Wednesday, August 17, 2022

नेह की बारिश

 सफर जारी है.....९८१

०२.०७.२०२२

नेह की बारिश.....

जीवन में बहुत भागदौड़  है, सब बहुत ही व्यस्त हैं इतने व्यस्त कि जिस दो टाइम के भोजन के लिए सारे दिन इतनी भागदौड करते है , उसे खाने के लिए भी समय कम पड़ जाता है, भागते भागते खाना खाया जाता है, खाया क्या जाता है उसे जैसे तैसे निगल लिया जाता है,  उसे चबाया तक नहीं जाता। सच में सबके पास इतने इतने काम हैं, इतनी इतनी व्यस्तता है कि बस कुछ पूछो ही मत। किसी से राजी खुशी पूछने के लिए दो मिनट बात करो तो उसे लगता है मेरा समय नष्ट हुआ जा रहा है, सबको जल्दी है, किसी के पास टाइम नहीं। जीवन के लिए केवल और केवल कमाई ही सबसे जरुरी रह गई है, बाकी तो सब बहुत पीछे छूट गया है। और एक पगलैट हम हैं कि मिलने जुलने वालों से उनके नाते रिश्तेदारों के बारे में ही पूछते रहते हैं और अगला मुंह बिचका के ऐसे चल देता है जैसे कुछ कड़वी चीज मुंह में चली गई हो।

लोग अपनी व्यस्तता में परिवार के लोगों को ही याद नहीं रख पाते और हम उनसे नातेदार रिश्तेदार की बात पूछने का साहस कर बैठते हैं तो उनका नाक सिकोड़ना और मुंह बिचकाना तो बनता है न। इतना इतना काम है इतनी इतनी व्यस्तता है कि नाते रिश्तेदारी और सगे संबंधियों से मिलने, उनके यहां जाने के लिए समय का टोटा ही टोटा है। घर के जरुरी काम ही नहीं निबट पाते और इन्हें देखो ये अटरम सटरम नाते रिश्तेदारो में उलझे पड़े हैं। अरे, अपने निजी ही नहीं सपेरे जाते, फिर ये फलाने ढिकाने के चक्कर में कौन पड़े।ब्याह शादी उत्सव आयोजन की तो बात छोड़ो, हारी बीमारी में देखने जाने तक का समय नहीं है। अब मरे गिरे में शोक प्रकट करने के लिए जाना तो जरूरी है। अब ये चाहे दबाब की स्थिति हो या थोड़ी बहुत संवेदना शेष रही हो या सामाजिकता का तकाजा हो, कहा नहीं जा सकता। काम का कितना तो दबांब रहता है सबके पास, कितनी कितनी व्यस्तता है, सांस तक लेने की फुरसत नहीं है। बस व्यापार और नौकरी में ऐसे उलझे पड़े हैं कि पूछो ही मत। सब इस पेट के रगड़े झगड़े हैं, इसी की करामात है जो न करवा दे थोड़ा है। वैसे कभी अपने आप से पूछा है कि क्या वाकई पेट को इतने की मांग है, क्या इतना सब खा लिया जाता है, क्या खाने की भूख सुरसा की तरह मुंह फाड़ती जा रही है या हमारे शौक और सब कुछ पेट में ठूंसने की वृत्ति ने इस मोड़ पर ला दिया है। इस तरह से  चलता रहा तो आने वाली पीढ़ी तो इतनी व्यस्तता में नाते रिश्तेदारी सब भूल जायेगी। सगे बुआ मामा चाचा ताऊ के बच्चों को तो कजिन केटेगरी में वैसे ही रख दिया गया है और अन्य रिश्तों से दूर के कह कर कन्नी काट ली गई है। 

कैसा समाज तैयार कर रहे हैं हम अपने बच्चों के लिए, किस तरह के संस्कार के बीज बो रहे हैं, उन्हें अकेलापन विरासत में क्यों सौंप रहे हैं। क्या हम बिलकुल भूल गए उस राजा की कहानी को जो धन का और सोने का इतना लालची हो गया, इतना मुरीद हो गया कि यह वरदान मांग बैठा कि वह जिस भी वस्तु व्यक्ति को छूए, वह सब सोना हो जाए, मुसीबत तो तब हुई जब खाने के बरतन के साथ भोज्य सामग्री भी सोने की हो गई और जब बेटी को छूआ तो जीती जागती बेटी भी सोने की मूरत में बदल गई। राजा बहुत रोया पर क्या किया जा सकता था। राजा ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी, मूर्ख की तरह उसी डाल को काट दिया जिस पर बैठे थे। कमोवेश हम भी तो यही कर रहे हैं, अपनी रिश्तेदारी को ही नहीं जानते, अपने ददिहाल ननिहाल तक नहीं पता। आखिर इतने अकेले होकर हम खुश रह पाएंगे। आज जो धीरे धीरे सभी से कटते अपनी परिधि को हम दिन प्रतिदिन छोटा दर छोटा करते जा रहे हैं, इसका परिणाम भी सोचा है हमने। हमने तो यही पढ़ा था कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसे सबसे मिलजुल कर रहना पसंद है। डर है कि सबसे कटता कहीं वह बिलकुल अकेला ही न पड़ जाए और जब चेते तब तक बहुत देर हो चुकी हो।

पढाई लिखाई के नाम पर तो हम वैसे ही हम अपने बच्चों को एकांतवास दे चुके हैं, न किसी रिश्तेदार से मुलाकात है न किसी परिचित को जानते हैं, बस हमने उन्हें एक ही सपना दिया है कि खूब पढ़ो और ऊंची नौकरी करो। इससे इतर कुछ और सोचने ही नहीं दिया गया। बस परिणाम आज हमारे सामने है। नाते रिश्तेदारों से दूर पैसों के तिलिस्म में अपने बच्चों को फंसा कर माता पिता ही कौन सुखी हैं। जीवन में सब जरुरी है। तो सब साथ साथ चलने दीजिए न , नाते रिश्तेदारी के स्नेहिल संबंधों से उसे मत काटिए, उसे सबके साथ बढ़ने दीजिए, सब में मिलने जुलने दीजिए। इससे इसका व्यक्तित्व और निखरेगा। नेह की बारिश बहुत जरुरी है, उसे भीगने दीजिए, सरसने दीजिए। उसे बांटना सीखने दीजिए, उदार बनाइए, जितना परिकर बढ़ेगा,उसके स्वभाव में शील, धैर्य, सामंजस्य विकसित होगा। पालक आप हैं आप ही तय कीजिए कि आखिर आप उसे किस रूप में विकसित करना चाहते हैं।

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