Thursday, April 28, 2022

माता शत्रु पिता वैरी

 सफर जारी है.....851

19.02.2022

कितना अजीब लगता है न पढ़कर  इसे, दुनिया के कोई भी माता पिता अपने बालक के शत्रु और वैरी कैसे हो सकते हैं भला।वे तो स्वयम उसे बहुत प्यार से इस दुनिया में लाते हैं।बच्चे तो उनके प्यार का प्रस्फुटन हैं।उसे पाने के लिए वे क्या क्या मनौती नहीं मानते, किस किस देवी देवता की चौखट पर माथा नहीं रगड़ते,कितने व्रत उपवास, पूजा पाठ,कितने तीर्थ दान करते हैं।कुछ को तो मांगने के कारण मांगे याऐसे ही किसी अनकटोटे नाम से पुकारने लगते हैं और वही उनका स्थाई नाम हो जाता है।इतिहास गवाह है कि दशरथ ने सन्तान प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया और बाबा नन्द भीअपने ठोटा को पा कैसे निहाल हो गए थे, माता जशोदा तो उसे पा इतनी उत्साहित और मगन हो गई कि उनके बूढ़े शशरीर में गजब का दम आ गया।बच्चे तो माता पिता की आंख के तारे होते हैं, बुढापे की लाठी होते हैं उनकी जीवन बगिया के फूल होते हैं, उनके जीवन निर्माण में अपना सर्वस्व लगा देते हैं।उनका चेहरा जरा सा कुम्हला जाए तो माता पिता के प्राण हलक में आ जाते हैं।वे उसके स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से भीख सी मांगते हैं, पैरों में सिर रख देते हैं, उनके लिए किसी पीर मजार देवी देवता की चौखट पर जाने से गुरेज नहीं करते, बच्चे तो उनका जीवन धन है फिर वे भला क्योंकर शत्रु और वैरी लिखे गये।

इसे समझने के लिए इसका अगला पद पढा जाना अनिवार्य है येन बालो न पाठित: अर्थात जो माता पिता अपने बालक को पढ़ाते नहीं हैं, उन्हें शिक्षा दीक्षा नहीं दिलवाते, उन्हें विद्यालय नहीं भेजते, उन्हें ऊंच नीच का गणित नहीं समझाते, उनमें संस्कार और नैतिकता रोपित नहीं करते, उन्हें मानव बनाने के यत्न नहीं करते ,उनके सुंदर भविष्य के निर्माण की योजना नहीं बनाते, उन्हें नीति और मूल्य का पाठ नहीं पढ़ाते, वे जन्मदाता की श्रेणी में भले रखे जाते हों पर वे अपने बालक के शत्रु और वैरी तुल्य ही कहे जाते हैं।हाड़ मास के पुतले को तो जन्म पशु पक्षी भी दे लेते हैं, उससे क्या,ये तो केवल उन्हें इस जग में लाने की प्रक्रिया भर है।पर उसे जीवन जीने का प्रशिक्षण देना भी जन्मदाताओं का काम है जरूरी दायित्व है उसे इस उस के कंधे पर डाल निश्चिन्त नहीं हुआ जा सकता।

गरीब से गरीब माता पिता की शिक्षा के लिए सचेतन होते हैं, खुद भले ही अनपढ़ हों पर बच्चे को विद्यालय भेजने को आतुर रहते हैं कि वह कैसे भी चार अक्षर लिख पढ़ जाए, अपने पैरों पर खड़े होने लायक हो जाए, दुनिया की ऊंच नीच समझ ले, दुनियादारी सीख जाए, अपना जीवन तो आसानी से बिता सकेगा।अपना पेट काट कर मेहनत मजदूरी कर विद्यालय भेजने के सारे उपक्रम करता है, फीस जुटाता है, कॉपी किताब बस्ता यूनीफार्म जूते मोजे बोतल लन्च बॉक्स सभी की व्यवस्था करता है कि उसके बालक को कोई असुविधा न हो।बारह चौदह वर्ष बाद जब बालक पढ़ कर तैयार होता है तो माता पिता का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है कि देखो मेरा बालक भी पढ़े लिखों की जमात में आ गया, मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो गया कि फलाने फलाने का छोरा छोरी बी ए एम ए हो गया।उसकी प्रसन्नता की सीमा नहीं रहती।पर वह पढाई लिखाई जब ढकोसला सिद्ध होती है, केवल डिग्री और अंकतालिकाओं का पुलिंदा भर बन जाती है, उसके जीवन में कोई बदलाब नहीं ला पाती, चिकने घड़े पर सारा पानी फिसल कर इधर उधर बह जाता है तो माता पिता के हाथों के तोते उड़ जाते हैं कि अरे ये क्या हो गया।ये तो कोरा का कोरा ही रहा, मूरख का मूरख ही रह गया।

