Wednesday, August 24, 2022

लालच बुरी बलाय

 सफर जारी है...1035

25.08.2022

लालच बुरी बलाय.....

कबीर का ये दोहा तो सबको रटा हुआ होगा ही….. रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पीब, देखि पराई चूपरी मत ललचाबे जीभ। व्यक्ति को ललचाना तो नहीं चाहिए पर क्या करें जीभ के आगे भला किसका बस चलता है। कहीं अच्छा खाना देखा तो ऐसी लपलपाती है कि बस कुछ पूछो ही मत। मुंह में पानी आ जाता है, मन अलग ललचाता है। स्वाद स्वाद में ज़्यादा खा लिया जाता है और भुगतता पेट है। जीभ तो बस स्वाद देखती है, उसे इसके परिणाम से भला क्या लेना देना।अब ये जीभ ही बस में हो जाए तो काहे को परेशानी में पड़े आदमी। इसके दो ही मुख्य काम हैं अच्छा अच्छा खाना और जो मर्ज़ी कह कबा कर झटाक सीना मुंह में घुस जाना। तभी तो इसे बाबरी कहा गया... जिव्हा ऐसी बाबरी कह गईं सुरग पताल, आप तो अंदर गई जूती खाय कपाल। अब पड़ते रहें सिर पर बेभाव के जूते, जुबान को भला क्या परवाह, वह तो मुख गुहा के अंदर मजे से घुस कर बैठ जाती है फिर चाहे जो मर्ज़ी होता रहे उसकी बला से, उसे कोई लेना देना नहीं। इस जीभ को गोस्वामी तुलसीदास ने बेचारी कहा...जिमि दसननि महूँ जीभ बेचारी. बुरे और दुष्ट लोगों के मध्य सज्जन लोगों का रहना जीभ के समान ही है ,जरा चूके तो तीखे पैने दांत चिकौटी सी काट लेते हैं। 

लालच का मुख्य कारण जीभ के साथ साथ आंख, कान, हाथ भी हैं। ये भी उतने ही दोषी हैं जितनी जीभ, जुबान या जिव्हा। आखिर हम लालची क्यों हो जाते हैं, जो है सब हमें ही क्यों चाहिए, बांट कर खाने में विश्वास क्यों नहीं करते। एक का पेट जरूरत से अधिक भरा होता है तो एक के पास दैनिक जरूरतें पूरी करने को भी नहीं जुटता। तमाम कहानियां किस्से पाठ्यक्रम में रख दिए जाते हैं कि इन्हें पढ़ते कहीं कुछ समझ विकसित होगी कि मैं मैं से छुटकारा मिलेगा, अपने साथ दूसरों का भी सोच सकेंगे। सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की कथा सबके जेहन में ताजा होगी कि रोज एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का पेट इस लालच में चीर दिया जाता है कि सारे अंडे एक साथ निकाल कर, उन्हें बेच कर एक दिन में ही अमीर बना जा सकता है और परिणाम हम सबको पता है कि क्या होता है।आखिर व्यक्ति लालच करता ही क्यों है, क्या भविष्य की असुरक्षितता उसे ऐसा करने को प्रेरित करती है कि कल को मिला नहीं मिला तो सब आज ही ले लिया जाए, बटोर लिया जाए, कई पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख लिया जाए या हम सभी में संग्रह की मूल प्रवृत्ति होती है कि खूब सारा जमा कर लिया जाए। जो जीवन का सत्य समझ जाते हैं, वे संतोषी हो जाते हैं, जितना आवश्यक है, जितने से काम चल जाए, उतना ही लेते हैं। संतोषी सदा सुखी में विश्वास करने वाले के लिए गो धन गज धन बाजि धन धूर समान हो जाता है। वे जो पास है उसी में संतोष पा लेते हैं और इस में विश्वास रखते हैं कि जिसने चोंच दी वह चुग्गा भी देगा, जिसने पेट दिया वह भोजन भी देगा। वैसे लोग भूख से उतना नहीं मरते, जितना भरे पेट होने पर भी ठूंस ठूंस कर भरने से मरते हैं।

