Saturday, August 20, 2022

निखालिस सच, न बाबा न

 सफर जारी है.......1031

21.08.2022 

निखालिस सच, न बाबा न.........

पहले तो रटा और सौ बार लिखाया गया कि सदा सत्य बोलो, सत्य यानि सोलह आने सच। हमेशा न्याय का साथ दो। न गलत करो न गलत सहो। गलती से भी गलती हो जाए तो उसे तुरंत सुधारो, क्षमा मांगो और उसे दोहराने सी तोबा कर लो। बड़ी अच्छी अच्छी बातें पढ़ाई और सिखाई गईं लेकिन इन सब बड़ी बड़ी और अच्छी बातों को जब व्यवहार में लाना शुरू किया, तो मार हंगामा मच गया। फिर एक ओर पाठ पढ़ाया गया, सिद्धांत दूसरों के लिए हैं, अपनो के दायरे में आने वालो के लिए छूट का प्रावधान है। वहीं निखालीस सच बोलना बिलकुल मना है। ढेर सारी विवशताएं हैं कभी घर की गिरासू दीवार को बनाएं रखना होता है तो कभी ढहती छत को खुद बल्ली बन थामे रहना होता है। जानते सब भले हों पर कहना मना होता है। ये विवशताएं आपके घर के बाहरी ढपान को भले बचाए रखती हों पर आपके आत्म सम्मान को बुरी तरह तोड़ कर रख देती हैं। दूसरों की निगाह में भले आप महान बने रहते हों पर अपनी ही नजरों में आप गिर जाते हैं,अपने आप से नजरें नहीं मिला पाते।

     इतिहास गवाह है भीष्म पितामह कौरवों का सच जानते थे पर उनका नमक खा रहे थे, अपनी प्रतिज्ञा से बंधे थे तो भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण चुपचाप देखते रहे, भले ही दुख और पश्चाताप ने उनकी आंखें नीची कर दी हों पर उनके मुख से एक शब्द नहीं फूटा। उनमें इतना नैतिक बल शेष ही नहीं बचा था कि दुशासन को एक वस्त्रा द्रौपदी को खींच कर लाने और उसका चीर हरण करने से रोक सकें। लाज तो उस सभा में बैठे हर व्यक्ति को अवश्य आई होगी पर क्या करते, सबकी अपनी अपनी विवशताएं थीं। धृतराष्ट्र पुत्रमोह में अंधे न होते तो क्या सुयोधन सुयोधन नहीं बना रहता , धृतराष्ट्र तो दृष्टिहीन थे पर गांधारी ने तो जान बूझ कर अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली तब सुर्योधन के भविष्य के विषय में शकुनि की एंट्री उस घर में आवश्यक थी, सुयोधन को पढा लिखा कर उसके कान भरने, उसे दुर्योधन बनाने की जिम्मेदारी शकुनि को लेना लाजिमी था, आखिर तो मामा था उसका, भांजे के विषय में वह नहीं सोचता तो भला और कौन था। पुत्र मोह में अंधे धृतराष्ट्र कभी शकुनि से कड़ाई से मना नहीं कर सके क्योंकि मन ही मन तो उनकी इच्छा भी यही थी कि भले ही दुर्योधन गद्दी के लिए अपात्र हो पर सिंहासन उसे ही मिले। अपनी अक्षमताओं को वे पुत्र के माध्यम से सक्षमता में बदल देने का स्वप्न संजोए बैठे थे। दृष्टि हीनताके कारण उनके स्थान पर पांडु को गद्दी पर बैठा दिया पर उनका पुत्र तो आंखों वाला था भले ही दूरदृष्टि न रखता हो तो उसे गद्दी मिलनी ही मिलनी चाहिए, फिर भले ही उसके लिए सही गलत कोई भी जुगाड क्यों न भिड़ानी पड़े, कुछ भी सही गलत क्यों न करना पड़े, सब जायज़ है क्योंकि प्रेम और युद्ध में तो सब जायज़ ही होता है, नाजायज और अनुचित की कोई गुंजायस ही नहीं होती।

     विवशता नहीं होती तो आज भी सच कहने से व्यक्ति कन्नी क्यों काटता और किसी मजबूरी में उसे कहना ही पड़ जाता तो उसे युद्धिष्ठर की तरह अश्वात्मा हतो नरो वा कुंजरो कहता और वा कुंजरो के शब्द कृष्ण के पांचजन्य शंख की ध्वनि में डूब जाते। कितनी सरलता से सत्य की रक्षा भी हो जाती और द्रोणाचार्य नाम का कांटा भी रास्ते से सहजता से हट जाता। आज भी तो यही सब किया जा रहा है अपने कहे जाने वालों की रक्षा के लिए बात को ऐसे घुमा फिरा कर कह दिया जाता है कि सांप मरे न लाठी टूटे। बडा क्षोभ होता है कि हम कैसे समाज में रह रहे हैं जहां सच को सच कहना अपराध की श्रेणी में गिना जाता है, अपनो के घेरे में आने वाले को एक अपना ही सरे आम नंगा करता है, असम्मान जनक शब्दावली का प्रयोग करता है, असभ्यता और दुर्व्यवहार की सारी सीमाएं लांघ जाता है और हम बेबस से खडे देखते ही नहीं रह जाते बल्कि गलत को भी सही ठहराने की भरसक कोशिश करते हैं। भले ही अंदर अंदर सब जानते हों कि स्थिति आउट आव कंट्रोल है, कुछ नहीं किया जा सकता, बस यह कह कर पल्लू झाड़ा जा सकता है कि हमने तो बहुतेरी कही, बहुत समझाया बुझाया पर क्या करें मानता ही नहीं तो क्या किया जा सकता है। सच में ही कुछ नहीं किया जा सकता। सबको अपने किए कर्मों का फल स्वयं भुगतना होता है, दूसरा उसे चाहकर भी शेयर नहीं कर सकता, पर अपनों को अपनी आंखों के सामने तिल तिल टूटते देखना, उसको दुख दर्द झेलते देखना विवशता ही तो होती है। भले ही भाग्य में जो लिखा है भोगना ही होगा ,कह कर हम अपने मन को तसल्ली बंधाते रहें।

     सच को पढ़ सीख रट लेना और उसे व्यवहार में लाने के बीच इतनी महीन रेखा होती है कि अक्सर उसका उल्लंघन हो जाता है। निखालिश सोलह आने सच कहने का अब रिवाज नहीं रहा, हरिश्चंद्र की सत्यवादिता कटघरे में है, उस पर प्रश्नचिह्न लग गया है, सत्यम ब्रूयात प्रियम ब्रूयात में न ब्रूयात अप्रिय सत्य हावी है। जो सच कह दो तो लोग कैसी नज़र से देखने लगते हैं कि खुद को ग्लानि होने लगती है कि हाय राम ये क्या कह दिया, सीधा सीधा नहीं कहना था बल्कि सच तो कहना ही नहीं था और बहुत जरुरी था तो थोड़ा मक्खन मलाई लगाकर घुमा फिरा कर कहना था । पर अब क्या करें आदत में जो नहीं है तो उसका खामियाजा तो भोगना हर बार भोगना ही पड़ता है।तो घुमा फिरा के सच कहने की आदत डालो, निखालिस सोलह आने शत प्रतिशत सत्य कहने के जमाने लद गए, अब तो पूरे सिस्टम में ही भांग घुली हुई है तो इसका पार्ट बन जाओ नहीं तो किसी कोने में अकेले पड़े भुनभुनाते रहो। विकल्प आपको चुनना है, मरजी आपकी है जो चाहे चुनो।

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