बड़े चाब से जिन गुरु जी को अपना पाल्य सौंपा था, जिस पढाई के लिए अपना पेट काटा था, माँ हर क्षण ये सपना देखती थी कि कब उसकी संतान ज्ञान के आलोक से स्नात होकर आएगी पर उसके हाथ स्नातक की डिग्री तो आई पर जीवन वैसा कोरा ही रह गया।अब गुरुजी भी क्या करें वही तो पढ़ाएंगे सिखाएंगे जो सिलेवस में होगा, जो इम्तहान में आएगा, तभी तो परीक्षा पास कर पाएंगे तभी तो पास की अंकतालिका मिल पाएगी और डिग्री धारी हो पायेगा।उसी डिग्री के आधार पर ही पैकेज वाली नौकरी मिल पाएगी,पेट भरने को चार पैसों का जुगाड़ हो पायेगा।समाज में चार लोगों के बीच उठ बैठने लायक हो पायेगा।बाकी सब बातें आचार व्यवहार गए तेल लेने, उन्हें आज के जमाने में कोई कूड़े के मोल भीनहीं खरीदता।तो माता शत्रु पिता वैरी न कहे जाएं तो बालको को पढ़ने भेजा और इसी में अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली

बात कहीं इससे बहुत आगे की है।पढाना कुछ विषयों को रटा देना मात्र नहीं था, उनमें जीवन की समझ विकसित करना था, मानवीय गुणों का विकास करना था, उनमें धीरज भरना था, उन्हें बड़ों का सम्मान करना सिखाना था, उन्हें   छोटों को स्नेह देना सिखाना था, उसके मन में परिवार समाज देश के लिए जज्बा जगाना था, उसे सिखाना बताना था कि घर पारस्परिक सहयोग और सौहार्द से बसते हैं झूठी जिद और अहम से नहीं, त्याग सेवा सहायता परोपकार जैसे मूल्य सार्वजनीन होते हैं बेकार और बकबास की श्रेणी में नहीं आते, जीवन के लिए धन उतना ही जरूरी है जिससे पेट भरा रहे, उसे भंडारित करने पासबुक में आंकड़े के आगे शून्य की बढ़त सुख सौभाग्य की गारंटी नहीं है।सब यहीं रह जाना है पर जीवन में सेवा सदाचार परोपकार स्नेह का मूल्य विकसित हो गया तो सब भंडार भरे रहेंगे ,सब सुख झोली में सिमट आएगा, इतना छलकेगा कि आप दोनों हाथों से भी उसे संभाल नहीं पाओगे।पर शिक्षा का ये अर्थ लिया ही कब गया।न इसे गुरुजी जान पाए जिनके पास बड़ी आस से अपने बालक को भेजा था कि चार अक्षर लिख पढ़ लेगा तो जीवन जीने का सलीका आ जायेगा।हां,निश्चित ही वह पढ़े लिखों की कैटेगरी में तो आ गया पर अभी उस पढाई को गुनना शेष है।कोई जरूरी नहीं कि सब विद्यालय में ही सीखा सिखाया जाए, ध्रुव प्रह्लाद शिवाजी कौन सी पाठशाला में गये थे,उन्हें तो माता पिता ने ही जीवन मूल्यों कीशिक्षा दे दी।तो अभी भी समय शेष है कि अपने अपने बालकों को जीवन की सही दिशा दें और माता शत्रु पिता वैरी येन बालो न पाठित:के भाव को संजीदगी से ग्रहण करें नहीं तो सब करते धरते भी शत्रु और वैरी की श्रेणी में वर्गीकृत हो जाएंगे।

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