सफर जारी है....९८९
१०.०७.२०२२
ये छोटे छोटे पड़ाव बहुत सुखद है........
बालकों का परदेश से घर आना जितना सुखद होता है चाहे वह एक छोटा अंतराल ही क्यों न हो, वापिसी उतनी ही कारूनिक होती है. घर जो खुशियों से भर उठता है, दीवारें, खिड़कियां छत से रसोई आंगन बाग बगीचे सब उदासी से भर उठते हैं, और तो और आस पड़ोस की गहमा गहमी हल्की पड़ जाती है। कल तक जो चेहरे उमग रहे थे वह एमपी अंसुवाए से हो जातें हैं, आंखों के कटोरे छलछलाने को आतुर होते है, पर उन्हें डपट दिया जाता है बाबरे हो रहे हो क्या, बालक नौकरी पर जा रहे हैं, उसे ढाढस बंधाओ, ये क्या बचपना कर रहे हो। उसके जाने की तैयारी में सहयोग करो। कोई ज़रूरी चीज छूट न जाए, वो तो बालक हैं, नई जगह देखने के उत्साह में कई बार छोटी छोटे ज़रूरी चीजें नजर अंदाज़ कर जाते हैं। घर से दूर जाना उन्हें भी उतना ही सालता है, घर उनका भी छूटता है, बचपन की यादें उन्हे भी परी लोक में ले जाती है, बारे बहिनों की शरारतें उनके मन मस्तिष्क को भी आलोदित करती हैं पर जाना तो है ही। फिर पूरा विश्व हर अपना घर है। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ भी तो आपने ही पढ़ाया था कि सारा जहां अपना ही है। सब जगह घूमो देखो वहां की तकनीक सीखो, जी जो जहां से अच्छा मिले, उसे लेते चलो। वह भी ज़रूरी है। सब अपने ही हैं। छोटे चित्त के मत बनो, ये मेरा ये पराया ऐसा तो छोटे चित्त वाले सौंपते है। बंजारों की तरह बनो। सबको देना सीखो, बांटना सीखो, सुगंध सीमित दायरे में बंध कर नहीं रह सकती, उसे सबको सुवासित करना होता है।
खुला आसमान, विस्तृत धारती, ऊंची ऊंचे पर्वतो की चोटियां , नीलए समुंदर, दिगदीगंत सब तुम्हारे ही है । तो सब को देखो, सबका आनंद लो, तो जब जितने समय जहां हो वहां पूरी तरह रहो, वहां के हो रहो। जैसा देश वैसा भेष रखो। बस फिर तो लौटना ही है। सबको लौटना ही होता है भला अपना देश गांव किसे प्यारा नहीं होता। यात्रा में वापिसी निश्चित होती है जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पे आबे, मेरो मन कहां अनत सुख पाबे। सूर ऐसे ही थोड़े लिख गए हैं। यात्रा यात्रा होती है, जीवन भी तो एक यात्रा है। मंजिल तक पहुंचने के बीच अनेक पड़ाव होते हैं जहां कुछ देर रुका जाता है, आनंद लिया जाता है, सबसे मिला जुला जाता है, यात्रा के प्रसंग सुनाए जाते हैं, भावनाएं अनुभूतियां कही, बांटी और शेयर की जाती हैं,पीपीएल फोटो शोटो लिए जाते हैं, खाया पिया घूमा सूमा जाता है। कहने को सब किया जाता है पर बहुत कुछ ऐसा फिर भी रह जाता है, बिटबीन द लाइंस मिसिग रह जाता है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सक्ता। ढेर सामान की पोटली बांध दो फिर भी कितना कुछ छूट जाता है। हजार लाख बार सीने से लगा लेने, पुचकार लेने के बाद भी मन कहां भरता है माता पिता का, वह तो पीछे पीछे सरपट दौड़ लगाता है। जातें हैं तभी तो वापिसी होती है। तो बालक बच्चे आते जातें रहें, जहां रहें खुशियां उनके आसपास मंडराती रहें। मन भारी है पर कोई नहीं हंसी खुशी विदा करते हैं सी आफ करते हैं। ईश्वर तुम्हें स्वस्थ और प्रसन्न रखे। कहा भए जो बीछुरे तो मन मो मन साथ, गुड़ी उड़ी आकाश में तऊ उडावक हाथ ।
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