Thursday, April 28, 2022

जमानो आयो कउअन को

 सफर जारी है....844

11.02.2022

ब्रज में एक लोकगीत बहुत प्रचलित है गयो गयो री सास तेरो राजु जमानो आयो बहुअन को।हर बहु यह गीत गाती है और सास की पदवी पाते नई बहुरिया इस परंपरा को हाथों 

हाथ ले लेती है। इस चक्र के बीच एक वर्ग ऐसा भी होता है जो सासु के राज में तो पिसता ही है, फिर जब नई पीढ़ी आती है तो उसका शासन चलता है अर्थात वे न तीन में होते हैं न तेरह में, उनकी पौ कभी बारह नहीं होती,उनके दोनों हाथों में लड्डू तो दूर की बात, चिनौरी का एक दाना तक नहीं होता।दरअसल उनका कोई आत्म सम्मान ही नहीं होता, पहले वे इसलिए दबती हैं कि सब उनसे बड़े हैं और बाद में जमाना बदल जाता है तो वे फिर से निचले पायदान पर आ जाती है ।अब उन्हें नए बॉस का हुक्म बजाना होता है नहीं तो घर में रोज चकल्लस होती है।यानी उनकी गद्दी मिलने से पहले ही छिन जाती है।

पर मुद्दे की बात तो  यह है ये राज करने की बात हो ही क्यों, सब अपने अपने परिवार में राज करें, कोई किसी पर शासन करे ही क्यों, तुमने अपने परिवार को एक और नेक बनाया तो अगला अपने परिवार को नेक और एक बनाएगा।तुम्हारे दखल की कोई जरूरत ही नहीं है।मुसीबत तो यहीं से शुरू होती है जब व्यक्ति सब जगह खुद को प्रत्यारोपित करता है।सब अपने अपने घर के राजा हो।किसी दूसरे पर अपना मत थोपो और दूसरे को अपने ऊपर मत थोपने दो।सब अपने अपने रास्ते चलते रह सकते हैं। टकराव तो तब होता है जब पगडंडी संकरी हो औऱ दो तीन लोग उस पर एक साथ चलने की जिद ठाने बैठे हों तो टकराब होगा ही। 

एक समय होता है जब आप मुखिया होते हैं। फिर समय बदलता है अगला अपने घर का मुखिया होता है तो वहां दखलंदाजी करना उचित नहीं।सबको अपने अपने समय का आनन्द लेने दीजिये और जो स्वतंत्रता आपको जिस किसी भी कारण से नहीं मिल सकी हो, उसे दूसरे के लिए प्रतिबंधित मत कीजिये कि अरे हमारे समय तो ऐसा होता था वैसा होता था।वह उस समय का सच था यह आज का सच हैIन कोई तब गलत था न अब सही है। 

कभी कभी समानांतर चलना भी सुखद होता है कोशिश करें कि दो लाइनें एक दूसरे को न काटें।न सास के राज को जाने की जरूरत है और न बहुओं के राज को आने की।इस गीत पर ही बैन लग जाना चाहिए ....गयो गयो री सास तेरो राजु जमानो आयो बहुअन को, गयो गयो रे बाप तेरो राज जमानो आयो बेटन को।अपने अपने समय में सब को राज करने का अधिकार है।समय सबका आता है।रामचन्द्र तो बहुत पहले ही सिया से कह गए थे कि ऐसा कलियुग आएगा, हंस चुगेगा दाना दुग का कौआ मोती खायेगा।तो ये बदलाब तो होते ही रहते हैं, कभी हंसों का राज होता है तो कभी कौओं का।कौओं के राज में हंसो को कौओं की अधीनता स्वीकार करनी होती है, उनकी खुराफातों को नजर अंदाज करना होता है, गलत पर भी सही का टिक लगाना होता है, सच कौड़ियों के मोल बिकता है और झूठों की पौ बारह होती है।समय का फेर है, सब सहना पड़ता है, मन मार कर रहना पड़ता है।रहीम ऐसे थोड़े ही लिख गये कि रहिमन चुप ह्वे बैठिए देख दिनन को फेर, जब नीके दिन आएं हैं बनत न लागे देर।तो मूर्खों की सभा में चुप बैठना ही श्रेयस्कर है।

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये, राधे श्याम राधे श्याम राधे श्याम कहिये।तो जब कउअन को राज होय तो चन्दना ए चुप ई बैठ जानो चहिए तो चन्दना तो चुप ई है।

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