Tuesday, July 19, 2022

कहना सुनना भी सीखो

 सफर जारी है......948

29.05.2022

सारी डिग्री ,उपाधि ,प्रमाणपत्र, पुरस्कार, शील्ड धरे के धरे रह गए जब जीवन के खुरदरे यथार्थ से सामना हुआ।जब सीख रहे थे तो छोटी छोटी उपलब्धियों पर बहुत गर्वित हो लेते थे देखो हमने कैसा तीर मार लिया, हम फर्स्ट आ गए, हमें इनाम मिला, हमारी प्रशंसा हुई और हम फूल के कुप्पा हो जाते कि बस हमने सारा जग जीत लिया।अब क्या है ,ये पहुंचे वो पहुंचे।बस मंजिल नजदीक ही दिखती थी लेकिन जब से चलना शुरू किया तब से चल ही रहे हैं, ढेरों टेढ़े मेढ़े मोड़ हैं ,घुमावदार रास्ते हैं ,वक्र हैं ,दंशनाए हैं,कहीं फूल हैं कहीं कांटे है, जगह जगह काई जमी है,फिसलन है,सब एक दूसरे को टँगड़ी मार आगे निकले जा रहे हैं।सबको भागने की पड़ी है, यहां कोई किसी के लिए नहीं रुकता।रुकना तो छोड़ो, आप गिर कर घायल हो जाए, भीड़ आपके ऊपर से गुजर जाएगी पर कोई संज्ञान नहीं लेगा।दया ,सहानुभूति, श्रद्धा ,त्याग, बलिदान सब पुस्तकों में ही अच्छे लगते हैं।वास्तविक जीवन में ये सब एक तरफ सरका दिए जाते हैं ।बस सबको एक ही चिंता लगी रहती है किसी तरह मेरा काम हो जाए ,दूसरा गिरे तो गिरे, मरे तो मरे मुझे क्या।अपना हो जाना चाहिए बस।

जीवन में मंजिल का तो नहीं पता कि कब आती है पर छोटे छोटे पड़ाव निश्चित ही आते हैं,जो भी छोटी छोटी खुशियां हैं उन्हें वहीं उसी क्षण मना लेना होता है।फिर तो उठी पैंठ आठवें दिन ही जुरती है।सुख और खुशियां अकेले नहीं आती ,वे अपने साथ दुख ,कष्ट ,मुसीबत की औगार भी साथ लाती हैं, एक आंख हंसती है तो दूसरी खून के आंसू रोती है।न दुख स्थायी होता है न सुख, बस सब आते जाते रहते हैं।यहां कुछ भी टिकाऊ नहीं है,न कुछ लेकर आये थे न कुछ लेकर जाना है, बस मुठ्ठी बांधे आये थे और हाथ पसारे जाना है। अंत में बस व्यवहार भर रह जाना है ।तो उसे करते तो सावधानी बरती ही जा सकती है।कहना आ जाये तो आधी समस्याए कम हो जाए।पर सब कुछ सीखा हमने पर आनुपातिक बोलना ही नहीं सीख पाये।कभी ज्यादा शब्द लगा दिये जो पैबंद से थेगदी से अलग दिखते हैं तो कभी उनमें इतना गैप छोड़ देते हैं कि वे अलग थलग कोनो में पड़े रहते हैं, किसी का किसी से कोई लेना देना नहीं होता।बस सब अपनी मस्ती में इठलाते रहते हैं ,हमें क्या के भाव में दुपके से  पड़े रहते हैं।जो कहना आ जाए तो आधी समस्याएं दूर हो जाएं।पर न कहने में महारथ हासिल है न सुनने में।बस दलिदरी से कुछ भी निरर्थक प्रलाप करते रहते हैं।बोलने से अवकाश मिले तो कान में कुछ जाए, कुछ समझ आये।इतनी तो तमीज ही नहीं सीखी कि जब दो बात कर रहे हों तो बीच में अपनी मटर नहीं भुनानी चाहिए।पहले बात तो समझ लो, तुम्हारा सम्बन्ध उस बात से है भी या नहीं।

कायदा तो ये कहता है जब तक पूछा न जाए, सलाह मांगी न जाए तब तक मुंह बंद रखो और जो पूछा जाए तो तमीज से जबाब दो।इतना चीख के क्यों बोलते हो, सब बहरे थोड़े ही हैं।स्वर कोमल रखा जा सकता है ,हो सके तो पिच भी धीरे रखो, ध्यान रखो तुम अपना पक्ष रख रहे हो, कोई युद्ध लड़ने नहीं जा रहे।और जो एक बार सुनना आ जाए तो बात जल्दी समझ आती है और उसी त्वरा से आप जबाब दे पाओगे।थोड़ा ठहर ठहर कर बोलो, उच्चारण की शुद्धता पर ध्यान दो ,शब्दों के अर्थ समझ कर प्रयोग करो, तसल्ली से अपनी बात रखो,दूसरे को सुनने समझने का अवसर दो।तुम तो बोलते हो ऐसा लगता है धड़धड़ मेघ गरज रहे हों कि लपालप बिजली चमक रही हो कि तड़तड़ातड़ ओले गिर रहे हों।स्वर इतना कर्कश क्यों कर लेते हो।सहज भाव से बोलो, कर्णप्रिय बोलो, सब सुनेंगे।सब सुनने के लिए ही बैठे हैं।बात वजनी होनी चाहिए, उसका कुछ अर्थ होना चाहिए।अनर्गल बोलों ही क्यों।शब्द बिना बात के खर्च क्यों करें।हम तो मितव्ययी हैं भाई तो जहां दस शब्द चाहिए पांच से काम निकालते थे, करते क्या, कहने को तो बहुत कुछ था पर सिखाया यही गया कि तौल मोल के बोलो।शब्दों को हिसाब से खर्च करो। वैसे भी शब्द को ब्रह्म कहा गया तो उसे पूजो, मनाओ, तब जाकर उसे अगले को सौंपो ,सामने वाला भी खुश और तुम भी खुश।तो नहीं आता तो सीखो कहना और सुनना, सच जिंदगी जीना बहुत आसान हो जायेगा।

No comments:

Post a Comment

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...