सफर जारी है...850
17.02.2022
आज माघ पूनो है संत रविदास की जयंती, रैदास का जन्मोत्सव।रैदास जो अपने दैनन्दिन कार्य में मगन रहते
हैं,जाओ जिसको तीरथ जाना हो, गंगा स्नान करना हो, रैदास जी तो अपने घर ही भले।उन्होंने सूत्र वाक्य जो पकड़ लिया है... जो मन चंगा तो कठौती बीच गंगा।सच ही तो मन की पवित्रता बड़ी बात है।कबीर भी तो यही समझाते रहे मूंड मुड़ाये हरि मिले तो सब कोई लेय मुड़ाये, बार बार के मूड़ते भेड़ न बैकुंठ जाए।मनुष्य बार बार जपता तो रहा... जप माला छापा तिलक सरे न एको काम,माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहि, मनवा तो चहुं दिशि फिरे यह तो सुमिरन नाहि पर उस पर अमल करने में नानी मरती रही, छठी का दूध याद आता रहा।कोई अमल में लाये या न लाये पर रैदास ने तो कस के गांठ बांध ली कि कर्म ही पूजा है।मन ही मंदिर है।मोको कहाँ ढूंढे बन्दे मैं तो तेरे पास में, ज्यों पुहुपन में बास है और चकमक में आगि,तेरा साईं तुज्झ में जागि सके तो जाग।ये जगना ही तो नहीं हो पाता।मार गोरख धंधों में लगे रहते हैं, पाहन पूजे हरि को मिलने की आस रखते हैं पर घर की चाकी पूजने की याद किसी को नहीं रहती जिसके पीसे से पेट की आग शांत होती है।अरे एक बार उस सांबले से नैन तो मिले, झूम झूम कर गाओगे छाप तिलक सब छीना कि तोसे नैना मिलाय के।
सब कर लेते है पर वही नहीं सध पाता जिसकी सबसे अधिक जरूरत है।रैदास अपने पैतृक व्यवसाय में लगे जूते गांठते भी सब साध लेते हैं।अड़ोसी पड़ोसी गंगा स्नान को जा रहे हैं ।शिष्टाचार वश उनसे भी पूछ लेते हैं चलो रैदास तुम भी चले चलो, पर रैदास काम का हर्जा कर कैसे जाएं भला तो ताँबे का एक सिक्का उठा मित्रों को देते हैं कि मेरी तरफ से गंगा मैया को चढ़ा देना।सच्चे भाव से चढ़ाने के लिए दिया सिक्का गंगा मैया स्वीकार करती है और बदले में अपने भक्त के लिए सोने के कंगन प्रसाद स्वरूप देती है।सोना देख मित्र का मन डोल जाता है।कंगन पत्नी को पहना देता है, लेकिन कंगन ढीले हैं सो एक गंगा जी की भेंट चढ़ जाता है और शेष बचे दूसरे पर रानी की दृष्टि पड़ जाती है।हैं ही ऐसे मोहक, और हों भी क्यों न,दैवीय प्रसाद जो है।रानी कंगन ले लेती है पर एक से क्या होगा, दूसरा हाथ नंगा क्यों रहे।अब विशाल गंगा जी में कड़ा खोजे कौन पर रानी को तो दूसरा चाहिये ही।राजा के सेवको को पता चलता है कि कोई रैदास हैं जो खोया पाया सब बता देते हैं, सेवक उनके पास पहुंच जाते हैं ,कंगन दिखाते हैं कि इसके साथ का कंगन नहीं मिल रहा, खो गया है, आप तो सब जानते हैं बता दीजिए। रैदास पूछते हैं आखिर कंगन गिरा कहां था।जबाब मिलता है गंगा जी में।रैदास कठौती में गंगा का आवाहन करते हैं । कठौती में हाथ घुमाते है और कंगन मिल जाता है, सेवक को दे देते हैं।सेवक हैरान हैं कि कंगन गिरा तो गंगाजी में था लेकिन रैदास की कठौती में कैसे आ गया।हां,गंगाजी कठौती में ही उतर आई क्योकि रैदास का मन सच्चा था।जन सामान्य के हाथ एक किंवदन्ती लग गई जो मन चंगा तो कठौती बीच गंगा।
उनके भजन जन जन की जुबान पर हैं प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी।उनके दोहों में जो सन्देश है बस उन्हें मथ कर ह्रदयंगम कर लिया जाए तो सब दुखों से मुक्ति मिल जाए, आवागमन के चक्र से ही छुटकारा मिल जाये।बानगी तो देखिए....ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सभी को अन्न,छोट बड़ो सब सम बसै रहे रैदास प्रसन्न।रविदास जन्म के कारने होत न कोई नीच,नर कू नीच करी डारि है ओछे कर्मन की कीच।हरि सा हीरा छाड़ि के करे और की आस,ते नर जमपुर जाएंगे भाषे सन्त रैदास।
सन्त तो बहुत कुछ कहते हैं पर हमारे कानों में तो ठेक पड़ी हुई है, सो अंदर जाता कब है कुछ भी।दो चार बात ही समझ आ जाये तो जिंदगी ही बदल जाये।ऐसे संतों को बारम्बार प्रणाम जो जनहित में अपना जीवन लगा देते हैं।बड़े भाग तब जानिए जब मिलने आबे सन्त, और सन्तन को मिलनो करे सब दुक्खन को अंत।
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