Wednesday, September 7, 2022

या विमुक्तये,

 सफ़र जारी है.....1050

08.09.2022

या विमुक्तये.............

शिक्षा की विद्यार्थी होने के कारण अनेक शिक्षाविदों के विचारों को पढ़ते, उनके द्वारा दी गई  अनेकानेक परिभाषाओं को रटते, उसका संकुचित और व्यापक अर्थ समझते , शिक्षा और विद्या में अंतर करते जो बात गहरे पैठी, जिसने झकझोरा, वह थी सा विद्या या विमुक्तये। अर्थात विद्या वह है जो हमें विमुक्त करती हैअनेक अंधविश्वासों, अनेक गलत मान्यताओं और बंधनों सी, तेरे मेरे के भाव की जगह वयम का भाव पोषती है, वसुधैव कुटुंबकम् का भाव पैदा करती है। इसीलिए उसे कल्पलता कहा जाता है। उसे सर्व धनं प्रधानम कहा गया क्योंकि न उसे कोई चुरा सकता है, न बांट सकता है, न ये वहन करने में भारी है, व्यय करने पर प्रतिदिन बढ़ता है। है न आश्चर्य कि दुनिया में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो खर्च करने पर भी कम न हो, बल्कि बढे। जी हां विद्या को जितना बांटोगे उतने ही अधिक ज्ञान से भरेपूरे हो जाओगे। विद्या विनय शील बनाती है। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते। व्यक्ति खाली हाथ और साधारण सा भले दिखता हो पर जब अपना मुख खोलता है, बोलना शुरू करता है तब सबको हतप्रभ कर देता है, अपने ज्ञान का लोहा मनवा लेता है। पावस ऋतु में ही तो कौए और कोयल की पहचान होती है देखने में तो दोनों काले ही हैं पर एक अपने मधुर बोलों से सबकी प्रिय बन जाती है, सराही जाती है और दूसरा अपनी कांव कांव के कारण दुरदुराया जाता है, उसका कर्कश स्वर और कांव कांव किसी को पसंद नहीं। ये अलग बात है श्राद्ध पक्ष में वे समादारित हो जाते हैं। पर कोयल हर समय अपने मधुर स्वर के कारण लोगों के दिलो में स्थान बनाए रहती है। आप अपने पाल्यो को निर्देशित करते हो....बच्चो जब अपना मुंह खोलो, तब तुम मीठी बोली बोलो, इससे तुम यश पाओगे, सबके प्यारे बन जाओगे।

हम सभी बड़ी बड़ी उपाधियों, डिप्लोमा,प्रमाणपत्र के साथ उच्च शिक्षित अवश्य हो गए हों पर विद्यावान तो नहीं ही हुए हैं। हमारा ज्ञान सूचनात्मक दृष्टि से भले ही विस्तार पा गया हो पर अभी गहरी समझ तो कम से कम विकसित नहीं हुई है। हम अपने दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। विनयी होता तो दूर, हम तो जितने उच्च शिक्षित होते जाते हैं, उतने ही अहंकारी और दंभी होते जाते हैं मैं ये मैं वो का भाव प्रधान होता जाता है। और मजे की बात तो यह है कि जिस अकूत संपदा, बढ़ते बैंक बैलेंस और बहुमंजिली इमारतों, विदेश में बसे स्वजनों की उपलब्धियों पर हम गर्वित होते मुदित होते हैं, उनमें से कुछ भी साथ नहीं जाता। जिंदगी भर  ऊहापोहों में पड़े रहते हैं, कंदुक से इधर से उधर ठोकर खाते रहते हैं, इसके उसके भले बुरे बनते हैं, इस उस की आलोचना में जीवन का महत्वपूर्ण समय निकाल देते हैं । आयु के भले से छः सात आठ दशक पार कर लें पर दिमाग से तो बच्चों जैसी मूर्खता ही करते रहते हैं। शैशव, बचपन, कैशोर्य, यौवन जीते प्रौढावस्था तक भले आ पहुंचे हो, पर व्यवहार में बचपना ही कर जाते हैं, बेबात की बात को इश्यू बना लेते हैं, जो गलत सलत मन में ठान लिया, उसे ऐसे या वैसे कर ही लेते हैं, पोल खुल गई तो माफी का घिघियाया स्वर अपना लेते हैं कि आगे सेऐसा नहीं करेंगे पर हमेशा ही वैसा करते हैं क्योंकि आपने मन से ही वैसा सोच रखा है, अगले से केवल ठप्पा मुहर लगवाने की नीयत जो होती है। अपनी शर्तों को इतना बड़ा और महत्वपूर्ण कर देखते हैं कि साथ वाला या तो हमेशा स्वीकारोक्ति देता रहे, सही गलत पर मुंडी हिलाता रहे और कहीं अगला भी अड़ियल निकल गया, अपनी समझदारी का परिचय दे दिया, आपको आपकी भाषा में समझा दिया तब कितने तिलमिला जाते हैं आप और दूसरे हि क्षण ऐसों को इस या उस बहाने से दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फैंकते हैं। और अकेलेपन का सुख उठाते हैं। अब बैचेनी इसलिए भी बढ़ जाती है कि अब कमजोर तो सामने है नहीं तो जोर किस पर आजमाएं, जो मन हर मन कुढ़ते भुनते रहते हो, उसकी भड़ास किस पर निकाले। बैठे रहो अपने खोल में लिपटे, किसी के पास इतना समय नहीं कि तुम्हारे झूठे अहम को पोषित करने उसे थपथपाने और दबदबाने को अपने जीवन को होम कर दे और तुम खाली बैठे मूंछों पर ताव देते रहो। हो ही नहीं तुम इस लायक कि किसी को अपनी जीवन में शामिल कर सको। बैठे रहो अपनी झूठी अकड़ में। तुम जैसे किसी को क्या बरबाद करेंगे, खुद को ही संभाले रहो, वही बड़ा काम है।

