सफर जारी है....848
15.02.2022
पांचों पांडवो के साथ यक्ष संवाद की कथा से तो आप सब परिचित होंगे ही किस प्रकार एक एक कर चारों भाई सरोवर से पानी लेने जाते हैं और उस सरोवर के स्वामी यक्ष के प्रश्नों की उपेक्षा कर पानी पीने लगते हैं क्योंकि उन्हें तेज प्यास लगी है।एक को खोजते दूसरा आता है और प्रश्नों का जबाब न देने के कारण चारों बेहोश होकर वहीं गिर जाते हैं।अंत में युधिष्ठिर आते हैं, सभी प्रश्नों का समुचित जबाब देते हैं, प्रसन्न होकर जब यक्ष उन्हें किसी एक भाई को जीवित करने का वरदान देता है तब भी नकुल का नाम लेते हैं जिससे माद्री और कुंती दोनों की गोद भरी रहे।यक्ष उनके प्रश्नों से प्रसन्न होते हैं और सभी भाइयों को जीवित कर देते हैं।यक्ष जिन प्रश्नों को पांडव भाइयों से पूछते हैं,उन्हीं प्रश्नों को अनूप जलोटा भी अपने भजन में सम्मिलित करते हैं.... जल से पतला कौन है और कौन भूमि से भारी, कौन अगिन से तेज है और कौन काजल से कारी।
और फिर इन प्रश्नों के उत्तर में तो पूरा जीवन दर्शन ही समाहित हो जाता है। जल से पतला ज्ञान है और पाप भूमि से भारी, क्रोध अगिन से तेज है और कलंक काजर से कारी।हां,निश्चित ही ज्ञान का विस्तार और इसकी सूक्ष्मता जल से भी पतली है।भला जल की पारदर्शिता और उसके पतलेपन में ज्ञान के अलावा और कौन हो सकता था।जल चाहे जहां रास्ता बना लेता है, इतना पतला है कि जरा सी सन्द भर मिल जाये अपना रास्ता बना लेता है।ज्ञानी ध्यानी तो कैसी भी विकट विषम परिस्थिति रही हो, वह समायोजन करना जानता है।अधिक चीखता चिल्लाता नहीं, मौन रहकर बहुत कुछ कह और कर जाता है।वाणी का प्रयोग बहुत सोच समझ करता है कि किसी को कुछ बुरा न लग जाये।बख्शता किसी को नहीं पर ऐसे कहता है कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे।काम भी हो जाये और झिकझिक भी न करनी पड़े।सबसे प्रेम और सौहार्द का व्यवहार करता है, अटक दुश्मनी मोल नहीं लेता।पर अपने स्वाभिमान पर आंच भी नहीं आने देता।ऐसे ज्ञानी ध्यानी को ही जल के समकक्ष रखा गया है।जल जिसे जीवन कहा गया, जल जिसके बिना मोती मानुख चून सब बेकार हैं।इसीलिए रहीम लिख देते हैं रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून, पानी गए न ऊबरे मोती मानुख चून।नर और नल की गति भी एक सी कही गई... नर की अरु नल नीर की गति एकही कर जोय, ज्यों ज्यों नीचो ह्वे चले त्यों त्यों उज्ज्वल होय।तो जल से पतला ज्ञान है।
पाप भूमि से भारी।है न आश्चर्य कि पृथ्वी जो पूरे संसार का भार धारण करती है, जिसे शेषनाग अपने फन पर धारण किये रहते हैं, पृथ्वी जिसे माता का गुरुत्व मिला है,धरती कहती धैर्य न छोड़ो कितना भी हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार।उस भूमि से भी अधिक भार पाप का है।पाप जो पुण्य का विलोम है, पाप जिसे करने वाला पापी कहलाता है।पापी जिसे नष्ट करने के लिए ईश्वर को अवतार लेना पड़ता है,पाप जिससे बचने के लिए इतनी इतनी शिक्षा दी जाती है, पाप जिससे बचने के लिए बचपन से हिदायत दी जाती है,जिसके लिए कहा जाता है पाप से डरो पापी से नहीं।व्यक्ति हर क्षण सतर्क रहता है कि कहीं भूल कर भी उससे पाप न हो जाये, पाप जिसे परपीड़ा का पर्याय माना गया, अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनम द्वयम,परोपकार पुणयाय पापाय परपीड़नम।वह पाप सच में भूमि से भारी है। पाप पुण्य की परिभाषा चाहे जो हो पर इतना तो निश्चित है कि सारी बुराई पाप ही है।लोग इन पापो को धोने बहाने ही तो गंगा जमुना जाते हैं, मंदिर तीर्थ जाते हैं, इससे बचने को ही तो धर्म ग्रंथ पढ़ते गुनते हैं।जीवहत्या पाप है इसलिए चींटी तक को बचाकर चलते हैं चिड़िया कबूतर को दाना पशुओं को चारा देते हैं।पाप से सबको डर ही लगता है, सब उससे बचना ही चाहते हैं।सच में पाप भूमि से भारी ठहरता है।
क्रोध अगिन से तेज है.…हां क्रोध की अगिन दूसरे को तो बाद में जलाती है पर सबसे पहले उस स्थान को काला कर देती है जहां पर लगती है।लपटें दूसरों को झुलसाती अवश्य हैं पर खुद को भस्म पहल पत्त कर देती है।दुर्वासा और परशुराम दोनो क्रोध के साकार रूप है।सो तजो क्रोध को ये अग्नि से सौ गुना तेज है।
और अंतिम बात...कलंक काजर से कारी।काजर की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय एक लीक काजल की लागिगे पे लागिहे और कोयले की दलाली में हाथ काले होते ही हैं ,उससे बचा नहीं जा सकता।पर काजर और कोयले से भी काला यदि कुछ और हो सकता है तो वह कलंक है।लाख धोलो सर्फ एक्सेल से, इसका दाग नहीं मिटता।जिसके माथे ये कलंक का टीका लग जाये वह न जिंदा में गिना जाता है न मुर्दों में। सो कलंक से बच कर रहो।और जो कहीं भक्क सफेद चादर हो तो जरा सा नेक सा धब्बा भी बहुत चमकता है, दूर से ही नजर आ जाता है तभी कबीर चादर को बहुत संभाल कर रखते हैं ,उसे बड़े जतन से ओढ़ते हैं दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चंदरिया भीनी रे भीनी चंदरिया।
बस ये चार बात जीवन का सार हैं, ज्ञानी बनो, पाप से बचो, क्रोध से दूर रहो और कलंक से सौ हाथ की दूरी बरतो।
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