सफर जारी है...854
21.02.2022
बच्चे मन के सच्चे होते हैं,सारी जग के आंख के तारे होते हैं, ये नन्हे फूल हैं जो भगवान को बहुत प्यार लगते हैं। कभी रूठते हैं कभी मन जाते हैं,साथियों से झगड़ते हैं कुट्टी कर लेते हैं तो अगले पल इनका एका हो जाता है पुच्ची हो जाती है।गुस्सा आई तो गुस्सा हो लिये फिर मन गये, बस पल में तोला पल में माशा।मिट्टी के लोंदे से होते हैं, गढ़ना होता है इन्हें, कभी प्यार से कभी दुलार से तो कभी गुस्सा कर डाँट कर समझा कर, हर पल ध्यान रखना होता है।कभी बंदिश का घेरा लगाकर तो कभी थोड़ी थोड़ी स्वतंत्रता देकर।उन्हें पुचकारा जाता है तो गलती के लिए मारा डाँटा समझाया भी जाता है।कभी पुरस्कार दिया जाता है तो कभी हल्का फुल्का दण्ड भी,जिससे वह दुनिया में रहने लायक तैयार हो सके।खूब खूब समझदार हो सके।किसी के दो बोल कह देने पर रूठ मटक कर घर न भाग आये और इसकी उसकी शिकायतें न लगाने लगे,कोई बिना बात पीटे तो उसका विरोध कर सके।चुपचाप पिटता ही न रहे।न इतना उद्दंड हो कि अपनी दादागीरी दिखाता फिरे और इस उस को मार धुन कर घर में आकर छिप जाए और अगला जब शिकायत लेकर आये तो घर भर अपने लाडले का ही पक्ष लेने लगे कि यह तो मार ही नहीं सकता, जरूर तुमने ही कुछ किया होगा।
याद आता है बच्चों की गलत जिद को पहले तो लाड़ प्यार में स्वीकार लिया जाता है, गलत बात पर भी कभी टोका नहीं जाता बल्कि प्रकारान्तर से उसी का पक्ष लिया जाता है और जब उसकी ये आदतें पक्की हो जाती है तब रोना रोया जाता है कि क्या करें समझा समझा कर हार गये, ये तो मानता ही नहीं है।दूसरों को मारता पीटता था और आप उसकी उद्दंडता पर कैसे खुश होते थे, कैसे ताली बजा बजा के हंसते थे, अपने लाडले के पराक्रम पर निहाल होते थे, ये उसी का नतीजा है कि आज वह आप पर भी हाथ उठा सकता है, उल्टा सीधा बोल सकता है क्योंकि उसकी इस आदत को पक्का करने के जिम्मेदार तो आप स्वयम है।बचपन में जब दूसरों की पेंसिल रबड़ चुरा कर ले आता था और आप उसे डांटने समझने के बजाय पीठ ठोकते थे, जब वह बड़ों को दुर्वचन कहता, उनका अपमान करता2तब आप कैसे सिहाते थे आज उसी का नतीजा है कि उसे अपनी जिद गलत या सही पूरी कर चैन आता है और मजे की बात उसे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता।सच तो यह है कि इस सबके लिए जितना दोषी वह है उतने ही आप भी हैं।वो तो बच्चा था, जिद करना उसका अधिकार था, उसे अच्छे बुरे की समझ कब थी, वह नादान था, दुनियादारी का ज्ञान नहीं था उसे, पर आप तो बड़े थे, समझदार थे, दुनियादार थे आप तो जानते थे कि उसके भविष्य के लिए क्या अच्छा है क्या बुरा।आप कैसे बच्चा बन गए अनसमझ बन गए क्यों भूल गए कि कच्ची डाली ही नमनीय होती है उसे जैसे चाहे शेप दे सकते हैं।आप तो कुम्हार की भूमिका में थे, चाक तो आप ही घुमा रहे थे फिर बर्तन कैसे टेढ़े मेढ़े हो गए ,अवा में पकाने का काम भी आपका ही था न तो क्यों कोई कच्चा रह गया और कोई क्यों जल गया।आंच का ताप तो आपको बराबर रखना था, आपका ध्यान कहां था तब।आपको ईश्वर ने कच्ची मिट्टी का लोंदा दे दिया पर गढ़ना पकाना तो आपको ही था न।