Thursday, September 15, 2022

ये अविस्मरणीय यात्राएं

 सफ़र जारी है....1058

17.09.2022

ये अविस्मरणीय यात्राएं......

यात्राएं बहुत अनुभव संपन्न बनाती हैं बशर्ते आप आंख कान खुले रखें।गुजरात से गुजरात यानि सूरत से अहमदाबाद की यात्रा ने समझाया कि खाखड़ा, फाफड़ा,थेपला, गांठिया, खारे में भी मीठा, सींगदाना, कपडे , गरबा और हीरे का पर्याय ही  नहीं है गुजरात, बल्कि इससे इतर भी बहुत कुछ है जो गुजरात को गुजरात बनाता है। यहां की मिटटी में कुछ तो खास है जो इसे औरों से अलग करता है। नर्मदा, गोदावरी और कावेरी की त्रिवेणी है यहां, साबरमती है, यह गांधी और कालेलकर की जन्मभूमि है, लोग मिलनसार है, उनकी बोली में मिठास में है और सबसे बड़ी बात है कि अगले को ठगने का भाव नहीं। साबरमती के संत का आश्रम है, बा कुटीर 

 है, उसे देखते देखते वर्धा का सेवाग्राम  याद आ जाता  है।

               सच तो यह है कि कोई भी शहर आपके दिल और दिमाग़ में जगह बनाता है कि आपका संपर्क कैसे लोगों से हुआ, कौन कौन मिला, किस किस से मुलाकात हुई, किस किस को सुना आदि आदि। ये सारे के सारे प्रभाव आपकी यात्रा को सुखद अथवा कष्टकारी बनाते हैं। फिर आपके स्वभाव पर भी निर्भर करता है कि आप स्थितियों को किस तरह ग्रहण करते हैं, खुशमिजाज हैं या रोतडे हैं, छोटी छोटी बातों को दिल से लगा लेते हैं या हर फिक्र को धुंए में उड़ाते चलते हैं। आज सभा को संबोधित करते माननीय शास्त्री जी ने जब पुण्य का अंग्रेजी वर्जन पूछा तो सब बिलकुल मौन हो गए। उसका अंग्रेजीकरण हो ही नहीं सकता क्योंकि उस भाषा में पुण्य की कल्पना है ही नहीं ।विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी के कार्यान्वयन में जुटे लोगों से मिलकर लगा कि विद्यालय, महाविद्यालयों, संस्थानों के अतिरिक्त भी हिंदी खूब फल फूल रही है। सब खूब खूब काम कर रहे हैं। बहुत जागरूक और समर्थ है। सबके पास सपने हैं, मंजिल की ऊंचाइयां है, साधन भले से कम हों लेकिन जज्बा कमजोर नहीं है। कुंए के मेढक बने बैठे रहो और उसी पानी को जगत समझते रहो तो तुम्हारी मर्जी, काम की अधिकता का रोना रोते रहो, उसे ही घोटते पीसते रहो तो कोई क्या कर सकता है। बाहर बास निकल कर समझ आता है कि हम कितने पानी में हैं, हमें क्या क्या और सीखना है, हम पिछड़ क्यों रहे हैं, अपने को अपडेट क्यों नहीं कर पा रहे हैं। असली मूल्यांकन तो बराबर वाले लोगों में बैठकर ही होता है नहीं तो घर में ही अपुन तुपन कर के तीसमारखा बनते रहो, मैं ये मैं वो करते रहो, जंगल में मोर नाचा किसने देखा।

      कितना कितना काम करते हैं लोग, केरल के संतोष अलेक्स ने जब बताया कि अनुवाद पर इनकी इतनी इतनी किताबें प्रकाषित हैं और तीन विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में लगी हैं तब लगा हम तो यूं ही रह गए। लोगों से मिलिए तो ,तब अपना आंकलन होता है, तब ऊंट पहाड़ के नीचे आता है। इस हवाई यात्रा में छोटी सी मुलाकात में ही गहरी छाप छोड़ गई पंजाब नेशनल बैंक, देहरादून की राजभाषा अधिकारी अरुणा ज्योति , जो पत्रिका भी निकालती हैं, खूब लिखती पढ़ती हैं, खूब व्यवहार कुशल और खुशमिजाज है, जल्दी ही सबके दिलों में जगह बना लेती हैं, बिंदास जीती हैं। अभी भी उसका मुक्त हास्य कानों में गूंज रहा है। प्रिय विशेष, अनामिका सिन्हा, परमेश्वर पाठक, डाक्टर अर्चना दुबे और भी न जाने कितने कितने परिचित चेहरे गड्डमद्द हुए जा रहे हैं, कुछ की शक्लें दिमाग में चस्पा हैं लेकिन नाम याद नहीं आ रहे हैं। और जो आज की यात्रा के वाहन चालक थे, रवी व्यास उनके शिष्ट व्यवहार ने  बहुत प्रभावित किया। वे जब अपने परिवार के विषय में जानकारी दे रहे थे तो लग रहा था लोग वैसे ही संस्कार हीनता की बात करते हैं, संस्कारी पिता अपने बच्चो में कूट कूट कर संस्कार भर देता है। दरअसल वह निर्देश देकर या उपदेश देकर नहीं सिखाता, अपने आचरण और व्यवहार से कथन को पुष्ट कर देता है, कहने की तो जरूरत ही नहीं पड़ती।

      यात्राएं मुझे अनुभव की दृष्टि से बहुत संपन्न करती हैं। हर बार कुछ नए पाठ जुड़ जाते हैं। अभी कल के प्रसंग और शेष है और फिर परसो सुबह जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पे आबे, की तर्ज पर अपने कार्यस्थल पहुंचे जाते हैं। सूरत यात्रा से जुड़े सभी सहयोगियों का आभार कि यात्रा को सुखद और अनुभव संपन्न बनाया।

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