Wednesday, August 17, 2022

चले चलते हैं

 सफर जारी है....1028

18.08.2022

चले चलते हैं........

किसी भी नए रास्ते को चुनते, उस पर पहला कदम रखते  हिचक होती है, संकोच होता है, मन में ढेरों ऊहापोह होते हैं कि इस रास्ते चल भी पायेंगे या नहीं। साथ के अलग डराते हैं आसान नहीं है वहां तक जाना, सब छठी का दूध याद आ जाएगा, दादी नानी सब याद आ जायेंगे, इतनी लंबी यात्रा हलुआ का गप्पा समझ रखी है क्या जो ऐसे ही पूरी हो जाएगी। दिन में ही चंदा तारे नहीं दिखने लगे तो हमसे कहना। अरे भाई शर्त लगा हो इस रास्ते पे कदम कदम पर खतरे ही खतरे हैं, अच्छे अच्छों के छक्के छूट जाए, और ये चली हैं महारानी इतिहास रचना, न कद की न काठी की, न रूप की न रंग की, कोई गॉड फादर नहीं, सिर पर सिफारिशी हाथ नहीं और चुना रास्ता जो मार जोखिमों से भरा है, कदम कदम पर मार डांट फटकार और दंशनाएं हैं। बहुत साहस चाहिए इस सबको झेलने के लिए, अच्छों अच्छों की छुट्टी हो जाती है और ये निकली है झंडा गाड़ने, देख लेना दो दिन में चित्त हो जाएंगी, बैक टू पवेलियन लौटना होगा।

सच में साथियों ने इतना इतना डरा दिया है कि मन एक बारगी कच्चा हो जाता है,बार बार लगता है हाय दैया, इतना लम्बा रास्ता कैसे पार होगा, न जाने कैसी पथरीली कंकरीली सड़क होगी, धूप ताप से बचने को छाता है नहीं, पैरों में जूते तो छोड़ो, चप्पल का भी बूता नहीं, बिल्कुल अकेले, साथ कानी चिरैया भी नहीं और जाना है दूर बहुत दूर। दूर नगरी बड़ी दूर नगरी, कैसे आऊं रे कन्हैया तेरी गोकुल नगरी।साथ के कह देते हैं अरे तो चुना ही क्यों ऐसा लक्ष्य, सबसे अनौते बने ही क्यों। सब जैसे बने रहते और ठाठ से खूब खर्राटे मार के सोते, आराम से खाते पीते जिंदगी गुजरती, ढेरों दोस्त होते, सबसे मिलते जुलते, खूब आनंद की कटती। अब आ बैल मुझे मार की आदत पाल ली, तो भुगतो बैठ के। दिमाग में कीड़ा घुसा के बैठे हो, इल्लत पालने का शौक़ है तो भुगतो। रोज एक नई औगार लेके बैठ जाती हो तो कोई कहां तक बीच बिचाब करे। खुद बोया तो खुद काटो। अच्छा बनने का भूत भी तुम पे ही सवार था। सबसे अलग चलोगी तो भुगतो। पर कुछ मन के से साथी हमेशा हौसला बढ़ाते रहते हैं, दुनिया की मत सुनो, ये तो टांग खींचेगे ही, हर काम में टंगड़ी मारेंगे ही, उत्साह भंग करेंगे ही,जो तुम आगे बढ़ गए तो वे पीछे नहीं रह जाएंगे । तो अपने साथ मिलाए रखने के सारे उपाय करेंगे और जो तुम फिर भी आगे बढ़ गए तो मार आलोचना करेंगे। अरे जब लक्ष्य तुमने तय किया, मंजिल तुमने चुनी तो रास्ते भी तुम्हें ही पार करने होंगे। उत्साह को साहस को बनाएं रखना होगा। पढा है न महापुरुषों को कि वे चले तो अकेले थे लेकिन लोग जुड़ते चले गए और कारवां बनता चला गया। दशरथ पुत्र राम को जब वनवास हुआ, वन में सीता का अपहरण हो गया तो कौन सा सैन्य बल था उनके पास, अपने बुद्धि विवेक से उन्होंने बन्दर,भालू, रीछ वन्य जीवों के सहयोग से सेना तैयार की, समुद्र पर सेतु बनाया, रावण से युद्ध किया और अपनी भार्या को वापिस लेकर लौटे। बालगोपाल कृष्ण ने काली नाग नाथा, राक्षसो का संहार किया, अत्याचारी कंस का बध कर उग्रसेन को गद्दी पर बिठाया। महात्मा बुद्ध जब घर से निकले तो उनके साथ भीड नहीं थी लेकिन जब उन्होंने स्वयं को स्थापित कर लिलिया तब उनके अनेक अनुयाई बन गए। तो अकेले आगे आना होता है, हिम्मत जुटानी होती है,  साहस बटोरना होता है, मनोबल बनाए रखना होता है, लक्ष्य की तरफ अर्जुन सी दृष्टि रखनी होती है, लगातार बिना रुके बिना थके चलना होता है, टांग खींचने वालों और आलोचना चुगली करने वालों की उपेक्षा करनी होती है, तब जाकर कदम आगे बढ़ते हैं और जो इन सभी में उलझे रह जाओ कि फलाना ये कह रहा था, ढिकाना ये कह रहा था तो बढ़ चुके आगे, मिल गईं मंजिल। लोग तो कहते ही रहते हैं। कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना, छोड़ो संसार की बातों को कहीं बीत न जाए रैना। फिजूल की बातों में रैना ही तो बात जाती है और आप ठनठन गोलाल बने रह जाते हैं, लप्पू झननन कहलाते हैं। तो काम तुम्हारा, सपने तुम्हारे तो उसे तुम पूरा करोगे। सच तो यह है कि जो सपने देखते हैं और संकल्प और साहस से उसे पूरा करने की सामर्थ्य रखते हैं, वे मंजिल तक अवश्य पहुंचते हैं, अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करते हैं।

