Wednesday, August 17, 2022

किस्सा कुर्सी का

 सफर जारी है.... 1022

12.08.2022

 किस्सा कुर्सी का.......

बचपन में खेले गए खेल जेहन में हों तो म्यूजिक चेयर को याद कीजिए। कुरसी दस और प्रतियोगी बीस, गाना बजते सारे गोल गोल दौड़ना शुरू कर देते, जैसे ही गाना रुकता, दौड़ के कुर्सी हथिया ली जाती, जैसे जैसे प्रतियोगी हारते जाते, कुर्सी की संख्या भी कम होती जाती और अंत मे बचती कुर्सी एक और प्रतियोगी तीन, बड़ा कड़ा कंपटीशन होता और जो गाने के बोल रुकते ही कुर्सी हथिया लेता, उसी की जीत होती और बाकी अगले खेल के इंतजार में बिखर जाते। जिसे कुर्सी मिलती, वह थोड़ी देर को राजा बन खुश हो लेता और सब उसे बधाई दे लेते। जीतने वाला भी जानता था कि ये खेल है। जीत हार लगी रहती है, कोई बड़ी बात नहीं। एक और खेल खेला जाता हम तुम्हारी ऊंच पर रोटियां पका रहे, फिर खेल खत्म, सब बराबरी पर आ जाते और ऊंच नीच खत्म हो जाती। हम बच्चे खेल खेलते जरूर थे पर मन बहलाने के लिए, मनोरंजन के लिए, थोड़ी भाग दौड़ के लिए, तरोताजा होने के लिए, काम के सबाब को दूर करने के लिए पर उस हार जीत को दिमाग में चस्पा नहीं कर लेते थे और कोई जो ऐसा करे फिर भले ही नंद का ठोटा ही क्यों न हो, सखा समझा देते...खेलत में को काको गुसैंया, हरि हारे जीते श्रीदामा बरबस ही कत करत रिसैया। अति अधिकार जनाबत याते अधिक तुम्हारे हैं कछु गैया। कोई कितने भी बड़े बाप का बेटा क्यों न हो, खेल में सब बराबर, जो हारेगा उसे दांव देना ही होगा, पिदना ही होगा, दांव दिए बिना जा तो नहीं सकते। तो खेल खेल की भावना से खेले जाते थे, प्रतियोगिता को प्रतियोगिता ही माना जाता, एकदम स्वस्थ प्रतियोगिता। उसे जीवन में नहीं घुसाया जाता था।

मुश्किल तो तब शुरू हुई जब बात बात पर खेल खेले जाने लगे, खेल की कुरसी दिमाग में जम के बैठ गईं कि ये तो बस मेरी है, कोई हाथ लगा कर देखे तो। जब अधिकार मस्तिष्क में गहरी जड़ें जमा लेता है तो वह सबसे पहले कर्तव्य भूलता है। उसे बिना करे सब चाहिए। बस चाहिएं तो चाहिए ही। ऐसे दो या वैसे नहीं तो छीन कर,लड़ लड़ा कर, मार पीट कर, गुत्थम गुत्था कर, गाली गलौज कर, बदतमीजी कर, सब को घटा बताकर लेंगे पर लेंगे जरूर। जब कुर्सी दिमाग में गहरे घुस जाती है तब कुर्सी मात्र बैठने के लिए नहीं, अधिकार जताने का सिंबल बन जाती है। नहीं तो बाजार में चले जाओ, पैसा फेंको और रिवाल्विंग से लगाकर हत्थे वाली ऊंची कुर्सी तक खरीद सकते हो, पैसों वाले के लिए सब बजट के अंदर ही है।

 कुरसी हो, बेंच हो, सिंहासन हो सब बैठने के काम ही आते हैं न । कभी कुर्सी पर बैठते आप विद्यार्थी होते हों, अध्यापक होते हो, कार्मिक होते हों या मालिक होते हो। तो जिस भाव से कुरसी पर बैठते हो, वही करना होता है। विद्यार्थी हो तो सुनो, पढ़ो और कहीं गुरुजी पद पा लिए हो तो सिखाओ समझाओ। गुरुत्व को समझो, अपने दायित्व के प्रति सजग बने रहो। काम करो, कुर्सी की इज्जत बनाए रखो। बड़े से बड़ा मालिक भी कुर्सी पर बैठते ध्यान रखता है कि इसकी शुचिता बनाए रखते हैं क्योंकि इस पर बैठना केवल आराम देही ही नहीं, दायित्व पालन है। ड्यूटी के बाद तो मालिक भी अपने घर पर चटाई और खाट पर पैर फैला कर सुकून पाता है। यानि कुरसी पर भले ही बैठो, अपने पद की गरिमा बनाए रखते दायित्व का पालन करो पर कुर्सी आपके अंदर नहीं बैठनी चाहिए।

 विक्रमादित्य का सिंहासन याद होगा जब छोटा सा बालक अनजाने ही उस स्थान पर बैठता है तो उसके मन में सबको न्याय देने के विचार आने लगते है। वह सब का शुभ ही शुभ सोचता है, किसी एक के प्रति अन्याय करना तो दूर की बात रही, ऐसा सोच भी नहीं पाता। ये तो स्थान का प्रभाव है व्यक्ति का उसमें कोई रोल नहीं। उस सिंहासन पर बैठते ही दायित्व की भावना, पद का गौरव गरिमा प्रभावी होती है, आप व्यक्ति विशेष रह कब जाते हो, आपका नाम नहीं, पद बोलता है। जो ऐसा नहीं होता तो प्रेमचन्द के नमक का दरोगा और पंच परमेश्वर में अलगू जुम्मन अपनी सारी शत्रुता दुश्मनी भूलते खाला के प्रति न्याय कैसे कर पाते, उनके मनों का मैल कैसे धुल पाता, वे सारी दुश्मनी भूल आपस में गले कैसे मिल पाते। तो जितने दिन भी दायित्व की कुरसी मिले, निष्ठा के साथ काम करो। उसे दिल से अपनाओ और जब छोड़ो तो पूरी तरह से छोड़ो, कोई चिपक बाकी न रहे। ध्यान रखो कुर्सी तुम्हें आधार देती है, मान सम्मान देती है तो उसका मान बनाए रखो। कुर्सी पर बैठो जरूर, पर कुर्सी तुम्हारे अंदर नहीं बैठनी चाहिए नहीं तो सब बंटाधार हो जाता है। तो बनी रहें ये सम्मानित कुर्सियां और इन्हें सम्मानित करने वाली विभूतियां। बने रहें ये विक्रमादित्य के सिंहासन और बैठते रहें उन पर विक्रमादित्य जैसे शासक जो देश को सार्थक और सफल नेतृत्व देते हैं।

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