लालच के लाभ हानि सब जानते हुए उससे विलग नहीं हुआ जाता। यह एक दिन का काम है भी नहीं, यह तो लंबी साधना है जो वर्षो के अभ्यास से प्राप्त होती है। यह सबके बस का है भी नहीं। ये व्रत तो उनसे ही सध पाता है जो जीवन का सत्य समझ जाते हैं कि जितना मर्जी इकठ्ठा कर लो, पेट से ज्यादा खा नहीं सकते और साथ ले के कुछ जा नहीं सकते। कहते हैं सिकंदर जिंदगी भर बेशुमार दौलत इकठ्ठी करता रहा, मृत्यू से पूर्व उसने तीन इच्छाएं रखी कि मेरे शव को ले जानेंके रास्ते में सारी दौलत बिखेर दी जाय, सारे वैद्य हकीम चिकित्सक को दोनों मार्ग के दोनों ओर खड़ा कर दिया जाए और मेरे दोनो हाथ अर्थी से बाहर निकाल दिए जाए जिससे जनता देख सके कि मरजी चाहे जितना मरजी इकठ्ठा कर लो, साथ में कुछ नहीं जाता, कोई वैद्य, हकीम चिकित्सक आपको मृत्यु से बचा नहीं सकता, वे केवल बीमारी का इलाज कर सकते हैं। और सभी व्यक्ति चाहें राजा हो या फकीर, मुठ्ठी बांधे आते हैं और हाथ पसारे जाते हैं।

पर इन कथाओं को लिखने पढ़ने से ही  सब कुछ बदल जाता तो सब अब तक बदल गया होता। पढ़ने को तो ईशावास्यमिदम सर्वम, यतकिंचित जगत्याम जगत, तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृद्ध कस्यस्विधनम खूब पढा जाता जाता है, मंत्र जपा जाता हैं पर पढ़ने रटने से कोई दूसरे के धन पर लगी दृष्टि कोई कम थोड़े ही हो जाती है। इस सब के लिए तो मन की शुचिता और दृढ़ संकल्प जरुरी है। ये दोनों काम तब तक नहीं होते जब तक यह समझ न आ जाए कि लालच बुरी बला है। इसे तो वही जान सकता है जो अन्य किसी के धन को मिट्टी मानता है और पर नारी को चौथ के चंदा की तरह तज देता है, जो पर नारी लिलार गुसाई, तजो चौथ के चंद की नाई। हमारी श्रुति परंपरा, हमारे वेद, हमारी संस्कृति त्याग पूर्वक भोग की है। जितना मरजी सामने पड़ा हो, व्यक्ति अपनी आवश्यकता अनुसार ही लेता है, कल की चिन्ता में संग्रह में नहीं लग जाता। साई से उतना ही मांगता है जिसमें उसकी और परिवार की गुजर हो जाए और अतिथि भी भूखा न जाए। साई उतना दीजिए जामे कूटुंब समाय, मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाए। हमारी मनोवृत्ति बदल रही है। हम आज का अभी का नहीं, कल और आने वाले समय का सोच कर मार संग्रह करने में जुटे हुए हैं जबकि भली भांति जानते हैं कि जिस कल की परवाह में दुबले हुए जा रहे हैं, वह कल कभी आता ही नहीं। बस जो आता है वह आज बन जाता है। और जिनके लिए इकठ्ठा करने की भूख है वे भी उसका भोग कर सकेंगे, इसकी कोई निश्चितता नहीं है क्योंकि पूत कपूत तो का धन संचय और पूत सपूत तो का धन संचय।

सो संचय संग्रह की वृत्ति से मुक्ति पाना जरुरी है, लालच बुरी बलाय याद रखना जरुरी है, त्याग पूर्वक भोग जरुरी है, साधु संत की सी त्याग वृत्ति रखना जरुरी है, सबके साथ मिलकर बांट कर खाना जरुरी है। यदि कुछ गैर जरुरी है तो वह है लालच, सीता जी को सोने के मृग की छाला नहीं चाहिए होती तो उनको रावण हर कर क्यों ले जाता। लालच सबसे पहले स्वजनों से दूर करता है, उनसे दूरी बढ़ाता है बुद्धि विवेक को हरता है , संग्रह की प्रवृति को उकसाता है, दूसरे के धन पर गिद्ध दृष्टि बनाए रखता है, आपको रसातल में ले जाता है तो बचे रहिए इस लालच से, इससे तो दूर की राम राम ही भली। सो याद रखो साथियो लालच बुरी बलाय।

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