Thursday, May 19, 2022

का करि सकत कुसंग

 सफर जारी है

24.03.2022

सत्संगति किम न करोति पुनसाम, बड़ी महिमा गाई गई है सत्संगति की।सज्जन पुरुषों का साथ ही सत्संगति है और सज्जन पुरुषों का अर्थ भी बता दिया गया कि जिसे देख आपकी बांछे खिल जाए वे होते हैं संत।बड़े भाग तब जानिए जब मिलने आबे सन्त, सन्तन को मिलनो करे सब दुखन को अंत।सन्त हिरदय नवनीत समाना जो पराये दुख से भी द्रवित हो जाता है।परोपकाराय सतां विभूतय:।फिर सन्तो के लक्षण भी गिना दिए गए कि वृच्छ कबहू नहि फल भखे नदी न सन्चे नीर, परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर।चित्त प्रसन्न हो जाता है, बुद्धि की जड़ता दूर होती है,वाणी में सत्य का संचार होता है पाप दूर होता है,और भी जाने क्या क्या संतों के मिलने से सम्भव हो जाता है।सो एक सूत्र रटा दिया गया कि हमेशा अच्छे लोगों का संग करो।

पर दुनिया तो संतो के साथ असन्तों से भी भरी पड़ी है तो कैसे चुनें सज्जनों को तो उसके भी उपाय गिना दिए गए, आबत ही हरषे नहीं नैनन नहि सनेह, तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसत मेह।रहीम भी पट्टी पढ़ाते रहे रहिमन रहिला की भली जो परसे चित लाय, परसत चित मैलो करे सो मैदा जरि जाए।कबीर भी हाथ भर आगे बढ़ आये रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पीब, देख पराई चूपरी मत ललचावे जीभ।सो अच्छे बनने भले बनने और बुरों से बचने की सीख सब देते रहे पर दुनिया में केवल अच्छे ही अच्छे थोड़े ही भरे पड़े हैं तो यह भी सिखा बता दिया गया कि कहो रहीम कैसे निभे बेर केर को संग, वे डोलत रस आपने उनके फाटत अंग।फिर भी ऐसों के साथ रहना ही पड़ जाए तो जिमि दसनन महुँ जीभ बिचारी जैसे रहो, विभीषण रहा कि नहीं रावण की लंका में, प्रह्लाद हिरण्यकशिपु के साथ और ध्रुव सुरुचि के साथ जिसने उसे पिता की गोद से ही उतार दिया और माता सुनीति ने भगवान प्राप्ति की राह दिखा दी।तो असज्जन मिल जाये, उनके पड़ोस में बसना ही पड़ जाए तो  उनसे भिडो मत, उपेक्षा भी मत करो उन्हें बुरा लग गया तो तुम्हारी सात पुश्तो तक की खबर ले लेंगे तो तुलसी बाबा लिख गए बन्दो संत असज्जन चरना।अटको मत, अपनी राह चले चलो फिर भी दुष्ट बीच में आ जाये तो हाथ जोड़ लो।भिड़ोगे तो तुम्हारा ही टाइम खोटा होगा, उसका क्या बिगड़ना है भला ,वह तो पहले से ही बिगड़ा हुआ है।

    सो पहले तो कुसंग से बचने की कोशिश करो और जो मान लो कि उनके साथ रहनव ही पड़ जाए तो चन्दन बन के रहो।अपनी प्रकृति उत्तम रखो, तुम क्यों किसी से प्रभावित होते हो, प्रभावित करना ही है तो अपनी सद प्रवृत्ति से उसे प्रभावित करो।देखो चन्दन के वृक्ष पर ढेरों सांप लिपटे रहते है पर चन्दन तो अपनी शीतलता छोड़ उनका विष ग्रहण नहीं करता।बल्कि अपनी खुशबू से उन्हें ही तर रखता है।न मानो तो याद कर लो रहीम दादा की बात.. जो रहीम उत्तम प्रकृति करि सकत कुसंग, चन्दन विष व्यापत नहिं लपटे रहत भुजंग।रात दिन भुजंगों से घिरा रहकर भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता, विष ग्रहण करना तो दूर रहा।सो कैसे बना जाता है चन्दन वृक्ष सा जो जितना घिसा जाता है उतनी ही सुगन्ध देता है, माथे पर लेप करो तो शीतलता देता है।तुलसी इसी चन्दन को लगाने के ब्याज से ही तो राम लक्ष्मण राजकुमारों के दर्शन कर पाते हैं।चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीड़, तुलसी दास चन्दन घिसे तिलक देत रघुवीर।

    कैसे हुआ जाता है चन्दन सा शीतल कि दिन रात भुजंगों के मध्य रहकर भी उनका विष तनिक प्रभावित न करे।यहां तो भुजंग ही अपना विष छोड़ते रहते हैं, डसने को हरदम जीभ लपलपाते रहते हैं।सारा दिमाग ही खराब कर देते हैं।सारी की सारी अक्कल घास चरने चली जाती है।उनकी जहर बुझी बातें इतना असर छोड़ जाती है, दिल में ऐसी धंस गढ़ जाती हैं कि उससे आगे कुछ सूझता नहीं है।बहुत पहले एक मित्र ने कहा था क्यों दूसरे की दुष्टता से प्रभावित हो जाते हो, तुम्हारी सज्जनता का असर माहौल पर क्यों नहीं पड़ता।अगला गलत होते भी कैसे प्रभावी हो जाता है और तुम सत्यवादी और सही होते सोते भी उसके जाल में कैसे फंस जाते हो, क्यों इतना प्रभावित हो जाते हो कि अपने को ही चौपट कर बैठते हो।तुम्हारी अच्छाई सज्जनता सामने वाले को प्रभावित क्यों नहीं कर पाती, एक अच्छा हो तो पूरे माहौल को खुशनुमा कर देता है तो तुम कैसे हर बार बुराई के आगे सिर झुका उससे प्रभावित हुए रहते हो, यानी सीधी सी बात है तुम्हें चन्दन होना नहीं आता।हो जाते तो लिपटे रहें भुजंग तुम्हारा बाल बांका भी नहीं कर पाते।कुसंग की आयु ही कितनी होती है, साधु जब अपनी सज्जनता से वाल्मीकि जैसे डाकू को मरा मरा जप में लगा राम का चरित्र लिखबा लेते हैं, बुद्ध अंगुलिमाल की आंखों में आंखे डाल अपने चरणों में झुकने को विवश कर देते हैं, बाबा भारती खड़गसिंह को सुल्तान घोड़े को अस्तबल में बांधने को विवश कर देते हैं तो तुम्हारी अच्छाई तुम्हारी सज्जनता दुष्टों पर प्रभाव क्यों नहीं छोड़ पाती। अब या तो तुम्हारी सज्जनता सोलह आने खरी नहीं ,उसमें कुछ मिलावट है या अगले के संस्कार ऐसे गहरे हैं कि कारी कामर पर दूजा रंग नहीं चढ़ता।सो चन्दन बनो चन्दन कि भले ही सैकडों भुजंग लिपटे रहें पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़े,उस पर विष का प्रभाव हो ही नहीं।सो चन्दन बनो चन्दन।प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी।तुम्हारी सुगन्ध सामने वाले जे नथुनों में घुस जाए, व्याप्त हो जाये,चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग।और जो रहीम उत्तम प्रकृति का कर सकत कुसंग।vv

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