Wednesday, August 17, 2022

पहले करो तो सही

 सफर जारी है....९७२

२३.०६.२०२२

पहले करो तो सही.....

कल अध्यापिकाओं के एक बड़े वर्ग से संवाद करते पाया कि आपका कार्य और व्यवहार आपको बहुत कुछ दिलाता है। बस करना होता है। लेकिन मुश्किल यह है कि हर व्यक्ति को चाहिए पहले,करने की बात बाद में। कैसे पूरा का पूरा तंत्र एक इस पहल के कारण बदल सकता है, इसकी शुरुआत कैसे हजारों लाखों के मानस को बदलने में सहायक होती है। बस आगे आओ तो सही, करने की सोचो तो सही, बोलना सीखो तो सही, अपने को लोगों से जोड़ो तो सही ।

छोटे छोटे प्रयास ही बड़े रंग ले आते हैं, बस उन्हें अमल में लाना होता है। आपको प्रभु ने एक विशेष कार्य के लिए चुना है तब आप अध्यापन क्षेत्र में आए हैं। इसे प्रभु की कृपा समझो कि इतने इतने विद्यार्थियों से जुड़ने का अवसर आपको मिला, आप चाहते तो इस अवसर का भरपूर लाभ उठा सकते हैं, अपनी बात को एक बड़े समूह तक पहुंचा सकते थे, आप इतने इतने विद्यार्थियों के जीवन को बदल सकते थे, उनमें जीवन के प्रति उत्साह भर सकते थे, उन्हें रचनात्मक बन सकते थे, उन्हें सही आकार दे सकते थे पर ये सब तब करते जब आपने स्वयं को नियोजित किया होता, कुछ सोचा होता, जब अपने कार्य को इस दृष्टि से देखा होता, उसके इतने पहलुओं पर सोचा होता, अपने को इस योग्य समझा होता, अपने को व्यवस्थित किया होता पर आपने ऐसा सोचा कब। आप तो बस ये मानते रहे कि मुझे तो जैसे तैसे बस दस से पांच तक नौकरी करनी है, उतना ही करना है जिससे काम भर चल जाए, बस कक्षा में गए, उसी पुराने ढर्रे पर किताब खोली, पाठ पढ़ाया, काले सफेद पट पर चाक या मार्कर से कुछ लिखा, प्रश्नों के उत्तर किताब के पाठ से प्रश्नों के उत्तर लिखवा दिए और आपकी छुट्टी हो गई। जरा दिल पर हाथ रख के सोचिए कि क्या बस इतना ही काम था आपका कि कक्षा में आए, एक महत्वपूर्ण अवसर को यांत्रिक से कार्य के साथ बिता दिया और हाथ झाड़ कर चल दिए कि चलो आज का दिन तो बीता, बस सारी दृष्टि अवकाश, यात्रा, सुविधा पर गड़ाए रहे। इसका दशांश भी आपने अपने कार्य को दिया होता, पढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम को पूजा मानना होता, उसे पवित्रता से ग्रहण किया होता, अपने कार्य दायित्व के प्रति गंभीर रहे होते तो आज सब कुछ बदला बदला सा होता, आपको मानसिक संतोष मिला होता, आप अपने को दायित्वशील मान रहे होते, समाज को दिशा दे रहे होते पर नहीं इस दृष्टि से सोचा ही कब गाया। एक बड़े लक्ष्य को भूलकर हम छोटे छोटे स्वार्थों में लिप्त हो गए, तेरा मेरा करने में व्यस्त हो गए और एक महत्वपूर्ण कार्य दायित्व को भुला बैठे।

मेरा इस अध्यापन क्षेत्र में जुड़े सभी दायित्वशील साधकों से अपील है कि वे अध्यापन की गंभीरता को समझें, अपने कार्य को केवल यांत्रिक न समझें कि केवल कक्षा में गए, पाठ पढ़ाया और छुट्टी हो गई। नहीं भाई नहीं, ये तो शुरुआत थी, इसके माध्यम से तो आप समाज और देश को बदलने की कड़ी में जुड़ गए हैं, आपको प्रभु ने एक बड़ा अवसर दिया है। इसका भरपूर लाभ उठाओ। आपको तो पढ़ाने का एक अस्त्र शस्त्र दिया गया है तो उसका सही प्रयोग करें, पढ़ाना केवल पढ़ाना भर नहीं है, यह तो आपकी बात जन जन तक पहुंचाने का माध्यम है तो उठो, जागो और काम पर लग जाओ, बहुत समय खो दिया, जो क्षण शेष है उसे पकड़िए। बस आज इतना ही।

No comments:

Post a Comment

इत्ते उलायती हू मत बनो

 सफर जारी है....1533 18.06.2024 इत्ते उलायती हू मत बनो.... बिन पे तो मैया की कोख में हू नौ माह नाय टिको गयो,दुनिया देखबे की उलायत लग रही.पडब...