Wednesday, August 17, 2022

रे मन, काहे को हुआ

 सफर जारी है..... 1024

14.08.2022

रे मन, काहे को हुआ......

हमाए ब्रज की हर बात निराली , खाने पीने के इतने शौकीन कि त्योहार वार व्रत उपवास और पर्व विशेष के ब्याज से मीठा खाने के बहाने तलाश ही लेते हैं । बस त्योहार का नाम भर हो, पकवान तो बनना ही बनना है। पकवान का एक विषेष मीनू तय है यानी पूरी कचौरी रसेदार और सूखी सब्जी रायता दही बूरा खीर तो मस्ट है बाकी जितने मर्जी व्यंजन बनाओ तिहाई मज्ज़ी। मीठे के इतने चींटे कि सावन भादों के लिए कहाबत ही गढ़ ली सावन खाई न खीर, भादों खाए न पुआ, रे, मन काहे को हुआ। सावन में मेहमान बूरा खाने विषेष रुप से बुलाए जाते हैं कि तीज से नैहर आईं बहन बेटी राखी पर फिर अपने घर विदा हो जाती है। नई ब्याहता के सासरे से तो बाकायदा सोहगी यानी साज श्रंगार की पोटली आती है और मेहमान की दही बूरा से खूब खातिरदारी होती है सावन में खीर का शगुन न हो और भादों में गर्मागर्म पुए न खाये जाए तो जीवन बिलकुल निरर्थक हो जाता है।

जब कभी बहुत नखरे दिखाकर रूठे बादल अहसान दिखाते थोड़े से बरस लिए, दो चार छींटे पड़ गए तो उसे ही सावन मान लेना मजबूरी थी। अरे मूसलाधार की औकात नहीं थी तो लगातार रिमझिम ही होती रहती, कम से कम सावन का अहसास तो होता रहता। पर ना जी, बादलों का इससे क्या मतलब, वे तो लदे खड़े रहेंगे, मार उमस मचाए रहेंगे पर बरसेंगे नहीं, यूं ही ललचा ललचा कर चले जाते हैं। भूरे काले बादलों को देखकर गुनगुनाते भले रहो कि कालो बादर जी डरपाबे, भूरो बादर पानी लाबे पर इन बादरन पर कोई असर नाने। निरे ढीठ के दीठ है। खूब खुशामद सी करते रहो, कविता दोहराते रहो कि अम्मा जरा देख तो ऊपर चले आ रहे हैं बादल, गरज रहे हैं बरस रहे हैं दीख रहा है जल ही जल, हवा चल रही क्या पुरवाई भीग रही डाली डाली, ऊपर काली घटा घिरी है नीचे फैली हरियाली, भीग रहे हैं खेत बाग बन भीग रहे हैं घर आंगन, बाहर जाऊ मैं भी भीगू चाह रहा है मेरा मन। पर मन के चाहने भर से भला किया होता है। बादलों के मन में भी तो दया भाव होना चाहिए। पर वे तो ऐंठ के मारे पैठ को जा रहे हैं। सावन पूरा सूखा बीत गया, अब तो बरसो महाराज। भादों लग गई, गरजो गड़गड़ाओ तो कम से कम गाज तो बांध लें। हां हां वही गाज जिसके लिए कहा जाता है ऐसी क्या गाज पड़ गई तेरे ऊपर या ऐसी गाज पड़ी है फलाने पर कि क्या बताएं। बादल फटना, बिजली गिरना अच्छे मानसून के लक्षण हैं। अब गाज बंधेगी तभी तो दस दिन बाद खोली जाएगी। भादों की गरजती बरसती रात और उसमें बिजली की कड़कड़ , घर के पुरुष बाहर बास हों तो उनकी रखा कुशल के लिए कलाई में बहन बेटी पत्नी मां धागा बांध लेती है और दस दिन बांध उसे खोल खूब मीठा चूठा बनाती है खासकर गजरोटा जिस पर इनका ही अधिकार होता है, शायद जब कभी घर की बैयर बानी को मीठा खाने को मिलता हो तो कहन बन गई गाज का गजरौटा, बाप खाए न बेटा पर ऐसा भला कैसे हो सकता है कि घर में मीठा बने और घर के प्रमुख मर्द को ही उससे वंचित रखा जाए तो एक कहन उसमें और चस्पा कर दी गई सुन पनिहारिन जुआ, बैयर खाए न पुआ। यानी तुम हमें छेकोगी तो हम क्या पीछे रह जाएंगे। तुम खाओ मोटा सोटा गजरोट , हम तो खाएंगे गर्मागर्म लजीज पुआ और तुम बनाओगी, घुसी रहो रसोई में, चढ़ी रहो कढ़ाही पर, हमें मानसून का आनन्द लेने दो गरमागरम पकोड़े चाय, पुए और भुट्टो की बात ही निराली है। वाह बरसात का पूरा आनन्द तो इसी में है।

      भादों की अष्टमी अंधियारी काली रात में ही कान्हा जन्मते हैं। कान्हा जन्म सुन आई, जशोदा तुम्हें लख लख बधाई। कहने को तो कान्हा के जन्मोत्सव पर दिन भर व्रत उपवास की बात करते हैं पर फलाहार के नाम पर इतने इतने व्यंजन बना कर उदारस्थ कर लिए जाते हैं कि अगले कई दिनों की कैलोरी एक साथ ठूंस ली जाती है। फिर रात को कान्हा जन्मेंगे तो भोग तो बनेगा हीर,  पंजीरी चरणामृत और मेवा पाग की धूम मची रहती है। भादों उतरे क्वार फिर कार्तिक बस त्योहारों की धूमही घूम। आधा क्वार श्राद्ध में और आधा नवरातों की भेंट में चढ़ जाता है बस फिर दशहरा दीवाली भागे चले आते हैं।

      हम भारतीय इतने उत्सवप्रिय हैं कि खुशी बांटने और मीठा खाने का कोई न कोई मौका खोज ही लेते हैं। घर घर तिरंगा का स्वाधीनता दिवस आजादी का अमृत महोत्सव है, तो इस दिन तो ध्वजारोहण के बाद बूंदी के चार चार लडडू खाना तो बनता ही है और जब यह राष्ट्रीय पर्व है तो अवकाश तो होगा ही। यानी हम ब्रज के बसैया ही नहीं पूरे भारतवासी हर मौसम में रंगीनी खोज ही लेते हैं और उसे उल्लास और प्रसन्नता से मनाते पारण मिष्ठान से ही करते हैं। भोजनांते मिष्ठान की परंपरा के वाहक हम कुछ मीठा हो जाए के नाम पर चाकलेट नहीं, छप्पन भोग के आदी हैं और संकेत रुप में गुड़ की डली और बताशे से मुंह मीठा कराते हैं, तेरे मुंह में घी शक्कर कहते हैं, दोनों हाथो में लडडू भर देते हैं, दही बूरा खिलाकर शगुन मनाते हैं। आखिर एक ही तो मन है, उसे भी खिला पिला कर संतुष्ट नहीं कर सके तो रे मन काहे को हुआ कहना ही पड़ता है। फिर दोहरा लो सावन खाई न खीर भादों खाए न पुआ, रे मन काहे को हुआ।

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