Monday, August 22, 2022

ओल्ड गोल्ड बोल्ड

 सफर जारी है...1034

24.08.2022

ओल्ड गोल्ड बोल्ड.....

क्यों हमेशा बुढ़ापे को कोसते रहते हो, यह भी तो आयु का एक पड़ाव ही है फिर भले अंतिम ही क्यो न रह। बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी कहते कभी बचपने में खो जाते हो तो कभी किशोरावस्था को आंधी और तूफान का काल बताते हो। फिर इठलाता बलखाता यौवन आया जिसे आग अन्तर में लिए पागल ज़वानी कहा गया, ये बाल ऐसे ही सफेद नहीं हुए हैं और जीवन के अनुभवों का बांट बखरा करते प्रौढ़ावस्था का आनंद। षष्ठी पूर्ति मनाते सीनियर सिटीजन की केटेगरी में आ गए और आठ दशक पार करते करते वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ा दिए। जीवन के और पड़ावो का आनंद लिया और जैसे ही अंतिम चरण पर पहुंचे, अपने को बिल्कुल निष्क्रिय घोषित कर दिया। क्यों दोस्त जब सुख का समय तुम्हारा था तो इस बुढ़ापे को कहीं और थोड़े ही जाना था। कहते हैं न, बुढ़ापा कुछ नहीं, महज उम्र का एक आंकड़ा है।

अभिवादन शीलस्य नित्य व्रद्धोपसेविन, चतवारि तस्य वरधनते आयु विद्या यशो बलम याद करते वृद्धों की सेवा ही याद रह गई क्या कि अरे हमने तो बहुत कर लिया, अब क्या करते ही रहेंगे। अब तो बस बाल बच्चों से सेवा लेने का समय है। शिथिल होती इंद्रियां मन की दास हो गई। कछु मियां बाबरे कछु पी लई भंग को चरितार्थ करने लगे। अब हमसे कुछ नहीं होता, बहुत कर लिया, क्या करते ही रहेंगे। अब हमारा आराम करने और सेवा कराने का समय है। और किस दिन के लिए बाल बच्चे पाल पोस कर बड़े किए थे, सेवा करना तो उनका धर्म है, बार बार श्रवन कुमार का पाठ इसीलिए तो पढ़ाया था कि जैसे उसने अपने अंधे माता पिता को बंहगी/कांवर में बिठा कर तीर्थ यात्रा कराई, ऐसे ही हमारे बालक करें। अरे जब ईश्वर ने तुम्हें अभी तक स्वस्थ बनाए रखा है, आंखें हाथ पैर दुरुस्त है तो भले मानुष ये इच्छा पाल बैठना और उसे रोज रोज रेखांकित करना जरुरी है क्या। जब तक अपने हाथ पैरों को चलाते रहोगे, स्वस्थ बने रहोगे और जो मन ने ही ठान लिया कि हम तो बड़े बूढ़े हो गए हैं, अब हमसे कुछ नहीं होगा, बस अब तो यही चिन्ता लगी रहती है बुढ़ापा कैसे कटेगा। सच बताएं तो ये मानसिकता और दुर्बल सोच ही आदमी को ही बूढ़ा बनाता है।

जीवेम शरद शतम का आशीर्वाद पाते तो खूब हरसाते हो और ईश्वर जब उतनी उम्र देता है तो फिर हाय हाय चिल्लाते हो कि अब कैसे होएगी। हाथ पैर चलते रहें, कम से कम अपने से संबंधित काम खुद करते रहे और संभव हो तो अगले के भी चार काम निबटा दें, हाथ पैरों की सामर्थ्य चुक गई हो तो मुंह से बोल बतिया कर, अपने अनुभवों के आधार पर सलाह मशविरा दे लें बशर्ते कोई मांगे। कहीं खुद से देने बैठ गए तो याद रखिएगा वही हाल होगा जो सुंदर घोंसला बनाने वाली बया का हुआ था। सीख दीजे बाय जाहे सीख सुहाए, सीख न दीजे बानरा बया का घर जाए। तो जिन किस्से कहानियों को जीवन भर सुनते सुनाते पढ़ते पढ़ाते रहे, उन्हें याद करने का सही समय तो यही है। जीवन का सारा सत्व तो इसी काल में है, अनुभवों का निचोड़ यहीं है, परिपक्वता संतुलन यहीं है, गांभीर्य और कार्य कुशलता यहीं है। अब तक तो खेलते खाते, भोग करते, इधर से उधर भटकते, मटरगस्ती करते, परिवार पालते, कमाई करते समय बीत गया। बचपन खेल में खोया, ज़वानी नींद में सोया, बुढ़ापा देख के रोया इसीलिए तो कहा गया। क्यों रोये भाई बुढ़ापे को देखकर, पूरी जिंदगी फूली फूली चरते रहे, मेरा मेरा करते रहे, मैं और मेरा में उलझे रहे, बस जब सब तुम्हारा था तो बचा कुचा भी तुम्हारा हैं। उसे शान से जीओ। जो भी जैसा भी है, अपना ही किया धरा है, दूसरों की सेवा में ही लगे रहे, कभी अपने शरीर की परवाह नहीं की तो बैठ कर भुगतो अब। सबसे बडा सुख निरोगी काया पढ़ा तो था पर उसे व्यवहार में कब ला पाए। अंट संट खाते रहे, ऊलजलूल बकते रहे, न भोजन में व्यवस्थित रह पाए न भजन में, न व्यावहारिकता सीखी न स्वास्थ्य  के नियमों का पालन कर पाए। बस तब तो धा पा के काम निबटाने की पड़ी रहती, भूखे प्यासे या समय बेसमय कुछ भी ठूंस लिया जाता। अब भुगतो, अरे मशीनरी की देखभाल भी तो उतनी ही ज़रूरी थी जितने और काम। उसे समय समय पर तेल पानी देना धूप दिखाना था न, पर या तो धकापेल लगे रहे या बिलकुल आराम फरमाते रहे, शरीर को जंग लग गई, हाथ पैरों के जोड़ जाम हो गए तो हाय हाय चिल्लाते हो। इंद्रियों के शिथिल होते ये सब तो होगा ही, उसे स्वीकार पूर्वक ग्रहण कर लो तो ज़्यादा अच्छा है।

