Wednesday, August 17, 2022

भाषा बोल न जानहीं

 सफर जारी है...1017

07.08.2022

भाषा बोल न जानहीं.....

               कैसा भी कम पढा लिखा क्यों न हो, भाषिक संस्कारो की उम्मीद तो उससे की ही जा सकती है। और वैसे भी कक्षाओं में कौन बोलने चालने की शिक्षा दीक्षा दी जाती है कि पढ़े लिखे भाषाई संस्कारो की पोटली सिर पर लादे चलते हों। किसी भी विषय के पाठ्यक्रम में तो ऐसा कोई पाठ होता नहीं और नैतिक शिक्षा विषय के नाम पर जो मर्जी सिखाया जाता हो, उसे हमेशा से ग्रांटेड फॉर लिया जाता रहा कि ये सब किताबी बाते हैं, इनका भला दैनंदिन जीवन से क्या संबंध।कौन सीखता और सिखाता है भला बोलने चालने जेसी गैर जरुरी और हल्की फुल्की बात।ये सब तो परिवार, पास पड़ोस, नाते रिश्तेदार और इष्ट मित्रों से बतराते और दूसरो को बोलते चालते देख कर स्वत ही आ जाता है। शायद इसीलिए आस पास के परिवेश और मित्रों के चयन में बहुत सावधानी बरतने की बात कही जाती है। जैसा होगा संग, वैसे होंगे रंग ढंग। जैसी भाषा परिवार और आसपास के लोग बोलते है, कमोवेश वही संस्कार  बच्चा ग्रहण करता है।सारे सारे दिन जिस घर परिवार में चकल्लस होती रहती हो, हर व्यक्ति तीखी और चुभती आवाज़ में ह्रदय में सीधे गढ़ जाने वाले कड़वे बोल बोलने में दक्ष हो, ऐसे बोलने में अपनी शान समझता हो, जहां बड़ो को तू तड़ाक से संबोधित किया जाता रहा हो, उन्हें अपेक्षित आदर मान सम्मान देने में कंजूसी बरती जाती हो ,छोटो से प्यार से नहीं बोला जाता, बात बात अलंकार लगाने की रीतिबद्ध परंपरा हो, घर में शांति चुप्पी बनाए रखने के नाम पर किसी की झूठी अकड़ और घमंड को पोसा जाता हो फिर भले ही वह गलत क्यों न हो। अपनी ही सेर रखी जाती हो, अपना ही डंडा पुजवाया जाता हो, उस घर परिवार के किसी भी सदस्य से सभ्य भाषा की उम्मीद लगा बैठना  बेवकूफी के अलावा और क्या है भला। जो बेल ही कड़वी हो उस पर भला मीठे फल कहां से आऐंगे। बोया पेड़ बबूल का आम कहां ते होय।

        शिक्षा दीक्षा से व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव आता है, यह सैद्धांतिक सच भले हो पर व्यवहार का सत्य तो कम से कम नहीं ही है। और कौन पढ़ाई में बोलना चालना सिखाया जाता है। बस मोटे मोटे पोथे पढ़ कर, परीक्षा में ढेर से नंबर ले आओ, पहले दूसरे नम्बर पर बने रहो, सारा का सारा ध्यान पैसा वैसा कमाने में लगाए रखो , बस व्यक्ति के सारे भाषाई ऐब  ढक जाते हैं। पैसा और बड़े नामी परिवार का होने का इतना लाभ तो मिल ही जाता है कि गलत को भी ढका जा सकता है, उसके पक्ष में भी तर्क और दलीलें परोसी जा सकती हैं। और फिर जहां पूरा घर और परिवेश मिलकर ऐसे ऐसे दबंग करेक्टर तैयार कर रहा हो तो सुलह कराने वाले मध्यस्थ की मिटी पलीद अलग होती है। एंट्री लेने वाले ऐसे गर्मागर्म माहौल में दूर से ही हाथ जोड़ लेते हैं। इसलिए नहीं कि उन्होंने इस भाषा में डिप्लोमा नहीं लिया होता और उन्हें गाली गलौज करना नहीं आता। सच तो यह है कि इतनी नीचता के स्तर पर उनसे उतरा नहीं जाता। क्या आपका साबका पड़ा है ऐसे भाषा प्रेमियों और ऐसे दक्ष नमूनो से। आप दो चार ट्रायल देख लें तो पूरा मामला जानने से पूर्व ही तौबा कर लेंगे।

         हर बदतमीजी को यह कह कर छोड़ दिया जाना कि अगला नहीं मानता तो हम क्या करें भला, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।सच ही जो अपनो की मर्यादा नहीं रख पाता, उससे दूसरे तीसरे के साथ उचित भाषाई व्यवहार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। पर बात बड़ी है और इससे मुक्ति के उपायों पर सार्थक बहस जरुरी है , वरना तेजी से पनपती ये बेतरतीब खर पतवार सब कुछ मायने सब कुछ नष्ट कर देगी और सिवाय पछताने के कुछ और शेष नहीं रहेगा। तो शिक्षाविदो, समाज शास्त्रियों और कानूनविदों से अपील करना लाजमी है कि वे इस दिशा में सोचें कि भाषाई संस्कारो के बीज वपन की आखिर प्रक्रिया है क्या। ये जो नए मॉडल तैयार हो रहे है, उनमें लिंग और जाति विभेद नहीं हैं। ये कुकरमुत्तो की माफिक फैलते ही जा रहे हैं।वे अपने को तो बरबाद कर ही रहे हैं, साथ ही माहौल को भी इतना दूषित कर रहे हैं कि बस सांस घुटी जा रही है। तो सीखनी ही होगी भाषाई तमीज, देनी होगी नई पीढ़ी को ये विरासत और इसके लिए सबसे पहले हम बड़ों को अपने अपने को सुधारना होगा, अपने भाषाई आचरण पर लगाम कसनी होगी, बे ते की भाषा से मुक्ति पानी होगी तभी अगले को टोका और सुधारा जा सकेगा।

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