तो एक बार सोचिएगा जरूर कि चूक कहाँ हो गई, जो भी परिस्थिति रही हो आप उचित निर्णय तो नहीं ले पाए न,कभी इस कारण कभी उस कारण अपने दायित्व को इस उस पर ट्रांसफर तो नहीं करते रहे, अपनी जिम्मेदारियों से बचते बचाते तो नहीं रहे।पिता माता बनने का भी प्रशिक्षण होता है ये अलग बात है कि उसकी पढ़ाई अलग से नहीं होती, कक्षाएं अलग से नहीं होती, अपने माता पिता को देखकर ही सीख जाते हैं।जैसा हमारे साथ हुआ कमोवेश वैसा ही करने लगते हैं1और जो आचरण हमें पसन्द नहीं आये उससे दूरी बरतते हैं, जो हमें नहीं मिल पाया वह अपने बच्चों को देने की कोशिश करते हैं,जो हम नहीं बन पाए वह बच्चों को बनाने का प्रयत्न करते हैं।जिसे आजकल इस रूप में व्याख्यायित किया जाने लगा है कि माता पिता अपनी दमित इच्छाओं को बच्चों के माध्यम से पूरी करने में लगे पड़े हैं ।
वह छोटा गुदगुदा सा पालने में लेटा बालक क्या जानता है कि उसके लिए क्या अच्छा है क्या बुरा,उसे तो जो अच्छा लगे सब चाहिए होता है, बच्चा जो है अनसमझ है पर आप तो दायित्ववान है, आप तो जानते हैं उसे क्या खिलाना पिलाना है आपको तो पता है कि फास्ट फूड चाकलेट और अटरम सटरम उसके स्वास्थ्य के लिए जहर हैं, वह तो हर चमकती चीज लपकता है उसका बाल स्वभाव है पर आपको तो अनुभव है न कि चमकने वाली सब चीजें सोना नहीं होती।उसे सिखाना आपको है गुरुजी को है हम बड़ों को है पर हम तो उसके रोने रूठनेमटकने घर छोड़ देने की धमकी से घबरा जाते हैं घबराना भी चाहिए आखिर वे घर के चिराग हैं पर बात उठती है हमारे ही जायों में ये विरोध कब से कुलबुलाने लगता है बागी बनने की प्रक्रिया कब से शुरू हो जाती है असंतोष के बीज कहां से पड़ जाते हैं क्रोध का अंकुर कहां से फूट पड़ता है, क्या ये सब वह साथ लेकर आता है जिसे कह दिया जाता है पूत के पांब पालन में ही दिख जाते हैं या वह माहौल से ग्रहण करता है या हम बड़ों की देखादाखी करता है।कहीं से तो शुरुआत होती होगी इस सबकी।
तो मुद्दा बड़ा है, समस्या गहरी है,इसे इस उस पर डाल कर हाथ नहीं झाड़े जा सकते, यह कह कर बचा नहीं जा सकता कि हमने तो सब किया अब सफल नहीं हुए तो किया करें।व्यक्ति अपना सा सब करता ही है जो नहीं आता उसे दूसरों से सीखता भी है क्योंकि उसके ऊपर अपने बालकों के लालन पालन का दायित्व जो है।वह माता पिता की श्रेणी में आ गया है अब वे मात्र पति पत्नी प्रेमी प्रेमिका नहीं रहे, जिस गोलू मोलू को जीवन दिया है उसका पूरा पूरा दायित्व उनका ही होता है।और ये दायित्व केवल धन जोड़ने से पूरे नहीं होते ,जिद पूरी करने मात्र से नहीं निभ जाते, उन्हें मनचाहा छूट देने से नहीं निभते, उनकी गलतियों पर पर्दा डालने से उनके सही गलत का पक्ष लेने से नहीं निभा करते।ये तो प्रारम्भिक समय में डाले जाने वाले मूल्य होते हैं।तो अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा जो हम नहीं कर सके तो दूसरों के लिए तो रास्ता खोल सकते हैं उन्हें तो अपने अनुभव का लाभ दे सकते हैं भले ही लोग कहते रहें कि पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आचरहिंते नर न घनेरे।
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