सफ़र जारी है.....1070
28.09.2022
पाती प्यारी बिटिया कू.......
प्यारी लाडो,
सदा सुखी रहो।
तुम्हारे जन्म पर कितने कितने खुश थे परिवारी जन कि उनके घर लक्ष्मी आई है, जैसे जैसे शिक्षित और संस्कारित होती गई, वैदुष्य से परिपूर्ण सरस्वती की छवि तुम्हारे चेहरे से झलकती थी। कब सिखाया गया था तुम्हें कि अन्याय और अत्याचार के आगे सर झुका कर रहना, अगले की कहनी अनकहनी को मौन भाव से सुन लेना,परिवार के सदस्यों के साथ असभ्य और अभद्र व्यवहार,अशिष्ट आचरण और दुर्वचनों के प्रयोग पर मौन साध लेना पर तुमने सब सहा। मुंह सिले बैठी रहीं, चूं तक नहीं की और जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया तब भी चबाते स्वर में अपना मुंह खोला। मुंह खोलने के नतीजे ये हुए कि अगला सुधरना तो दूर, और अधिक बिफर गया क्योंकि उसकी पोल पट्टी जो खुल गई। फलस्वरूप जो घर के अन्दर घटता था, वह अब सार्वजनिक हो गया। तुम्हारी घर बचाने की हर कोशिश असफल हो गई। जानते हैं कि तुम जीवन से निराश हो गई हो, तुम्हारा ह्रदय विदीर्ण हैं, जो पिघले शीशे से कटु और तीखे शब्द तुम्हारे कानों में डाले गए हैं, उससे बहुत पीड़ित हो, तुम्हारे जीवन में दूर दूर तक आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती। तुम्हें अपना जीवन बोझ लगने लगा है। सामाजिक आक्षेपों से तुम बहुत विचलित हो। इतनी अधिक परेशान हो कि कभी कभी इस सबसे मुक्ति पाने को जीवन से ही मुक्त होने की सोच लेती हो। तुम कुछ कहो या न कहो, पर माता पिता को सब दिखता है, समझ आता है। बेचारगी और लाचारगी में भले मौन हों, कुछ नहीं कर पा रहे हों पर अपनी लाडली, अपनी परी के दुख से विचलित जरुर हैं। आज तुमसे कुछ बात करनी है बिटिया।
सुनो, तुम्हें पढा लिखा कर, आत्म निर्भर बना, तुम्हें जीवन साथी के साथ घर से विदा किया था इस आशा के साथ तुम सदा सुखी रहोगी, जीवन में थोड़े बहुत संघर्ष हर के जीवन में आते ही हैं, उन्हें झेलना ही होता है समझदारी और बहादुरी से इनका सामना करना ही होता है। जीवन में धूप छांव होती ही है, जब धूप से खूब तपते हैं तो छांव और सुखद लगती है। तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल हो, ऐसी ही कामना की थी, सदा सौभाग्यवती का आशीष सबसे पाया था तुमने पर भाग्य तो हमसे दो हाथ आगे चला करता है न, नियति के खेलों को भला कौन समझ पाया है आज तक। सोचते कुछ हैं लेकिन होता कुछ और है। ये सच है कि जीवन में एक अदद साथी बहुत ज़रूरी होता है पर यदि वह हमारे अनुकूल न हो या हम उसके अनुकूल न हों,
उसके जीवन में हमारी कोई जगह न हो, हम बात बात पे दुत्कारे, लतियाये जाते हों, सामने वाला अपने अहम में इतना अधिक आत्म मुग्ध हो कि अशिष्टता की सारी सीमाएं लांघ जाएं, स्वयं भू बन जाए, किसी का आदर सम्मान न कर सके, सबको भरे बाजार नंगा कर सकने की सामर्थ्य रखता हो, बात बात पर मुंह से अपशब्द झरते हों, जो चार लोगों के बीच तुम्हें और तुम्हारे परिवार को अपमानित और जलील करें, उससे दूरी बनाना ही उचित है। तुम लक्ष्मी सरस्वती ही क्यों बनी रहीं, नारी का एक रुप दुर्गा का भी है, पहले गलत व्यवहार पर ही रणचंडी बन जाना चाहिए था, अगले की हिम्मत तो देखो कि वह किसी का भी लिहाज़ नहीं करता। पर अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, जब जागो तब सबेरा। पत्थरों से मूड मारने से कोई फायदा नहीं, उल्टे खुद को ही चोट लगती है। विनती कर कर के खूब देख लिया, हाथ पैर खूब जोड़ लिए, क्षमा याचना खूब कर ली पर पत्थर नहीं पिघला तो नहीं पिघला। अब सुनो बेटी, पत्थर दिल कभी पिघला नहीं करते। अब अपना बचा खुचा साहस बटोर कर खड़ी हो जाओ, शिखर तक अकेले ही जाया जाता है, उसमें कोई साथ नहीं चला करता। अपने लक्ष्य खुद ही पूरे करने होते हैं। अपनी शक्ति को बटोरो, जीवन के विविध आयाम होते हैं, कुछ पन्ने काले होते है और कुछ ख़ाली भी छूट जाते हैं, उनकी क्षति पूर्ति अपने अन्य कामों में विस्तार लाकर करनी होती है। तो जो छूटा, उसका अफसोस मत करो, जो सामने है उस पर सारा फोकस रखो। कभी कभी चयन गलत भी हो जाते हैं, उनका ज़िंदगी भर अफसोस ही नहीं मनाया जाता, उन्हें छोड़ आगे बढ लिया जाता है। रास्ते में बहुत से लोग मिलते हैं, सब अपने तो नहीं हो जाते न। तो उन्हे उनके हाल पर छोड़ आगे बढ़ो। जीवन कभी रुका नहीं करता। एक साथ नहीं तो क्या, सच की इस लड़ाई में पूरी कायनात तुम्हारे साथ है, आगे बढ़ो, लक्ष्मी और सरस्वती तो जरुर बनो पर जहां जरूरी हो दुर्गा रुप धरो। यह भी उतना ही ज़रुरी है।
तो सदा खुश रहो बिटिया, स्वस्थ रहो और अपना लक्ष्य प्राप्त करो। माता पिता का आशीष तुम्हारे साथ सदैव है।
ध्यान रखना तुम बेचारी नहीं हो, तुम में संभावनाओं का अथाह सागर हिलोरें मार रहा है। सो अपने को सहेजो, समेटो और आगे बढ़ो, जो छूटा उसका दुख मनाने में ही ज़िंदगी मत बिता दो।
तुम्हारे जन्मदाता और पालक।
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