यात्राओं के मध्य.....
सभी यात्राएं शुरू तो जीरो माइल से ही होती हैं पर नन्हे नन्हे बढ़ते कदम उसे इकाई से दहाई, दहाई से सैकड़ा ,
सैकड़ा से हजार, हजार से दस हज़ार और लाख तक ले जाते हैं । लाख से आगे भी दस लाख, करोड़, दस करोड़, अरब, खरब, नील, पद्म ,शंख और उससे भी आगे जहां है पर सब अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही चल पाते हैं। तो आज हजार कदम नापते मन में उमंग जागी है, देखें कितना और चल पाते हैं। फिर अंदर से आवाज आती है.....चल चला चल ओ राही चल चला चल । हिम्मत न हार, चल चला चल। अब जब तक चला जा रहा है खूब चल रहे हैं। मन है तो चले चलते हैं, कोई दबाव तो है नहीं , न किसी की गाय भैंस खोली है कि चलना ही चलना पड़ेगा। पड़ेगा से ही तो बाध्यता शुरू होती है, कसमसाहट होती है, मन उचट जाता है फिर आप नहीं चलते, मजबूरी आपको चलाती है। और जहां मजबूरी होती है वहां मन से नहीं चला जाता। हर दो कदम के बाद कुड़कुड़ाते है , भुनभुनाते हैं, चिड़चिड़ाते हैं और दो कदम भी ऐसे चलते हैं जैसे आफत आ गई हो। मुंह सिकोड़ लेते हैं, पैर तो ऐसे आगे बढ़ाते हैं जैसे हाथ पैरों में जान ही न हो । तो ऐसे बेमन से कोई सौ हजार कदम थोड़े ही चला जाता है।
चलो तो जिंदादिली से चलो, जब तक मन हो तब तक चलो, हंसते मुस्कराते चलो, झूमते झामते चलो। झींको मत भिनको मत, अहसान सा मत पटकते रहो। खूब घूमो फिरो, मस्ती के भाव में जीओ । और सुनो ,ये यात्राएं हमेशा एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते पैदल ,बस ,टैक्सी ,रेल, हवाई जहाज, पानी के जहाज से ही नहीं होती ।मन से, विचारों से, शब्दों से आप जगत की यात्रा घर बैठे ही कर सकते हो। देखा है न शब्द ही स्थाई होते हैं फिर चाहे वे किताबों में सोने जैसे अक्षर का रुप ले पृष्ठ दर पृष्ठ अंकित होते जाएं या मुख से निसृत होकर, बोले जाकर पूरे आकाश में ध्वनित होते रहें । देखा है न किसी ऊंची पहाड़ी या खाली इमारत में आवाज कैसे गूंजती है और हम कैसे अपने ही उच्चरित शब्दों की प्रतिध्वनि सुनकर हर्ष से भर उठते हैं। देखा है न एक अध्याय और दूसरे अध्याय के बीच कुछ न कुछ जुड़ाव बना ही रहता है। तो एक यात्रा से दूसरी यात्रा के मध्य भी कुछ बातें सेतु बनती है। कुछ अच्छा लगता है कुछ बुरा, कुछ जुड़ता है तो कुछ छूटता भी है। हां, किसी के विषय में दूसरों से सुनी सुनाई बातों के आधार पर निर्मित ऊंटपटांग अटकलें टूटती हैं। पूर्व धारणाओ में सुधार कर लिया जाता है। अब यात्रा करते, पढ़ते पढ़ाते, बतियाते आप लोगों से, उनके शहरों और प्रांतों से रूबरू होते हैं, उनके घर परिवार और कार्यस्थल में जाकर मिलते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष रुप से सुनते हैं, उनके व्यवहार को मायन्युटली ओबजर्ब करते हैं,उनके मित्रो साथियों से मिलते है तो आप हर बार नए अनुभवों से भर उठते हैं। हर बार आपकी गलत धारणाएं टूटती है और आप पुनर्नवा होते हैं।
तो दो यात्राओं के मध्य का समय बड़े सोच विचार का होता है, अपने को परिमार्जित करना होता है, गलत धारणाओ से मुक्त होना होता है और तो और जब आप विचारों की यात्रा नहीं कर रहे होते, लिख नहीं रहे होते तो आप सबसे अधिक लिख रहे होते हों यानी लिखने की प्लानिंग कर रहे होते हैं। तो करते कराते रहिए यात्राओं के मध्य के समय का प्रयोग और बनाए रखिए अपने को जिंदादिल और जीवंत।
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