Tuesday, July 19, 2022

हे प्रभो मुझे बता दो

 सफर जारी है....955

06.06.2022

सुनते सुनाते कितना कुछ कान में जाता है और कहीं वह सब हृदयंगम हो जाए तो जीवन में कैसा बदलाब आ जाता है।फिर आप कैसे निश्चिन्त हो जाते हो, आप को किसी से भय नहीं लगता।बस सारे दिन एक ही भाव प्रधान रहता है प्रभुजी हैं न, मुझे किस बात की चिंता, वे सब संभाल लेंगे।और जब आप को यह प्रतीति होने लगती है कि ईश्वर हर क्षण मेरे साथ है,वह मुझे हर पल देख रहा है तो कुछ गलत करने का विचार तक मन में नहीं आता।हजार आँखो से देख रहा है तुझे देखने वाला, छोटी से छोटी गलती भी उसकी निगाह में आ जाती है हम भले ही उसे इस उस पर डाल अपने को दोषमुक्त सिद्ध करने की कोशिश करते रहें।जब ईश्वर में इतनी प्रगाढ़ आस्था होती है तो गलत करते शर्म आती है, संकोच भी होता है कि अरे प्रभु के सामने क्या मुंह लेकर जाऊंगा। आप हर क्षण ईश्वर से बस एक ही प्रार्थना करते हैं बस प्रभु मुझे माया के बंधनों से बचा लो।मैं तो महा अज्ञानी हूँ, कुछ जानता नहीं, बस तुम्हारी शरण आना चाहता हूँ, हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ।

            कितना सुंदर भजन है, बस जो ध्यान से सुनो तो उसी में खो जाओ।बाल गोपाल पाठशाला की बालिका खुशी कितने भाव में डूब कर गाती है कि बस सुनते ही जाओ सुनते ही जाओ,फिर भी मन न भरे।अक्सर इस भजन को सुनते भावमग्न हो जाती हूँ,कहीं खो जाती हूँ।भजन के बोल हैं.... हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ, माया के बंधनों से छुटकार कैसे पाऊं, है प्रभु मुझे बता दो।अब प्रभु जी हैं कि कुछ बता के ही नहीं देते।भजन के बोल सुनते लगता है कि भक्त ने कलेजा निकाल के रख दिया हो।बस एक और एक ही इच्छा बलबती है, प्रभु चरणों में ध्यान लग जाए और माया में बन्धनों से मुक्ति मिल जाए।मुक्त ही तो नहीं हो पाते माया के बंधनों से।।मुक्ति तो खुद प्रभु से प्रार्थना करती हैं ....मुक्ति कहे गोपाल से मेरी मुक्ति बताय,ब्रज रज उड़ि मस्तक लगे तो मुक्ति मुक्त हो जाए अर्थात जब मुक्ति को भी मुक्त होने के लिए ब्रज रजकी धूल चाहिए तो फिर हमें तो उन्हीं गलियों में चलना ही होगा जहां ब्रजराज बसते हैं चलो सखी वहां चालिए चालिए जहां बसै ब्रजराज, गोरस बेचे हरि मिले एक पंथ दो काज।वृन्दावन के राजा दोउ श्याम राधिके रानी, करम धरम जहां बटत जेबरी मुक्ति भरे तहाँ पानी।तो माया के बंधनों से छुटकार पाने का बस एक ही तरीका है कि ब्रज के बसैया के रंग में रंग जाओ, बस सीता राम जपो राधे कृष्ण भजो।

            नही आता पूजा पाठ, नहीं आती पूजा की कोई विधि तो कोई बात नहीं।वाल्मीकि तो मरा  मरा जप कर ही राम के चरित लिखने सा बड़ा काम कर गए। प्रभु कृपा ने मूर्ख वरदराज से अभिज्ञान शाकुन्तल और रघुवंश जैसा ग्रन्थ लिखा दिया।बस मन साफ और शुद्ध हो और कड़ी मेहनत हो ।प्रभु की कृपा भयउ सब काजू।बस उसका वरद हस्त बना रहे।उसकी कृपा भर हो जाए।तभी भक्त कह उठता है.....ना जानू कोई पूजन अज्ञानी हूँ मैं भगवन,करना कृपा दयालु बन्धन से छूट जाऊं।इस आवागमन के बंधन से मुक्त हो जाऊं, है तो कठिन पर प्रभु की कृपा हो जाये,तो सध जाता है।माया के बंधनों से छुटकार भी मिल जाता है और प्रभु तक पहुंचने का मार्ग भी सुलभ हो जाता है।

            कहां पतितों का शिरोमणि मैं और कहां पतित को उबारने वाले भगवन, प्रभुजी हों सब पतितन को टीको, और पतित सब दिना चार के ,मैं तो जनमत ही को।अपने विषय में भान तो हो कम से कम कि हम कितने पानी में है, अच्छे हैं बुरे हैं,सरल हैं सीधे हैं, खुटसयाने हैं ,परोपकारी हैं, कंजूस है, परमार्थी हैं, कैसे हैं हम।आखिर करुण स्वरों में प्रार्थना कर बैठता है, देखिए क्या शब्दावली चुनता है मानुष।कैसा रोता गिड़गिड़ाता है  ...मैं हूँ पतित स्वामी तुम हो पतित पावन,अवगुण भरा ह्रदय है इसे कैसे मैं दिखाऊँ।माया के बंधनों से छुटकार कैसे पाऊं।हे प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ।

और फिर जैसे भी हैं प्रभु तुम्हारे हैं, पार लगाओ नैया, मेरे कृष्ण कन्हैया, तुम्हें छोड़कर कहां जाएंगे भला, और कौन है तुम्हारे सिवा, बनवारी रे जीने का सहारा तेरा नाम रे, मुझे दुनिया वालों से क्या काम रे। अच्छा हूँ या बुरा हूँ जैसा भी हूँ तुम्हारा,ठुकराओ न मुझे अब चरणों में सिर झुकाऊं, माया के बंधनों से छुटकार कैसे पाऊं।है प्रभु मुझे बता दो चरणों में कैसे आऊँ।तो प्रभु तुम्हारी शरण हैं,बस अपने चरणों में आने का मारग बता दो, माया के बंधन काटो प्रभु, अब तो सुन लो प्रभु।एक भक्त की है अरजी, आगे तुम्हारी मरजी, ठुकराओ या गले लगालो, बस तुमसे कह रहे हैं, तुम हो प्रभु जी अपने तारो या ठुकरादो, jaayen कहां hm भगवन, अपने गले लगा लो।

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