सफर जारी है....944
26.05.2022
कहा सुना तो यही जाता है प्रेम स्नेह का बंधन सबसे बड़ा होता है।आप प्रेम से सबको जीत सकते हैं।प्रेम में इतनी ताकत होती है कि वह बड़े से बड़े कार्य करवा लेता है।प्रेम दीवानी मीरा का हाल किसी से छिपा नहीं है।प्रेम में दुख दरद भी मिलता है लेकिन प्रिय की प्राप्ति में ऐसे सैकड़ों दुख दरद न्यौछाबर किये जा सकते हैं।ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय, घायल की गति घायल जाने के जिहि लागी सोय।बस लग्न गई तो लग गई फिर कोई परवाह नहीं, कितने भी कष्ट मुसीबतें आये, अगला पलट कर तक नहीं देखता, भेजते रहें राणा जी विष का प्याला, उसे भी गटक लिया जाता है।विष का प्याला राणा जी भेजा पीबत मीरा हांसी रे, पग घुघरू बांध मीरा नाची री।कहते रहो तुम कि ये सौदा लाभ का नहीं है पर जो प्रेम में बिक गया सो बिक गया।कोई कहे सस्तो कोई कहे महगों लियो री तराजू तोल, माई री मैंने लीनो गोविन्दो मोल।उधर गोपियों का भी यही हाल है, वे कृष्ण के प्यार में आकंठ डूबी है।मधुवन को हरे भरे देख कर आश्चर्यचकित हैं, प्रश्न कर बैठती हैं मधुवन तुम कत रहत हरे, विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाड़े क्यों न जरे।उन्हें यमुना अत्यंत मलीन दीखती है।लखियत कालिंदी अति कारी।जब प्रिय दूर हो तो सारी की सारी कायनात उसी के विरह में डूबी लगती है।ब्रज वनिताएँ तो उस सांवले की एक झलक पाने को, उसकी वंशी की धुन पर सब छोड़ छाड़ कर पागलों की तरह दौड़ती हैं।
ऊधो ज्ञान की पोटरी लेके उन्हेँ समझाने आये है।उनसे साफ साफ कह देती हैं ऊधो मन न भये दस बीस, एक हुतो तो गयो श्याम सङ्ग को आराधे ईश ।ऊधब के हाथ सांबरे ने प्रेम पाती भेजी है सो मोकू लिखो है का, मोकू लिखो है कहती बाबली हो जाती है प्रिय नहीं आये तो क्या उसकी चिठ्ठी तो आई है।लो आगई उनकी याद वो नहीं आये।प्रेम इतना शक्तिशाली होता है कि एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली जैसे गीत गबबा देता है।रसखान तो कृष्ण प्रेम में इतने मगन हो गए कि हर जन्म में उनका साथ पाने को किसी भी योनि में जन्म लेने को तैयार हो गए मानुष हो तो वही रसखान बसो ब्रज गोकुल गांव के गवारिन, जो पशु हो तो कहा बस मेरो चरो नित नंद की धेनु मँझारन, जो खग हो तो बसेरो करो मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन, और पाहन हो तो वही गिरि को जो धरयो छत्र पुरन्दर धारन।इससे अधिक प्रेम की पराकाष्ठा क्या होगी कि बस उस प्रिय का साथ भर चाहिए, वह मुझे भले से न देखे पर मैं उसे दूर से ही निहारता रहूं।धन्य है ऐसा प्रेमजिसमें सब दिया ही दिया जाता है, लेने की कोई तमन्ना नहीं है।
