सफर जारी है.
09.03.2022
शक्ति का नाम ही नारी है.......
लो जी कर लो बात, जो शक्ति का स्वयम आगार हो, वह भला कमजोर कैसे हो सकती है, हां,कोमलता उसकी प्रकृति है पर कोमल होने से कोई कमजोर थोड़े ही हो जाता है।याद तो होगा कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी है, जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है।दुनिया में जीने के लिए बल पहली आवश्यकता है और यह बल धन शक्ति और विद्या का होता है।धन की अधिष्ठात्री लक्ष्मी, विद्या की सरस्वती और शक्ति की दुर्गा हैं और तीनों स्त्री का ही प्रतिरूप है।तीनों शक्तियों ने अपने अपने वाहन भी निश्चित कर रखे हैं एक शेर पर सवारती है दूसरे उलूक पर तो तीसरी हंस पर।सौभाग्य से तीनों ही देवी के रूप में पूजी जाती हैं।बसन्त पंचमी पर मां सरस्वती, दीपावली पर महालक्ष्मी और नवदुर्गो में दुर्गा का आराधन वंदन पूजन होता है।अब यदि ये त्रिदेवियाँ शक्ति का आगार है तो हम स्त्रियां भी तो इनका ही प्रतिरूप हैं, हम भला कमजोर क्यों कही जाएंगी।
इतिहास साक्षी है खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी, विद्योत्तमा अपाला अनुसूइया के किस्से अभी पुराने नहीं पड़े, सावित्री अपने पातिव्रत बल से यमराज के मुंह से अपने पति को छुड़ा लाई, इस कथा को हर बरस बडमावस पर ताजा कर लिया जाता है।वह विद्या बुद्धि में अपना लोहा मनवा चुकी है, अंतरिक्ष तक पहुंचकर उसने अपनी शक्ति को सिद्ध कर दिया, धनोपार्जन में वह किसी से पीछे नहीं।फिर भी वह दीन हीन उपेक्षिता क्यों है।क्या उसे अपनी शक्ति का विस्मरण हो गया है, क्या उसे हनुमान की भांति याद दिलाना पड़ेगा कि का चुप साधि रहे बलबाना।क्या वह अपने मार्ग से भटक गई है, क्या स्वतंत्रता के सही अर्थ को समझने में उससे कहीं चूक हो गई है, आखिर उसे मुक्ति चाहिए किससे,उसने अपने पैरों में खुद अपने सोच की बेदी तो नहीं डाल रखी है।कहीं उसने खुद को खूंटे से बंधा हुआ तो नहीं समझ लिया है जबकि खूंटे का अस्तित्व तो है ही नहीं, बस लम्बे समय से बंधे रहते उसे इसकी आदत सी पड़ गई है जबकि खूंटे तो कब के उखाड़ फैंक दिए गए हैं।उसने अपने घेरे स्वयम ही तैयार किये हैं और उसी में आबद्ध होकर रहना उसे रास आ गया है।
और मजे की बात यह है कि ये सब उसने स्वेच्छा से चुना है, उसे इस सब में आनन्द आता है, अपनों को भरपेट भोजन खिला कर उसे किसी मानसिक तृप्ति होती है, जन्म देते वह कैसे गौरव से भर उठती है, गृह लक्ष्मी है वह, घर की कल्पना ही उसी से है गृहणी ग्रहम उच्चयते, बिन घरनी घर भूत का डेरा।अरे सुबह से शाम तक वह परिवार के लिए ही खटती है न, इसको ये दे उसको वे दे, घर भर की छोटी से छोटी जरूरत का ध्यान रहता है उसे।आखिर वह अपने परिवार की स्वामिनी है।मकान पुरुष भले अपने बाहुबल से बना लेता हो पर घर तो उसे स्त्री ही बनाती है।वह अष्टभुजा होती है तभी न सारे काम जल्दी जल्दी सिलटा लेती है।उसे अव्यवस्था से अनख होती है सो आगे बढ़कर अपनी सारी थकान को भूलभाल कर पहले सब व्यवस्थित करने लगती है तब मुंह में हाथ देती है।