23.09.2022
राम जी की निकली सवारी.......
जब जब ये पैंसठ संख्या आती है, सफ़र की माला में एक सुमेरू और टंग जाता है। 365 की पूर्ति के बाद चार सौ, पांच सौ, छः सौ, सात सौ, आठ सौ, नौ सौ और अब एक हजार पैंसठ का क्रम आ पहुंचा है। ये क्रम तो जब तक जीवन तब तक है फिर भी एक और अध्याय की समाप्ति बड़ा सुकून देती है। मन में संतोष उपजता है कि चलो जो व्रत लिया, वह अब तक तो निभ गया। आगे की राम जाने। राम जी की मर्जी, जब तक चाहें लिखाएं। हम तो लिखवैया हैं, जो लिखाएंगे सो ही लिखेंगे। मानस रचनाकार की भांति हम भी उनके दरबार में अपनी पोथी रख देंगे चाहे सही का निशान लगाओ या सब काट पीट के रख दो। हमारा अपना क्या है,प्रसंग और संदर्भ आप रच देते हो, वीणा पाणी स्वयं अंगुलियों के पोरों पे आ विराजती है, वरना हम जैसे दलिद्रियों का साहस कहां जो दो हरूफ भी ढंग से लिख सकें। सब राम जी की माया है।
उत्तर भारत में आगरा की राम बारात बड़ी मशहूर है। सालाना आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी को श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के स्वरूपों की झांकी नगर भ्रमण करती भोर में जनकपुरी पहुंचती है। जनकपुरी सजने का सौभाग्य सालाना एक विशेष क्षेत्र को मिलता है । अयोध्या भी तैयार की जाती है। जनक महल की शोभा बहुत दर्शनीय होती है। पूरा शहर राम जानकी मय हो जाता है। भगवान राम और जगतजननी के विवाह का उल्लास हर छोटे बड़े के चेहरे पर परिलक्षित होता है। तुलसी और सालिग्राम का विवाह संपन्न होता है। तीन दिन तक पूरे शहर में स्थान स्थान पर भक्तिमय आयोजन होते हैं। राम विवाह के माध्यम से कितने सार्थक सन्देश समाज में पहुंच जाते हैं। जनक और सुनयना के साक्षात स्वरूप धारण किए व्यक्तित्व मां सीता की विदाई पर भाव विह्वल हो जाते हैं। राम सिया के चरित्र तो सदैव अनुकरणीय थे, हैं और रहेंगे।
राम जी के ब्याह का शुभ मुहूर्त आ गया है, बड़े बड़े पराकमी राजा पधारे सीता स्वयंवर में पर शिव जी के धनुष को तोड़ना तो दूर, कोई हिला तक नहीं सका , किसी से धनुष सरका तक नहीं और हमारे राम जी ने हाल ही धनुष तोड़ डाला, प्रत्यंचा चढ़ा दी और सब जगह राम के ब्याह की धूम मच गई। अयोध्या में घर घर बधाई बजने लगी, लगन आई हरे हरे का शोर मच गया, बाबा ताऊ चाचा पिता सब सज गए, सबरी बारात सज गई और रघुनंदन तो ऐसे सज गए जैसे श्री भगवान, लगन आई हरे हरे मेरे अंगना। जनक नंदिनी गौरा पूजन को चली। उनके मन में भारी उछाह है। जनक दुलारी विदा हो रही है, विदा करते विदेह जनक भी मोहग्रस्त हो गए हैं। बेटी को बहुत सी सीख दी पर एक बात बार बार समझाते रहे "पुत्री पवित्र किए कुल दोऊ और जगत जननी सीता ने इसे आंचल के छोर में कस के बांध लिया। कैसी भी विपत्ति कठिनाइयां आई पर यह सूत्र हाथ से छूटा नहीं, जो वचन पिता को दिया, उसे जीवन भर निभाया।
