सफर जारी है
22.03.2022
बातें मोहक होती हैं,मन मोह लेती हैं, बातों ही बातों में प्यार हो जाता है, बातें गढ़ जाती है, चुभ जाती हैं, बातें खिसिया देती है,बातें उत्तेजित करती हैं, बातें क्रोध दिलाती हैं, बातें आवेश में ले आती हैं, बातें कुछ कर गुजर जाने को प्रेरित करती हैं,बातें जिला देती हैं, बातें जीते जी मार देती हैं, बातें रुला देती हैं, बातें हंसा देती है।आखिर बात बात होती है और जहां सलीके से कही बात आपका सौ दो सौ ग्राम खून बढा देती है तो उज्जडता और बेहूदगी से कही गई बात आपके पूरे सिस्टम को हिला कर रख देती है।
बात अपने में भला होती क्या है कुछ शब्दों का समुच्च्य ही न ,कभी शब्द मोती की तरह पिरो माला बन जाते हैं तो कहीं क्रोध आक्रोश और जहर उगलते सामने वाले को धड़ धड़ धड़ गिराते चले जाते हैं।कुछ भी साबुत नहीं छोड़ते न दिल न दिमाग।बस एक तीखी तेज कटार से अगला पिछला सब काटते चले जाते हैं।काटते उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि वे उसी पेड़ की डाली हैं,शाखा हैं, फूल हैं, पत्ती हैं।मूल पर बार बार चोट करते यदि एकबारगी सब तहस नहस हो गया तो क्या तुम्हारा अस्तित्व बच पायेगा।मूल को सींचे बिना तो पेड़ भी नहीं लहलहाते भले ही फुलक को बाल्टी भर सींचते रहो।पर जब अगला कहता है तो अपने अंदर का सारा गन्द, सारा कीचड़, सारा मैल, सारा आक्रोश, सारी भुनभुनाहट ,सारी खुदगर्जी रह रह कर निकालता जाता है।उसे कब याद रहता है कि उसने क्या क्या कह दिया है।वह तो बस अपने को खाली करता जाता है,करता जाता है और जब एकबारगी खाली हो जाता है तो फिर नए सिरे से अपने को भरना शुरू करता है। सात पुश्तों की बात याद करता है, गढ़े मुर्दे उखाड़ता है, अनेक बार कही गई बातों को बारीक बारीक काटता पीसता है। सुनाने के लिए अपने भार को टांगने के लिए वही खूंटी चुनता है जो सब लाद लेने को तैयार हो, सीमा से अधिक वजन उठा ले, रो झींक भले ले पर अगले का रंच मात्र अहित न करे।
जो ज्यादा बोझ से खूंटी लहक गई कि टूट ही गई तो क्या जल्दी ही नई खूंटी मिल जाएगी, टूटी हुई का क्रियाकर्म तो करोगे या उसे यू ही कबाड़ में डाल दोगे।आखिर तो इतने लम्बे समय तक तुम्हारी कहनी अनकहनी का बोझ चुप उठाये चली जा रही है कि कभी तो अगले को बुद्धि आएगी,कभी तो सोच पायेगा कि आखिर वह बोल क्या रहा है। ऐसों को अपसेट माइंड की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, वे डिमेंशिया के शिकार तो बिल्कुल भी नहीं है, होते तो उन्हें अपने और अपनो के हित की एक एक बात भला याद रहती , वह अपने को कहीं कच्चा नहीं पड़ने देते, आश्चर्य की बात है लाख गुस्से में हों ,कहीं गच्चा नहीं खाते।विष बुझे तीर जने कहां कहां से निकाल कर लाते हैं कि उनका कोटा कभी खत्म नहीं होता।वे सीखे सिखाये पढ़े पढाये हैं, सारा दिन सी आई डी की तरह नये नये प्लान गढ़ने में लगे रहते हैं।उन्हें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितना बहूमूल्य समय यों ही बीता जा रहा है।सुनने वाले का क्या, वह तो तब तक सुन रहा है जब तक चिपक है ,लाग लपेट है, सम्बन्धो की ऊष्मा है नहीं तो छूटने में भला कितना समय लगता है।चाहे तो सब वहीं का वहीं झाड़ झूड कर मुक्त हो जाये , अगला पिछला सब हिसाब चुकता कर ले। ब्याज को छोड़ भी दे तो भी मूल ही इतना है कि देते देते चुक भले जाओ पर भाव सम्पदा का दस अंश भी न चुका पाओ।अरे कुछ देना भी सीखो, देना भौतिक सम्पदा का ही नहीं होता,किसी के मीठे वचनों का ही प्रतिदान दे दो।और जो देना सीखे ही नहीं हो तो कम से कम वाणी की शुचिता तो बनाये रखो।अगला तो इतने से ही भर पायेगा।कौन वह तुमसे कुछ लेने आया है, प्यार के दो बोल सबसे बड़ी नेमत कहे जाते हैं, उनमें तो कम से कम कंजूसी मत बरतो।वचने का दरिद्रता।
फिर ये भी याद रखना जरूरी है कि ये सब खट्टी मीठी बातें किसी को चिपट नहीं जाती, वह तो धूल सी झाड़ कर आगे बढ़ जाता है पर तुम्हारा आंकलन खूब हो जाता है कि कितने पानी में हो।छोड़ो यार ये बातें हैं बातों का क्या।
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