उसे भला कौन निर्देशित करेगा वह खुद ही दिन भर सबको सही मार्ग सुझाती बताती रहती है।फूल से अधिक कोमल है तो वज्र से भी अधिक कठोर है।बस एक बार निश्चय कर ले तो पहाड़ को भी फूंक से उड़ा दे, कितनी भी कमजोर हो पर बच्चे की रक्षा के लिए तो रणचण्डी बन जाती है, अकेले ही दस बीस से भिड़ जाती है।वह आग का गोला है उस आग को चूल्हे के बीच सीमित कर दिया जाए तो हद भर के लिए भोजन तैयार हो जाता है और सीमाएं लांघ ले तो सब स्वाहा कर देती है।प्यार स्नेह की डोर से बांधो तो अपना सर्वस्व न्योछबर कर देती है पर उसे बेबजह बल और शक्ति से जंजीरों से जकड़ा जाय तो सारे बन्धन एक झटके में छिन्न भिन्न कर देती है।उसके भीतर सृष्टि और प्रलय दोनो पलती है।उसे कमजोर समझने की भूल भी मत कर लेना।अभी वह मार्ग से भटकी हुई है जिस दिन उसे बोध हो गया, अपनी शक्ति का स्रोत पता चल गया, अपने अस्तित्व का भान हो गया, वह नींद से जाग उठी, सब बदल जायेगा।नभी तो वह इस बात से बेखबर है उसे अपनी शक्तियों का भान ही नहीं, वह मार्ग भटक गई है, दुनिया की चकाचोंध में भटक गई है, सेमल के फूल के पीछे ताबड़तोड़ दौड़ भाग कर रही है।आनन्द स्रोत को पकड़ नहीं पाई है, आनन्द स्रोत बह रहा फिर क्यों उदास है आश्चर्य है कि जल में रहकर भी मछली को प्यास है।
घर से तो शुरुआत होती है उसका परिवार बड़ा व्यापक है, एक घर में पलती है तो दूसरे घर को आकार देती है।माता पुता भाई बहिन के साथ नए रिश्तों को भी बखूबी निभा ले जाती है।उसे क्या परवाह उसके तो एक नहीं दो दो घर है, दो घरों का सम्बल उसके साथ है, एक घर से संस्कार पाती है तो दूसरे घर जा उसे बोती है।उसे तो दो घरों का प्यार मिलता है दशरथ से ससुर कौशल्या सी सास और लक्ष्मण से देवर उसकी कामना में रहते हैं।मान देती है मान पाती है।आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उसे कई कई मंचों से सम्मानित किए जाने के उपक्रम हैं पर सबसे बड़ा सम्मान तो उसे अपने गौरव को याद कर मिल जाता है।उसमें सबको साथ ले कर चलने की शक्ति है, सबको एक सूत्र में बांध कर रखना जानती है वह।उसे सम्मानित करते पुरस्कार स्वयं सम्मानित होते हैं।उसके सामने संभावनाओं का खुला आकाश है, उसके पंख भी मजबूत हैं वह ऊंची उड़ान भरने को तत्पर है।उसकी दृष्टि कितनी भी दूर तक हो पर वह पैरों के नीचे की जमीन नहीं छोड़ती, जड़ों से सदैव जुड़ी रहती हैं, जानती है रहिमन सींचे मूल को फूले फल अघाय।केवल फुलक को सींचने से कुछ नहीं होता।
मानवी हो तुम, दुनिया को तुमसे बहुत सी आशाएं हैं।सच में तुम्हारे अंदर आशासों सम्भावनाओ का अथाह सागर लहराता है, बस अपनी शक्ति को पहचानो, सारे कुहरे को छांट दो, सूरज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है, डरो मत, पूरी कायनात तुम्हारे साथ है।बस लक्ष्य से भटक मत जाना।सारा जहां तुम्हारा है।कोमल भले ही हो पर कमजोर नहीं हो, शक्ति की स्रोत हो बस पहचानो उसे और स्वयमसिद्धा और खूब सामर्थ्यवान बनो।शक्ति अपने अंदर से आती है बाहर से इंजेक्ट करने से नहीं।शक्ति की आगार तुम्हें शत शत नमन।
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