सफर जारी है....927
05.05.2022
बस एक बार सोच लो, दृढ़ संकल्प ले लो कि मुझे यह कार्य पूरा करना है तो सब सब हो सकता है, यहां तक कि शारीरिक अक्षमता भी आड़े नहीं आती।इस यात्रा प्रवास में ऊर्जा से भरपूर कितने व्यक्तित्व संपर्क में आये कि जिनकी कार्यनिष्ठा देखकर दंग हो गई।बिना थके निरन्तर चलने वाले इन मनस्वियों को दिल की गहराई से बधाई।तब लगा कि मन की दृढ़ता पास हो तो कैसे साधनों के अभाव में भी खुश रहा जा सकता है।जो बांट कर खाते हैं उनके पास अभाव फटकता भी नहीं है।बड़े बड़े तूफानों को भी ऐसे झेलते हैं कि मानो कुछ हुआ ही नहीं हो।कैसी भी विपत्ति आ जाए विचलित हुए बिना शांत बने रहते हैं, किसी को प्यार से समझाते हैं किसी को डांट देते है किसी के प्रति तटस्थ हो जाते हैं कुछ को छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं।वे जो मर्जी तरीका अपनाते हो पर स्वयम को कभी परेशान नहीं करते।वे जानते हैं बहुत रोने धोने चीखने चिल्लाने से दूसरों से उलझने से अपनी मन शांति भंग करने से भी परिस्थितियों को नहीं बदला जा सकता तो जितना श्रम इस सब1में लगाओ उससे तो अच्छा ही है कि इतनी देर में अपनी शक्ति का संचय कर दूसरे कार्य में लग जाओ ।
सिक्किम प्रवास में देखा कि कर्मठ छुकी चौबीस घण्टे में अड़तालीस घण्टो काकाम निबटाती है, सबकी सहायता को सदैव उद्यत रहती है, सब काम अपने ऊपर ले लेती है, सेवाभावी सबको आदर सत्कार देती है।इसलिए नहीं कि उस पर किसी का कर्जा है या करना उसकी मजबूरी है।वह ये सब करती है क्योंकि उसे ये सब करना अच्छा लगता है।इतने घण्टों के श्रम के बाद भी चेहरा प्रफुल्लित रहता है क्योंकि वह काम को झुंझला के नहीं करती, अपना फर्ज दायित्व समझ के करती है।काम का कितना भी दबाव क्यों न हो,मन की शांतिको भंग नहीं करती।बस अगन मगन सी लगी ही रहती है।एक छुकी ही क्यों, अभी तो औरों को जानना समझना बाकी है जो अपनी धुन के पक्के हैं और बिना किसी शिकवे शिकायत के अपने काम में लगे रहते हैं।सच जीवन में सफलता भी उनके कदम चूमती है जो एकला चलो के सूत्र को पकड़ लेते हैं।एक बार सबका आवाहन जरूर करते हैं,कहते भी हैं साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला तक जाएगा मिल कर बोझ उठाना, साथी हाथ बढाना साथी रे।पर जब कोई साथ नहीं हो तब भी अकेले चल देते हैं।वे अपनी राह खुद बनाते हैं, बनी बनाई पगडंडियों पर चलना उन्हें नहीं भाता।वे हमेशा लीड करते हैं, फॉलोअर नहीं बना करते।
ऐसों से जब मुलाकात होती है बात होती है तो आपको भी विश्वास हो जाता है कि अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।साधनों की कमी और दूसरों का सहयोग उतना मायने नहीं रखता जितना आपकेमन की दृढ़ता, आपका कार्य के प्रति समपर्ण, आपका जोश मायने रखता है।पर जोश में होश नहीं खोने होते, सुविचारित होना होता है, योजना बनानी होती है ,काम की निरंतरता बनाये रखने होती है,अपनी शक्ति को तौलना और बटोरना होता है, लक्ष्य पर एकाग्र चित्त हो निशाना साधने में निपुण होना होता है।समस्या आपकी है तो समाधान भी खुद से खोजने होते हैं,हमेशा दूसरों के आगे रोना धोना नहीं होता।तो चलिए आप भी उठिए, संकल्प लीजिये, शक्ति संचय कीजिये, अपने साहस को तौलिए,अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखिये और श्रीगणेश कर दीजिए।बाधाएं आएंगी, बिघ्न डराएंगे, विरोधी शोर मचाएंगे पर तुम्हें लक्ष्य से डिगना नहीं है।बस शांत भाव से अपना काम करते रहिए, करते रहिए, एक न एक दिन सफलता आपके कदम अवश्य चूमेगी।
तो सिद्ध करना जरूरी है कि अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।बस लगे रहने होता है तो दोस्तो लगे रहिये चलते रहिये निरन्तरता बनाए रखिये, भाड़ को फोड़ने को आप अकेले चने ही काफी है।
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