       विद्या तो प्रकाश का दीप जलाती है, अंधकार को दूर करती है, सच कहने का साहस देती है, बड़ा बनाती है, व्यवहार करना सिखाती है, छोटो को प्यार और बड़ो को आदर देना सिखाती है तो हम ने कौन सी शिक्षा ग्रहण की कि अभी तक इस सब को आचरण का विषय ही नहीं बना सके,। स्पष्ट और दो टूक कहना ही नहीं सीख सके, मार जलेबी की तरह बात को गोल गोल घुमाते रहे। काका कालेलकर की एक बात कि सत्य बोलने के श्रम नहीं करना पड़ता है, वह तो सहज स्वाभाविक होता है उसे सरल से सरल वाक्य में कहा जा सकता है, मन को बहुत भाती है, दिल के बहुत समीप है। सारी मुसीबत तो सत्य को असत्य बना कर बोलने में लगती है, सोच विचार कर गढ़ गढ़ कर बोलना पड़ता है क्योंकि आप कुछ छिपाना चाहते हैं। सत्य कहीं उद्घाटित न हो जाए तो तौल तौल कर बना बना कर अलंकार से भूषित कर बोलते हैं। सत्य तो प्रकाश सा दीप्त है, स्वयं सिद्ध और प्रमाणित है उसे क्या सिद्ध करना। सिद्ध तो झूठ को करना होता है, तथ्य जुटाने होते हैं, प्रमाण देने होते हैं। सत्य को तुम सात तहो में छिपा कर रखो वह फिर भी नहीं छिपता, सूर्य के प्रकाश सा प्रखर और दीप्त होता है।

  तो शिक्षित बल्कि कहें उच्च शिक्षित तो बहुत हो लिये, उसके बल पर आजीविका भी खोज ली, जीवन का एक तिहाई हिस्सा भी बीत गया, अब अंतिम पड़ाव पर तो विद्या के सा विमुक्तये भाव को आत्मसात कर लें, अपने ही बनाए कटघरों के बंधन से मुक्त हो जाए, बहुत कर लिया मेरा तेरा, अब तो वसुधा को कुटुम्बवत मानने का समय है, अपनी सारी अकड़ और दंभ से, आग्रहों दुराग्रहों पूर्वाग्रहों से मुक्ति का क्षण है। अब भी नहीं चेते, सा विद्या या विमुक्तये के भाव से पोषित नहीं हो सके तो हाथ मलने और पछताने के सिवा और कुछ बाकी नहीं रहेगा। सो जागो जागो और जागो भाई। बीती जाती रैना है।

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