सफर जारी है....1014
03.08.2022
बढे चलो बढे चलो ......
संस्थाएं हो या कार्यालय, जहां के कार्मिकों को काम कल पर टालने की आदत पड जाती है और इस आदत में वे घुर्र गांठ लगा बैठते हैं, वे जीवन भर नहीं सुधरते। दूसरों को गच्चा दे वे मन ही मन प्रसन्न भले हो लें पर वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे होते हैं, अपना भविष्य बरबाद कर रहे होते हैं। उनकी अक्ल घास चरने चली जाती है और वे अपने सुरक्षा जोन में सिमटे अपने को तीस मारखा समझते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें रास्ते पर नहीं लाया जा सकता पर किसी को क्या पड़ी है जो बर्रा के छत्ते में हाथ डाले। तुम भी चुप हो वह भी चुप है, नई कहानी कौन कहेगा। चोर चोर मौसेरे भाई बनकर रहने के अपना अलग आनंद है। तो स्थिति को जस का तस बना रहने दो। अरे भाई, अब तक भी तो सब चल रहा था, फल फूल रहा था, सब अगन मगन थे।
पर शांत पानी में कंकड़ी मार अगले ने हलचल पैदा कर दी। बिगड़े बैलों की गरदन नाप ली गईं, नकेल डाल दी गईं, अब हिनहिना तो सब सकते हो पर रस्सी तुड़ा कर भाग नहीं सकते। न खाता है न खाने देता है, न पीता है न पिलाता है। सो सब जगह सूखा ही सूखा है, ऊपर की मलाई पर रोक लग गईं है और काम के दवाब बढ़ गए हैं तो असंतोष और तिलमिलाहट के बादल घिर आए हैं।तू डाल डाल मैं पात पात का खेल जारी है, चूहा बिल्ली की सी दौड़ चलती रहती है, अधिकांश बिल्लियां नौ से मूसे खाकर हज की ओर रुख कर चुकी हैं और जिन्हें चक्क दूध की आदत थी वे पी नहीं पा रही तो लुढ़काने और बिखेरने में लगी हुई है। कहीं कहीं खोंसने और झपट्टे मारने के दौर जारी है। बिगड़े नबाब हंटर की मार खा के दस कदम आगे बढ़ते हैं पर जैसे ही वार हलका हुआ फिर दस कदम पीछे लौट लेते हैं। काई इतनी गहरी जमी है कि लगातार खुरचे जाने की मुहिम जारी है। कभी कभी नबाब बदले बदले से लगते हैं पर सब ओढ़ा हुआ है, दरअसल मन के स्तर पर कुछ नहीं बदला है।बस मार कूट के मेहरा पे बिठा तो दिए जाते हैं पर हुंकारा भरने को टस से मस नहीं होते। डोर ये है कि कुएं को प्यासे तक लाया जा रहा है पर वे मुंह सिले बैठे हैं कि कहीं एक बूंद भी उनके मुंह में गिर जाए। उन्हें कुंए के शुद्ध मीठे पानी की दरकार नहीं, होठों को चस्का तो मदिरा का लगा हुआ है। ऐसे दीठों के लिए समझाहट बुझाहट सब बेकार है। वे जूते लाठी पैने के यार हैं। सुना है न कि मार के आगे भूत भागता है और भागते भूत की लंगोटी भी भली लगती है।
अब इन जंजालों में पड़ जाओ तो वेशकीमती समय पंख लगा कर फुर्र हो जाता है। वहीं घिसा पिसा रूटीन, इस उस को नोटिस इश्यू करते ही दिन बीतता है और एवरेज निकालो तो सौ दिन में अढ़ाई कोस भी नहीं चला गया होता। कुछ भी नया और रचनात्मक नहीं बस दिन भर काम की व्यस्तता की दुंदभी बजती रहती है पर परिणाम निल बटा निल। सारी ऊर्जा, सारी शक्ति सिरफिरों के साथ बहस में खर्च होती है। दिन थानेदारी करते बीतता है। तय समय में काम करने का दबाब साथियों के मुंह सिकोड़ देता है और माथे पर बल डाल देता है। प्रसन्नता उल्लास मुस्कान सब मुंह छिपा लेते हैं, रचनात्मकता दुम दबा कर भाग जाती है। अब ऐसे में उमस घमस मारे डालती है, बारिश की झड़ी भी मन को भिगो नहीं पाती। सो ऐसी पुलसिया थानेदारी से तो सामान्य सिपाही बन कर लगातार सार्थक काम करना, रचनात्मकता से लबरेज रहना सौ बट अच्छा। बढे चलो बढ़े चलो वीर तुम बढे चलो के शंख नाद के साथ आगे और आगे बढे चलते हैं।
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