और जो  वृद्धाश्रमो की बढ़ती संख्या से चिंतित हो तो उसे भी भूल जाओ, ज़वानी भर कमाया , कुछ तो बुढापे के लिए भी जोड़ा होगा तो उससे अपना संतोष पूर्वक जीवन बिताओ, जैसी टूटी फूटी झोंपड़ी है, जैसा रूखा सूखा अपने पास है उसमें मस्त रहो। अब खाने पीने और स्वास्थ्य पर पैनी निगाह रखो। बालकों को तो खूब समर्थ बना दिया, अब उनकी चिन्ता में मत घुलो, वे तुम्हारी चिन्ता करने लायक हुए। सबके भले के लिए ईश्वर से प्रार्थना करो, लोकमंगल की कामना करो पर न किसी के व्यक्तिगत जीवन में दखलंदाजी करो और न अपने में करने दो। मन करे साथ रहो, ज्यादा चकल्ल्स हो तो अपने अपने में सिमट जाओ। न किसी पर बोझा बनो न किसी को अपने ऊपर लदने दो। बुढ़ापे को रोते झींकते ही नहीं काटा जाता, उसे सुखद भी बनाया सकता है। बस दूसरों से अपेक्षाएं कम करनी होती हैं, जहां तक संभव हो अपना काम स्वयं करने की आदत डाल लेनी चाहिए। ये परनिर्भरता बहुत परेशान करती है स्वयं को भी और दूसरों को भी। अपने अकेले के बल पर इतनी दूरी तक नाव खींच लाए, अब तो बिलकुल मंजिल के नजदीक हैं सो धैर्य बनाए रखो, ये भी पार लग ही जाएगी। बस हाय तौबा मत मचाओ कि कैसे होगा, सब होगा अच्छे से होगा।

देखो जिसे झींकाने की आदत है वह तीस चालीस की उम्र में ही अपने को बीता मान लेता है शरीर से कम मन से दुर्बल अधिक होता है। जो समय दिन रात काम कर भविष्य बनाने का है उसे यूं ही ये कह कर बरबाद कर देता है कि बस अब मेरा समय आ गया, अरे तुम कब से चित्रगुप्त बन गए जो अपनी मृत्यू की तिथि की भविष्यवाणी करने लग पड़े, यह काम तो यमराजा को सौंपा गया है। ये तुम्हारे चाहने न चाहने से नहीं होगा,जब समय पूरा हो जाएगा तो न चाह कर भी जाना पड़ेगा। इसे हम मानुष तय नहीं करते। ये हमारा काम है भी नहीं। हमारा काम तो बस इतना है कि जितना जीवन मिला है, जितनी सांसें मिली हैं उन्हें ठीक तरह से जी लें। रोज रोज कहने से कोई मरा तो नहीं करता, हां, वातावरण को बोझिल नकारात्मक और अपने मन को कमजोर जरूर कर लेता है। तो इस तरह के प्रलाप जीवन के किसी भी पड़ाव पर उचित नहीं, जीवन जैसा भी है उसे सुख पूर्वक जीना मन को प्रफुल्लित रखता है। सो ओल्ड इज गोल्ड के साथ ओल्ड इज बोल्ड को भी जीवन में समाहित कर लीजिए, जिंदगी चैन से बीतेगी।

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