Saturday, August 20, 2022

नलिनी तू कुम्हलानी

 सफर जारी है....1029

19.08.2022

 नलिनी तू कुम्हलानी.......

 हम सभी मानुष में परमात्मा का अंश है। उसके साथ अंश अंशी का संबंध है। तभी तो कहा जाता है मोको कहां ढूंढे बंदे मैं तो तेरे पास में। हिरण कस्तूरी की सुगंध के लिए भटकता डोलता है जबकि गंध का स्रोत वह स्वयं है। कस्तूरी कुंडल बसै मृग ढूंढे वन माहि, ऐसे घट घट राम हैं दुनिया देखे नाही। कबीर तो अपनी जान लिख लिख कर समझाते ही रहे ज्यों पुहुपन में वास है, ज्यों तिल माहि तेल है ज्यों चकमक में आग, तेरा साई तुज्झ में जागि सके तो जाग। पर हम कब जाग पाए। हम ईश को बाहर ही बाहर खोजते रहे।। उसे बहरा समझते रहे तभी इतनी जोर जोर से अजान देते रहे, उसे पुकारते रहे, कर माला जपते रहे, राम राम कहते रहे..... माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनुआ तो चहुं दिश फिरे यह तो सिमरिन नाहि या कांकर पत्थर जोड़ के मस्जिद लई बनाए, ता चढ़ मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।

 जो करना चाहिए ,उसे छोड़ बाकी सब कर लेते हैं। पत्थर को पूज लेंगे पर उसी पत्थर से बनी चाकी का ध्यान बिलकुल नहीं आता जिससे अनाज पीस कर रोज पेट भरा जाता है। घर की चाकी कोई न पूजे जाको पीस खाय संसार या पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़। कबीर को पढ़ते लगता है उन्होंने समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, दोहे सबद साखी रचते रहे और हम मूढ़ बने उन दोहों को पढ़ पढ़ कर अगली कक्षा में चढ़ते रहे या कुछ को सुनाने के लिए याद भर कर लिया। जप, छापा ,तिलक ,मूड मुड़ाना में ही उलझे रहे, उससे आगे बढ़ ही नहीं पाये। हमें समझाया तो गया कि मूड मुड़ाए हरि मिले सब कोई लेय मुड़ाए, बार बार के मूडते भेड़ न बैकुंठ जाए। फल साग सब्जियों के स्थान पर जीवों को खाना शुरू कर दिया। अरे जरा ठहर कर सोचते तो कि बकरी पाती खात है बाकी काड़ी खाल, जे नर बकरी खात हैं तिनको कौन हवाल। पढा तो सब लेकिन उसे हृदयंगम करने का ध्यान ही नहीं आया, नदी में गोते लगा लगा कर नहाते भले रहे पर चिकने घड़े की माफिक एक बूंद पानी अपने ऊपर ठहरने नहीं दिया। बस मूड के मूड ही बने रहे। भजन गाते गुनगुनाते तो रहे कि मानव तू क्यों उदास है, जल में रहकर भी मछली को प्यास है। हमें आत्म बोध नहीं हो पाया कि खुशी प्रसन्नता हर्ष जिसे हम वस्तुओं और व्यक्तियों में खोजते हैं, उसका स्रोत तो हमारे अन्दर ही है, आनंद स्रोत बह रहा तू क्यों उदास है, अचरज है जल में रहकर भी मछली को प्यास है। जो हमारे अंदर है, जिसमें हमें हर पल आकंठ डूबे रहना चाहिए, उसे हम दुनिया में खोज रहे हैं। कबीर झकझोरे बिना कहां मानते हैं काहे री नलिनी तू कुम्हलानी, तेरे ही नाल सरोवर पानी। बस यही चूक हम सब बार बार करते हैं कि कभी अपने को नहीं टटोलते। मुख से राम राम रटे भी तो बगल में छुरी रखते हैं जिसे मौका पाते ही दूसरे की पीठ में घोंप देते हैं।

 सब जानते हैं शरीर नश्वर है, उसे एक न एक दिन नष्ट होना ही है। गीता के श्लोक खूब झूम झूम के सुनाते हैं वासांसि जीर्णानि यथा विहाय और नैनम छिनदंति शस्त्राणि नैनम दहति पावक, न चैनम क्लेदांति  आपो न शोष्यति मारूत पर इसे व्यवहार में कब ला पाते हैं। स्वजन प्रियजन के शरीर छोड़ते कैसे बुक्का फाड़ फाड़ कर छाती पीट पीट कर रोते कलपते हैं जबकि सब जानते हैं हम सब की एक दिन यही गति होनी है, सबको जाना ही जाना है। आया है सो जायेगा राजा रंक फकीर, एक सिंहासन चढ़ चले एक बंधे जंजीर। बस कैसे जाते हैं, ये प्रमुख है। जितना मरजी बैंक में जीरो बढ़ते रहें, हजार लाख दस लाख करोड़ होते रहें, मर्जी जितना महल दुमहल बना लो, ऊंची ऊंची कोठियां बना लो, सब यहीं छूट जाना है, कुछ भी साथ नहीं जाता, ये जो मंहगे मंहगे कपडे पहने हो, उसकी तो छोड़ो, कफन भी उतार कर डोम रख लेता है। बिलकुल खाली वैसे ही जाते हो जैसे इस दुनियां में आए थे। मुठ्ठी बांधे आया था तू हाथ पसारे जाएगा, हे मन मूरख मानव यहां से कुछ नहीं ले जाएगा।बस आने और जाने के बीच जीवन के सारे सुख सारे आनंद ले लो और समझ में भर जाए तो अपने राम को प्रभु को भज लो। बस वही एक सांचा है। दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया।

          तो मार दुखी होने, परेशान होने, इधर से उधर भागने से,पैसा धैला खर्च कर देने से स्थाई खुशी नहीं मिला करती । सुख का आनंद का ,शान्ति का जो अजस्त्र स्रोत अपने अंदर बह रहा है, उसमें डूबना है। जब आनंद की चाबी मिल गई तो नलिनी तू क्यों कुम्हलाए जा रही है तेरी ही नाल सरोवर पानी है। आनंद स्रोत बह रहा तू क्यों उदास है, आश्चर्य है जल में रह कर भी मछली को प्यास है। तो नलिनी जी कुम्हलाना बंद करो, खूब हंसी खुशी रहो। जीवन पानी का बुलबुला है पता नहीं कब फूट जाए। पानी केरा बुदबुदा यही मानस की जात, देखत ही छिप जाएंगे जो तारे परभात।

No comments:

Post a Comment

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...