सफर जारी है........1037
26.08.2022
हम रहें न रहें, संस्था ये रहनी चाहिए......
मजबूत राष्ट्र के लिए जरुरी हैं ऐसी संस्थाएँ जो राष्ट्र के लिए देशभक्त नागरिकों का निर्माण ही नहीं करती, बल्कि उन्हें स्वतंत्र चेता भी बनाती हैं। उनमें राष्ट्र भक्ति के भाव को कूट कूट कर भरती हैं। वे केवल पढ़ लिख कर शिक्षित ही नहीं होते, बल्कि संस्कारित और दीक्षित भी होते हैं। देश के लिए मर मिटने बलिदान होने का सपना केवल सैनिक ही नहीं पालते, विभिन्न संस्थाओं में कार्यरत कार्मिक भी संजोए रहते हैं। जरुरी नहीं कि सीमा पर सिर कटा कर आने या दुश्मन के सीने में दस बीस गोली मारना ही वीरता हो, मेडल पाना ही शौर्य की निशानी हो। देश से पहले संस्था जिसमें आप अपनी रोजी रोटी कमाते हैं, समाज जिसमें आपका अधिकांश समय गुजरता है, पड़ोस जिसके साथ आप की रोज की उठा बैठक होती है , घर जो आपको दिन भर की थकान के बाद विश्राम देता है, जिसके आप अनिवार्य सदस्य होते हैं, में आपकी भूमिका बहुत निर्णायक होती है।
सच पूछें तो सारी शुरुआत घर से ही होती हैं, बोलने चालने, खाने पीने, ओढ़ने पहनने और छोटो बड़ो के साथ व्यवहार करने का सबूर तो घर से ही ग्रहण किया जाता है, अच्छी बुरी आदतों का बीज तो वहीं रोपा जाता है, मूल्य तो वहीं विकसित किए जाते हैं। जी कारे या तू तड़ाक से बोलना भी वहीं से सीखते हैं, बड़ो के साथ दुर्व्यवहार, असभ्य और अशालीन भाषा भी वहीं सीखी जाती है और स्त्री जाति के सम्मान या बात बात पर उन्हें लताड़ने, उन पर अपना पौरुष आजमाने की सीख भी वहीं से मिलती है। ये आदतें जिन्हें हम बचपना या लड़कपन या बाल हठ कह सिरे से नकार देते हैं ,जिन पर लाड प्यार लुटाते यह बिलकुल भूल जाते हैं कि हम समाज के लिए ऐसे नासूर तैयार कर रहे हैं जो समय पाते लाइलाज हो जायेंगे।
बिजली पानी की बचत की आदत घर से ही पड़ती है न। जिन्हें इनके प्रति असावधान होने का चस्का लग जाता है ,वे छोटी बड़ी जिस मरजी संस्था में पहुंच जाए, मरजी चाहे जिस बड़े से बड़े पद पर पहुंच जाए , जीवन भर उन्हीं आदतों का शिकार बने रहते है। एक बार अपने से बड़ो की अवज्ञा की जो आदत पड़ी, वह जिंदगी भर नहीं छूटा करती। क्रोध को नियंत्रित करना नहीं आता , उसका सही स्थान और सही तरीके से अभिव्यक्ति नहीं आती तो हर छोटी बड़ी बात पर आक्रोश ऐसे फूटता है कि सब गुड गोबर हो जाता है, इतने जोर जोर से चिल्लाते हैं कि डर के मारे सब एक कोने में छिप जाते हैं। घर परिवार से निकल संस्थाओं में सेवा देने जाते ये बाशिंदे लाज शर्म सब को ताक पर उठा कर रख देते हैं। जरा सा काम का दबाब क्या बढ़ जाए, बस फूट पड़ते हैं। धीरज तो नाम मात्र का नहीं, बस उतावले हैं कि एक ही सांस में सारी सीढ़िया चढ़ ली जाएं, और अब तो सीढ़ियों की भी जरूरत नहीं रही, लिफ्ट जो हैं जो बटन दबाते ही उन्हें निर्धारित स्थान पर ले जाती हैं। इससे उनका समय और श्रम दोनों बचता है फिर भले ही जॉगिंग और एक्सरसाइज के लिए जिम में जाने और साइकिल चलाने की कवायद क्यों न करनी पड़ जाए।
जल्दबाजी में कुछ भी कच्चा पक्का पेट में डाल लेना या बिना भूख खूब ठूंस ठूंस के खा लेना और फिर डाक्टर की शरण लेना यानि पहले बीमारी को आमंत्रण देना और फिर उसका इलाज करने में एडी चोटी का जोर लगा देना। पहले समय से न सोना न उठना और फिर नौकरी पर जाते हड़कंप मचाना, घर भर को हिला कर रख देना। इन सिपाहियों को किस फ्रंट पर लड़ने भेजा जा सकता है जो स्वयं में ही समस्या के रुप में तैयार हो रहे हैं।
कोई भी संस्था ईंट मिट्टी गारे सीमेंट से ही नहीं बना करती, उस पर महंगे रंग रोगन करने से ही नहीं चमका करती। उसमें काम करने वाले सद्स्यों की कर्मठता उसके सबसे बड़े आभूषण होते हैं, सद्व्यवहार और पारस्पिक सौहार्द, नियमों का पालन, कठिन श्रम, अधिकारी के निर्देशों का यथोचित पालन , छोटे बड़ों से बोलने के यथायोग्य तरीके उस में जड़े वे नगीने होते हैं जिससे संस्था चमकती हैं। सदस्यों का भरपूर आत्मविश्वास और कार्य को सीखने की ललक उन्हें कार्य दक्ष बनाती है। और ये कार्यकुशल सदस्य संस्था के प्राण कहे जाते हैं। संस्था के कार्यो के उत्तरदायित्व को निजी भाव से ग्रहण करते ये सैनिक खुद तो ऊंचे उठते ही है, साथ ही अपनी संस्था को भी यथोचित गौरव दिलाते हैं। कार्मिक ही तो संस्था की आत्मा है। उसकी धुरी हैं, जहां वे जरा सा चूके, सब सिस्टम गड़बड़ा जाता है।
तो बने रहें ये सैनिक मुस्तैद, लगे रहें अपने अपने कार्यों में, बढ़ते रहें प्रगति पथ पर निरंतर। व्यक्ति के सम्मान से बढ़ कर संस्था का मान होता है। व्यक्ति आते जाते हैं, पर संस्थाऐं बनी रहती हैं। घर का मुखिया अपने मान अपमान को भूल भुला घर की नींव को मज़बूत करता है, उसमें सेंध लगाती, उसकी जड़ खोदती ताकतों से बचाब में लगा रहता है और संस्था का शीर्षस्थ स्वयं को भुला बिसरा संस्था के मान की रक्षा में लग जाता है। व्यक्ति तो आते जाते रहेंगे पर संस्थाऐं बची रहनी चहिए, इनकी कार्य संस्कृति का क्षरण नहीं होना चाहिए, हर छोटे बड़े सदस्य को अपने निजी स्वार्थों को परे रख इसके मान की रक्षा में लग और जुट जाना चाहिए। तो बनी रहें ये राष्ट्र भाव को पोषित करती ये संस्थाए, हम रहें न रहें।
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