माता कैकई ने राजा दशरथ से राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा था, उसमें सीता का कहीं प्रावधान नहीं था, सीता की कोई विवशता भी नहीं थी कि वे राम के संग वनवास जाएं। उन्हें किसी ने बलपूर्वक भेजा भी नहीं। सभी माताओं ने उन्हें रोकने का भरसक प्रयत्न किया, राजा दशरथ ने भी सुमंत्र से यही अपेक्षा की थी कि बस कुछ देर घुमा कर ले आना, स्वयं राम ने समझाया कि सुकुमारी ,वन में हिंसक जानवर होंगे तुम यही रहो और माताओं की सेवा करो पर सीता ने स्पष्ट कह दिया जहां मेरे पति हैं वहीं मेरा स्थान है, वहीं मेरा सुख है। वे विवाह का अर्थ समझती हैं, सप्त पदी और अग्नि के इर्द गिर्द लिए फेरों का अर्थ बखूबी समझती हैं । राजा जनक जैसा संपन्न भला कौन था, वे राम के वन जाने पर अपनी लाडली को अपने राज महल में सुख पूर्वक रख सकते थे, वे उसे अयोध्या से ले जा सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। उल्टे सीता को ही सीख दी बेटी सुख हो दुख हो, अब तुम्हारा निभाव वहीं है। पर नहीं उन्होंने बेटी के घर में कोई दखल नहीं दिया।उल्टा ये ही समझाया कि बेटी तुम्हारा सुख वहीं है, जहां तुम्हारे पति हैं। सीता दोनों कुलो की लाज रखती हैं, वे कुलवधु हैं, अपने से बड़ों से लाज करती हैं। वन पथ पर चलते ग्रामवासियों के पूछने पर अपने पति और देवर का नाम नहीं लेती, संकेत से आंखो के संकेत से ही बता देती हैं। गंगा पार करते केवट को देने के लिए मुंदरी स्वयं उतार लेती हैं, राम को कहने की जरूरत नहीं पड़ती। वे अपने धर्म को जानती हैं। देवर कौशल्या से पुत्रवत स्नेह करती हैं। सासु कौशल्या, सुमित्रा और कैकई को माता का सा मान देती हैं।
रावण साधु का वेश धर अपहरण कर लेता है तो मार्ग में अपने गहने डालती जाती हैं कि जब मेरे स्वामी खोजते हुए आऐंगे तो उन्हे इनके ब्याज से कुछ ज्ञात हो सकेगा। रावण की लंका में रहते अपने सतीत्व को सुरक्षित रखती हैं, तिनके की ओट से रावण को जता देती हैं कि मेरे स्वामी के आगे तेरी सारी शक्तियां क्षीण हैं। प्रजा के सामान्य जन के कहने पर अग्नि परीक्षा देने को तैयार हो जाती है। गर्भवती सीता वन में रहते लव कुश को समर्थ बनाती हैं, उनका चरित्र सदैव अनुकरणीय है, रहेगा। आज भी बेटियों को सीता सावित्री बनने का ही आशीष दिया जाता है।
आज जब तेजी से विवाह जैसी पवित्र संस्था टूटने के कगार पर है, उसे समझौता मान लिया गया है कि जब चाहे उसे तोड़ा जोड़ा जा सकता है, विवाह विच्छेद का प्रतिशत बढ़ रहा है, विवाह दो व्यक्तियों के मध्य सिमट कर रह गया है। अब विवाह में दो कुल दो परिवार के बीच रिश्ते नहीं जुड़ते, बस जैसे भी हो बस लड़की वाले केवल लड़के को देखते हैं। वे मान कर चलते हैं कि हमें औरों से क्या लेना देना, बस जमाई से मतलब है। ऐसी विकट स्थितियों में फिर विवाह जैसे पवित्र बंधन के संदर्भ राम सिया विवाह के ब्याज से दोहराए जाने जरुरी है। ये केवल राम और सीता का ब्याह ही नहीं है, अयोध्या और जनकपुरी का संबंध है। हम पुत्रियां दोनों कुल की लाज बनाए रखें, इसी में सब की भलाई है। ये विवाह है विवाह, गुड्डे गुड़िया का खेल नहीं कि आज संबंध जोड़ा और कल पसंद न आया तो ग्रंथि बंधन तोड़ अलग हो गए, अपनी अपनी राह चल दिए। बहुत हुआ, अब भी सुधर जाओ। नहीं तो पतन की खाई बहुत गहरी है, उसमें से निकलना आसान नहीं होगा। जय श्री राम, बना दो बिगड़े काम। राम जी की निकली सवारी, राम जी की महिमा है न्यारी।
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