बाल अधिकार कार्यकर्ता, नोबेल शान्ति पुरस्कार समेत कई अन्य अन्य पुरस्कारों से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी को पढ़ते हुए लगा कि सपने अपनी आंखों में होने चाहिए, सपने आपका पीछा तब तक नहीं छोड़ते जब तक आप उन्हें पूरा न कर लें। जो लगन लग जाए तो सब सध जाता है। जब उनके संकल्पो को जाति स्वीकार नहीं करती तो वे जाति को ही छोड़ देते हैं और शर्मा सरनेम छोड़ सत्यार्थी बन जाते हैं। स्कूली शिक्षा प्रारंभ करते जूते सिलते बच्चे का चेहरा उनकी आंखों में ऐसा चस्पा हो जाता है कि वे बाल मजदूरी के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर देते हैं, मीलों यात्रा करते वसुधैव कुटुंबकम् की धारणा को साकार कर देते हैं। इसी यात्रा में सहयोगी सुमेधा को जीवन संगिनी के रूप में पाते हैं और एक और मिलकर दो नहीं, ग्यारह हो जाते हैं। उनके स्वाट संकल्पना में जीवन का सूत्र छिपा है। एस यानि स्ट्रेंथ अपनी क्षमताओं, योग्यताओं और शक्तियों को जानना, डब्ल्यू यानि वीकनेस, अपनी कमाजोरियों को पहचानना, ओ यानि अपॉर्चिनिटी अवसर की तलाश और टी याने थ्रैट्स, खतरों की पहचानना, उनका सामना करना, उनसे घबरा कर कार्य को बीच में नहीं छोड़ देना। जो इस सूत्र को अपना लेते हैं, वे जीवन में कैलाश सत्यार्थी बन जाते हैं, सत्य पर चलने की ताकत रखते हैं, इसलिए सत्यार्थी कहे जाते हैं, नोबेल पीस पुरस्कार को राष्ट्रपति को राष्ट्र के लिए भेंट करते नहीं चूकते और सहज भाव से कह देते हैं मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सब तौर, तेरा तुझको सौंप के क्या लागे है मोर। वे अपने संकल्प साहस के बल पर अकेले 

ही इतिहास रच देते हैं। जीवन में आगे बढ़ना हो तो ऐसे महापुरुषों की जीवनी पढा जाना बहुत जरुरी है फिर चाहे वे विवेकानंद हों, तिलक हों या राष्ट्रपति अब्दुल कलाम हों।       उन्हे पढ़ना हमारे मनोबल को बढ़ाता है, शक्ति देता है कि जब वे कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं।

तो चले चलो, चलते रहो, एकला चलो और चरैवति चरैवति दोहराते रहो, मंजिल मिल ही जाएगी एक दिन

1 comment:

  1. Dear Madam, I have great respect to you and your writings, which I am receiving and keep reading on and off. I wish you Great Success and do hope that one day you may be honored with national level coveted, the Padma award. You are a humble person with so down-to-Earth attitude, though you are such a senior and reputed personality.

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