फिर घनानन्द को पढ़ते लगा कि प्रेम का मारग तो सरल सीधा सा है जामें नेक सयानप बांक नहीं।तहाँ साँच चले तजि आपुनपो झिझके कपटी जे निशांक नहीं,घनानन्द प्यारे सुजान सुनो यहां एक ते दूसरों आंक नहीं, तुम कौन धों पाटी पढ़े हो लला मन लेत हो देहु छटांक नहीं।प्रिय से प्रतिदान मिले न मिले कोई परवाह नहीं, मन भर लेकर भी छटांक भर की तमन्ना नहीं।प्रेम का गणित तो ऐसा ही होता है।उस प्रेम के आंक के अलावा कोई दूसरा आंकड़ा दिखता ही नहीं।सब देकर भी कभी कभी झोली खाली की खाली रह जाती है पर कोई अफसोस नहीं होता कि मुझे कुछ नहीं मिला।आप अपने प्रेम को निभाते ही रहते हैं।प्रेम प्रतिदान की आशा करता भी कहां है।प्रेमास्पद मिले न मिले पर चेतना में हमेशा बना रहता है, उसकी यादों और एक झलक के सहारे भी रहा जा सकता है।
यदि प्रेम इतना सात्विक होता है, यदि प्रेम में इतनी शक्ति होती है यदि प्रेम इतना सच्चा होता है तो वह ये आजकल का कौन सा प्रेम है जो मनचाहा न मिलने पर न होने पर प्रिय को दिन रात कोसता है, उसके मरने की दुआ मांगता है उसे और उसके सम्बन्धियों को पानी पी पी कर कोसता है।कोसता ही नहीं ,सरेआम उसकी हत्या ही कर देता है ।उसके प्रेम के पात्र रोज बदल जाते हैं, आज इससे था कल उससे हो जाता है, स्थिरता कहीं नहीं होती।पहले एक के लिए दूसरी को छोड़ता है तो मन बदलने पर दूसरी को पाने के चक्कर में पहली को रास्ते से हटा देता है।ये प्यार का कौन सा रूप और प्रकार है जिसमें प्रेमास्पद रोज बदल जाते हैं।न तो इस प्रेम में अनन्यता दिखती है न एकनिष्ठता।बस अपने निजी स्वार्थ वश रोज पात्र बदल लिए जाते हैं घनानन्द तो कहते थे यहां एक ते दूसरों आंक नाम और आजकल का चलताऊ प्रेम यह सिद्ध करने लगा कि इसमें तो ढेरों ढेरों आंक है जो मर्जी चुनो पसन्द न आये उसे छोड़ सकते हो और फिर अगला चुन सकते हो।अवसर अनेको हैं बस लेते जाओ, मन भर जाए तो बदल लो, सब बिकता है यहां, बोलो क्या क्या खरीदोगे।
आज सब खरीद ही तो रहे हैं।एक बार में पसन्द कहां आ पाता है कभी रूप चाहिए तो कभी गुण फिर उस सबसे मन भर गया तो कुछ और की मांग उठ जाती है।अब ये मन ही तो है बेचारा ,बिना लगाम का घोड़ा जब जिधर चाहे मुंहउठाकर चल देता है।आज ये पसन्द तो इसे चख लो अब इससे मन भर गया तो दूसरे को टेस्ट कर लो।क्या हुआ, प्यार व्यार कुछ नहीं बस पात्र को कमोडिटी की तरह बदलते रहो।लिव इन रिलेशन शिप का जमाना है, जब तक मन करे रहो फिर पत्ता झाड़ दो।सुनते थे कि प्यार में शुचिता पवित्रता होती है, जो चुना वह जीवन की थाती होती है पर आजकल प्यार के जो संस्करण दिख रहे हैं वे तो इतने स्वार्थ परता से भरे हुए हैं कि बस प्रेम के सारे अर्थ ही बदल दिए गए।घनानन्द जी, आपने तो सही लिखा था कि अति सूधो स्नेह को मारग है जामे नेक सयानप बांक नहीं।पर अब इसके निहितार्थ बदल गए हैं, प्रेम की डुगडुगी बजती तो है पर उसमें गाम्भीर्य नहीं ,केवल खोखलापन बाकी है।तो बजाते रहो और जब मन भर जाए तो दूसरी डुगडुगी पीपनी खरीद लो।
No comments:
Post a Comment