भीतर सुलगाती है पर चिंतन से रास्ते खुलते हैं, समस्याओं के समाधान नजर आते हैं।आप अपने से हाथ पैर मारते हैं, जो सम्भव होता है उसे करते हैं और जो बस का नहीं होता उसे ईश्वर इच्छा पर छोड़ देते हैं।वैसे भी सब मानुष के हाथ होता कब है।वह तो अपनी सी कोशिश भर करता रहता है, नदी तालाब सरोवर में गिर पड़े तो तैरना न जानते भी पानी में हाथ पैर मारता रहता है,बचने के यत्न करता है।
रचनाकार राकेश मोहन के आधे अधूरे पढ़ते लगा कि हम सबकी जिंदगी का सच यही तो है।परिवार बसाये ही इसलिए जाते हैं कि सबको सबके सहयोग की जरूरत होती है।किसी सदस्य में कोई विशेष योग्यता है तो दूसरे में कुछ दूसरी।कोई कुछ कर सकता है कोई कुछ।किसी में शारीरिक बल प्रधान होता है तो किसी की मानसिक योग्यता अधिक होती हैं, कोई मेधा सम्पन्न होता है तो कोई सीरा धीरा पर सब मिलकर सध जाता है।किसी की उपेक्षा नहीं होती, सबको साथ लेकर चला जाता है।चार पांच बालको में से एक आध तो बाबरा, लल्लूझप्पन सा निकल ही जाता है पर दिन भर उसकी आलोचना नहीं की जाती।उसकी क्षमता अनुसार उनसे काम लिया जाता है।
हम बहिनों में कोई घर के काम निबटाने में सिद्ध हस्त थी, ऐसी सुघड़ता से सब्जी काटती कि बस खाने में आनन्द आ जाये।दूसरी बाहर बास के काम में नम्बर वन, तीसरी पढाई लिखाई में ऐसी जोरदार कि हमेशा अब्बल आती।भाई मेल मिलाप करने में सिद्ध हस्त, पिता बहिर्मुखी और माँ इतनी शर्मीली संकोची कि किसी से बात करे तो चेहरा लाल पड़ जाए।पिता जी एकदम फक्कड़ स्वभाव के और माँ बहुत व्यवस्थित रहने वाली।अक्सर पिता से कहा करती कि समुद्र मंथन में सुघड़ सुंदर सुरुचिवान पीतांबर धारी विष्णु को लक्ष्मी और औघड़दानी भस्म रमाये महादेव बाबा को कालकूट विष पीने को दिया गया जिससे उनका नाम ही नीलकंठ पड़ गया ।आश्चर्य होता है कैसे बिल्कुल विपरीत स्वभाव के दो व्यक्ति लड़ते झगड़ते हंसते रोते, गपियाते, आलोचना करते एक दूसरे में मीन मेख निकालते कभी बहस करते कभी चुपाते वर्षों गुजार देते हैं ,जितना मर्जी लड़ भिड़ लें कह सुन लें पर बाद में सुलह हो ही जाती हैं। साथ रहते रहते एक दूसरे में कैसे रम जाते हैं, एक दूसरे की महत्वपूर्ण जरूरत बन जाते हैं, एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं।एक के बिना दूसरे को कल नहीं पड़ती।लड़ते झगड़ते खूब हैं, क्रोध में आ जाएं तो चीख चिल्लाहट करते हैं, एक दूसरे की कमियों को रेखांकित करते आलोचना के शिखर पर पहुंच जाते हैं ,एक दूसरे की सात पुश्तों को कोस लेते हैं, खोद खोद कर गढ़े मुर्दे उखाड़ते हैं और अगले ही क्षण मौन हो जाते हैं, बिल्कुल चुपा जाते हैं, सब जगह सन्नाटा पसर जाता है ।कह सुन कर मन की भाँय निकल जाती है फिर एका हो जाता है।जाएंगे भी कहाँ वे, तोकू ठौर न मोकू और।कहना कबाना सुनना सुनाना तो लगा रहता है पर रहना तो साथ ही है।लाख लड़ भिड़ लें पर रात बीतते अधिकतम दो एक दिन बीतते सब सामान्य हो जाता है।
आधे अधूरे में रचनाकार एक मध्यवर्गीय परिवार का चित्र ही खींचता है न, दो बेटी एक बेटा, सेवानिवृत गृह स्वामी और नौकरी पेशा गृहिणी।सब अपने अपने में खीझे खीझे रहते हैं, सब जगह या तो तनाव पसरा रहता है या चुप्पी।जो बोलता है बोलता क्या है भुनभुनाता अधिक है।सबको निजी व्यक्ति से अधिक दूसरे में खूबियां अधिक दिखती हैं, जिसके साथ रह रहे हैं उसमें केवल दोष ही नजर आते हैं।जानते वे भी हैं कि जो आज आंखों में बसा हुआ है उसके साथ रहने की नौबत आ जाये तो हफ्ते दस दिन में ही सब चन्दा तारे नजर आ जाएं, सारी खूबियां कमियों में बदल जाए।दूर के ढोल सुहावने और पराई थाली का भात तभी तक मीठा है जब तक वह हमसे दूर है।दुनिया के श्रेष्ठतम स्त्री पुरुष दम्पत्ति बनते एक जैसे धरातल पर ही आ जाते हैं।फिर वही नुक्ताचीनी वही कड़वे मीठे बोल वही कहासुनी क्योंकि उन्हें बहुत सारे काम मिलजुल कर करने होते हैं, बच्चों की जिम्मेदारी दोनों की साझा है, उनकी पढाई लिखाई ब्याह शादी नौकरी चाकरी सब की चिंता साझी है, साझा चूल्हे हैं तो वे अपने में पूर्ण कैसे हो सकते हैं, एक दूसरे से कुछ कुछ लेते उनकी पूर्णता होती है।एक गिरता है तो दूसरा आगे बढ़ कर संभाल लेता है, एक चोटिल होता है तो दूसरा मरहम लगा देता है, एक बीमार होता है तो दूसरा सेवा करने तीमारदारी करने आगे आ जाता है एक डुगलाता है तो दूसरा सहारे को आगे आ जाता है।
सच ही हम सब आधे अधूरे हैं, घर घर में मोहन राकेश के आधे अधूरे नाटक की कहानी दोहराई जाती है।तभी अर्ध नारीश्वर की कल्पना की गई कि दो मिलकर ही पूर्ण होते हैं।एक अपना कुछ छोड़ता है तो दूसरा कुछ, तभी एक होने की कल्पना पूरी होती है।
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