सफ़र जारी है ........1082
04.10.2022
कहो मगर सबूर से.....
अब हुड़क तो हुड़क है,कभी भी उठ सकती है, उसका कोई सेट टाइम थोड़े ही होता है। किसी को अपने लोगों से मिलने की हुड़क उठती है तो किसी को घूमने की और किसी किसी को तो खूब जली कटी,तीखी, कड़वी, तीती सुनाने की हुड़क उठ आती है फिर तो लगता है जितना मन का कलुश है सब अभी का अभी कह डालो, फिर जाने समय मिले न मिले, वैसे भी उठी पैंठ आठवें दिन लगा करती है तो मत चूके चौहान। अरे भाई, कहो और जरुर कहो नहीं कहोगे तो पेट में गुडगुड़ होती रहेगी, पाचन शक्ति तो वैसे ही कमजोर है तुम्हारी, मंदाग्नि रोग के शिकार हो, वैसे ही भोजन नहीं पचता तो मर्जी जितना खा लो, शरीर को तो लगता नहीं, बस सावन सूखे न भादों हरे की तरह सुई का कांटा एक ही जगह अटक गया है, सो कहो और जरुर कहो पर इतना तो निश्चित करना ज़रूरी है कि कहना किससे है, किस मंच पर कहना है और सबसे बड़ी बात कैसे कहना है।
ये तीन बातें तो संप्रेषण का पाठ पढ़ाते बहुत पहले ही सिखा दी जाती हैं। जो कहना है ,उसे शब्दों में अच्छी तरह बांध लो, बार बार बिखरो मत, एक ही बात की पुनरावृत्ति मत करो। फिर ये भी देखो यदि बात न्याय की है तो उसे लक्षणा और व्यंजना में क्यों कहना, सीधे सीधे अभिधा में कहो न, जिससे शिकायत है उससे कहो न, औरों के आगे कह कर किसकी कमी बता रहे हो, किसकी गलतियों को इंगित कर रहे हो, तुम भी तो इसी व्यवस्था के अनिवार्य अंग हो तो अपने को कैसे विलग कर सकते हो। ध्यान रखना बंधु, जब एक अंगुली किसी की ओर उठती हैं तो बाकी की तीन हमारी ओर ही संकेत कर रही होती हैं। अरे आगे बढ कर व्यवस्था संभालो न, दूर बैठे बैठे पानी में कंकड़ मारना , पानी की तरंगों को आलोचित करना, उसकी गंदगी के वीडियो बना इधर उधर वायरल करना बाहरी व्यक्तियो का काम है, अपनों को ये सब शोभा देता भी नहीं, बस अपनो से तो सहयोग की अपेक्षा होती है। जो छोटा सा बेमालूम सा खौंता, छेद तुम्हें नज़र आ रहा है उसे वहीं की वहीं रफू कर देना ज़रूरी है बनस्पत अंगुली डाल डाल के उसे और बड़ा करते जाना। अपने लोग तो सहायक हुआ करते हैं, वे चीथड़े नहीं बिखेरा करते।
बात कहने का तरीका भी होता है कोई, शब्द बड़े कीमती और मूल्यवान हुआ करते हैं, उन्हें यूं ही जाया नहीं किया जाता। तो कहने सुनने के तरीके, तमीज, सबूर सीखना भी ज़रूरी ही नहीं, बहुत ज़रूरी होता है। हर व्यक्ति अपने मतलब का अर्थ ग्रहण कर ही लेता है पर जो अभ्यागत होते हैं, अतिथि होते हैं, कुछ समय विशेष के लिए हमारे मेहमान होते हैं, उनका भला इन सब से क्या लेना देना। आपसी मतभेद आपस में ही सुलझाने उचित होते हैं। और साथ काम करते किस की जागीरें बंटा करती है भला, कुछ दिनों का साथ है, कुछ दूर साथ चले चलना है फिर सब के मोड़ अलग अलग हो जाते हैं। तो संस्थाएं प्रमुख हुआ करती हैं, व्यक्ति और पद तो आते जाते रहते हैं तो ये अहंकार तो बिलकुल लाओ ही मत कि मैं ये मैं वो। कल सबका अंत एक सा ही होना है।
कहना सुनना तो लगा रहेगा पर जो शब्दों के गहरे तीर चला दिए गए हैं, वे वापिस लौटने से रहे। अब तो तीर म्यान से निकल चुका है। बस अब तो उन शब्दों के प्रभाव देखो बैठे बैठे। बोलते समय इंसान इतना भी याद नहीं रख पाता कि शब्द संभाल के बोलिए शब्द के हाथ न पांव, एक शब्द औषध बने एक शब्द करे घाब रे। तो कहो सुनो जरुर , जब बात पेट में नहीं पच रही हो उगलो जरुर,कहने सुनाने की हुड़क उठे तो कहो जरुर, चार नहीं दस सुनाओ, बस कहने की तमीज और सबूर सीखना बहुत ज़रूरी है नहीं तो जो रायता फैल जाता है, बिखर जाता है, हाल ही सिमटने में नहीं आता। सो कहते रहिए सुनते रहिए, कम से कम सूमसाम तो नहीं है, चहल पहल जारी है और इसलिए सफर जारी है जनाब।
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