सफर जारी है....932
10.05.2022
किसी से मिलने पर हम सबसे पहले उसका परिचय प्राप्त करते हैं मसलन उसका नाम क्या है, वह क्या करता है, कहां रहता है, कितना पढा है आदि आदि।ज्यादा ही घनिष्ठता हो तो उसके परिवार के विषय में जानकारी ले लेते हैं, नौकरी का मसला हो तो पढ़ाई लिखाई ,डिग्री सर्टीफिकेट ,अनुभव प्रमाणपत्र यानी बायोडेटा का संज्ञान लेते हैं,शादी विवाह का मसला हो तो उसकी नौकरी, उसकी कमाई ,उसके परिवार के विषय में जानने की उत्सुकता होती है, किसी से मित्रता करनी हो तो दूसरी तरह की जानकारी अपेक्षित होती है औऱ वैसे ही बहुत सामाजिक होने का शौक चर्रा रहा हो तो अगले के सामाजिक परिसर की जानकारी ले ली जाती है मसलन वह किन के साथ उठता बैठता है, संग साथ कैसा है, शराब जुए गुटखा आदि खाने की लत तो नहीं है आदि आदि. यानी परिचय के क्षेत्र अलग अलग हैं औऱ सामने वाला अपनी जरूरत के अनुसार उतनी ही जानकारी रखना चाहता है जितना आवश्यक हो।अब हम कोई महापुरुष तो हैं नहीं, न कवि, रचनाकार और लेखक हैं जिनकी जीवन शैली याद करने की बाध्यता हो।तो जहां जितना जरूरी होता है उतना ही परिचय लिया दिया जाता है और नहीं तो महादेवी की तरह टीप दिया जाता है 'परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली'।
एक अध्यापक अपने विद्यार्थी के परिचय में शैक्षिक प्रगति को प्राथमिकता के स्तर पर रखता है,शेष बातों की जानकारी द्वितीयक होती है. सामान्यतया उसका सम्पर्क अपने पाल्य विद्यार्थी से छह से आठ घंटे का रहता है, इसके बाद दोनों की अपनी अपनी जिंदगी होती है. लेकिन आवासीय परिसर औऱ नवोदय विद्यालय के अध्यापक अपने पाल्यों के ऐसे अभिभावक होते हैं जो हर छोटी बड़ी गतिविधि पर आई वाच रखते हैं। उसकी उदासी ,उसकी प्रसन्नता सबसे अध्यापक का कंसर्न होता है.
पिछले तीन साढ़े तीन दशक में हजारों -हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाते एक बात खूब अच्छी तरह समझ आ गई कि जिन विद्यार्थियों को आप कक्षा में पढ़ाते हैं ,उसके पूरे व्यक्तित्व पर उसके परिवार की छाप अवश्य होती है, उसके व्यवहार में शालीनता या उग्रता के बहुत से कारण तो उसके पारिवारिक परिवेश में ही मिल जाते हैं, उसकी संगत से बहुत सी बातें स्पष्ट हो जाती हैं।
इस पुष्टि पर मुहर आज एक विद्यार्थी के परिवार से मिल कर औऱ हो गई है.श्री प्रेम कुमार हुगड़े मेरे प्राक्तन विद्यार्थी नीरज के पिता है. वे कर्नाटक बीदर के मूल निवासी हैं पर बाद में हैदराबाद में बस गये ।इक्कीस बरस पोरबंदर और पांच बरस आनन्द, गुजरात के नवोदय विद्यालय में हिंदी अध्यापक के पद से अभी दो बरस पूर्व ही सेवानिवृत्त हुए हैं । परिवार में हिंदी, तेलगु ,मराठी बोली जाती है,86 वर्ष की वयोवृद्ध दादी भले ही बेड रिडन हों पर ज़ब उन्हें व्हील चेयर पर पोता नीरज हम सबसे मिलाने लाया तो उनके चेहरे की प्रसन्नता देख कर बहुत खुशी हुई. माँ तो माँ होती है ।उसे इस बात का ख्याल बहुत रहता है कि अभ्यागत ने भोजन किया है या नहीं सो ज़ब काफी देर तक मैं प्रेम हुडगे जी से उनके नवोदय विद्यालय के अनुभव पूछती रही,सामाजिक समस्याओं पर चर्चा करती रही कि इस पीढ़ी को किस तरह संस्कारित किया जाए, उनका विचार था कक्षा आठ तक नैतिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया जाए।बात आगे बढ़ती तब तक अम्मा जी ने निर्देश दे ही डाला....पहले इन लोगों को खाना खिलाओ ।
बाद में बातचीत कर लेना. बहुत ही स्नेह आदर के साथ बिलकुल रूचि का भोजन क्या जैसे प्रसाद पाया हो ।बस थोड़े में ही तृप्ति हो गई ।गृह स्वामी चाय ,काफी, ठंडा सबसे परहेज करते हैं।बेहद सात्विक हैं ।खानपान और आचार विचार दोनों में।शायद हमारा आज का अन्न पानी वहीं लिखा था।तभी ऐसे बानक बने।फिर सबको तिलक कर पान पुष्प दे विदा किया। परिवार की समरसता, सामंजस्य, सौहर्द के हम मुरीद हुए।डेढ़ घंटा अविस्मरणीय समय के रूप में दर्ज हो गया। श्री हुडगे जी के विद्यालयी अनुभव अपनी स्मृतियों में संजोये हम अगले पड़ाव के लिए चल तो जरूर दिए हैं पर स्मृति मंजूषा में वे पल कैद हो गये हैं, एक आदर्श परिवार से मिलकर मन बहुत प्रसन्न है।
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