Wednesday, April 27, 2022

चेरि छाँड़ि भयहु का रानी

 सफर जारी है....843

10.02.2022

चौरीं, काम ते निच्चू नाय भई अबहि तक, आज नेक जन्दी जन्दी हाथ चला लेती,नेक कम कर लेती, बलाय देर है गई, फिर निरी देर लैंन में ठाडो होनो परेगो, कमर पिरा जात है ठाड़े ठाड़े।अब चली चलबेगि सीना।रामदेई हमेसा की नाई दरबज्जे ते ई बड़बड़ाती घुसी और निगुनिया को चौका में ते बाहर खींच लाई।अब निगुनिया के घर गिरिस्थी के काम ही नहीं निबटते, बलाय सबेरे बिस्तर छोड़ देती है पर घर के काम सिलटते ई नहीं।सिलटे भी कैसे, हाथ बंटाने वाला कोई नहीं, सब को अपनी जगह बिस्तर पर अपने ठीया पर सब कुछ चाहिए होता है।अब निगुनिया कोई अष्टभुजा तो है नहीं फिर भी अपनी सी बहुत जल्दी जल्दी काम निबटाती है पर काम है कि सुरसा की तरह मुंह बढ़ाता ही जाता है।तो निगुनिया वैसे ही बहुत चिढ़ी बैठी थी और रामदेई ने आकर मानो उसके गुस्से को हवा दे दी।फिर भी रामदेई को आसन दे पानी पत्ता दे कहने लगी.... अब जिज्जी पूरो घर वोट डारिबे गयो तो है ,हों न जा रई, बहुतेरों काम बिखरो पड़ो है जाय सिलटाऊ कि बेबात के वोट ए देबे जाओ, इतने दे रये है, एक हमाये वोट ते का है जायेगो।हम तो जही भले।हमें का मतबल कि को जीतेगो, हमाये जाने तो सब एक से ही है।चाए साइकिल वालो होय चाए फूल वालो।और तुमऊ कहू मत जाओ, बैठो चैन ते मन होय तो लोटपीट लेओ, अबहि खटिया डाल देत हू।

     निगुनिया ठहरी अपढ़, उसे क्या पता कि उसके एक वोट की क्या कीमत है।भला वह जानेगी भी कैसे, अपने घर में उसकी राय उसकी किसी बात का उसके मत को जब हवा में उड़ा दिया जाता है, उसकी बात को हवा में उड़ा दिया जाता है, गम्भीर से गम्भीर और गहरी से गहरी बात हंसी ठठ्ठे में उड़ा दी जाती है तो वह कैसे जानेगी कि उसके एक वोट से कमल या साइकिल जीत सकती है।रामदेई चार लोगों में उठती बैठती है, टीचर दीदी की बात ध्यान से सुनती है कि हर व्यक्ति को वोट देने जरूर जाना चाहिए, उसके एक वोट की बहुत कीमत होती है।टीचर दीदी ने समझाया था देखो यदि तुम्हारे पास निन्यानबे पैसे हैं और जो तुम्हें खरीदना है वह पूरे एक रूपये में आता है तो एक पैसे की कमी से आप अपनी मनचाही वस्तु नहीं खरीद सकते, आपका एक पैसा ही मिलकर सौ पैसा बनता है।तो आप में से हर व्यक्ति एक एक पैसे जैसा है जिसे मिलकर सौ की संख्या पूरी होती है।अब रामदे ई तो समझ गई पर निगुनिया की समझ में कैसे भरे कि उसके एक वोट की क्या कीमत है।उसकी दुनिया घर का चौखटा है उससे बाहर क्या होता है उसे जानने की जरूरत नहीं।

     पर रामदेई तो आज सोच के पक्का फैसला कर के निकली है जैसे भी हो निगुनिया को साथ लेकर चलना है।उसके कानों की ठेक हटाने का प्रण लेकर आई है रामदेई।जानती है यहां उसकी दाल गलने वाली नहीं, टीचर दीदी आई थी दो चार बार बात करने, घर की महिलाओं तक अपनी बात पहुंचाने पर द्वार पे बैठे चौधरी ने उन्हें बाहर से बाहर यह कह कर टरका दिया कि हमारे घर में दखल देने की जरूरत नहीं, अपना ज्ञान अपने तक रखो।टीचर दीदी हार मान कर लौट गईं पर रामदेई तो अड़ियल किस्म की औरत है।जो सोच लेती है उसे कर के ही दम लेती है।और आज तो वह प्रण लेकर निकली है कि निगुनिया का ब्रेन वाश करना ही है।आज उसके तरकस में हर काट का तीर है।आज तो वो निगुनिया को साथ लेकर ही टलेगी।आज चौधरी सहित सारे मर्द वोट डालने जो निकल गए हैं, बच्चों के लिए जे मेला तमाशा सा है सो वे अपने दोस्तों संग मगन है और बेचारी निगुनिया को अपने चौके चूल्हे से ही फुर्सत नहीं, उसकी तो वही दुनिया है कि सुबह कलेऊ में क्या बनेगा, दुपहरी में क्या खाया जाएगा, संझा को जब चौधरी के द्वार पर जमघट लगेगा तो गर्मागर्म चाय पकौड़े तलने होंगे, फिर रात के खाने का लग्गा लगाना होगा।फिर सब के लत्ते कपड़े धोएगी, साफ सफैयत करेगी और तो सब राजकुमार की माफिक आराम फरमाते रहेंगे, मनोरंजन करेंगे,उन्हें इन सब की आदत जोपड़ गई है।निगुनिया है न इस सबके लिए, उसकी फुलबारी है तो और कौन सींचेगा।खुद बेचारी तो मशीन बन कर रह गई है।आज रामदेई जीजी उसकी क्लास लेने वाली हैं, एक वही है जिसकी बातें हर बार उसके मन में तूफान सा मचा देती हैं।उसे सोचने को विवश कर देती हैं कि उसका अपना भी कोई अस्तित्व है, उसे अपने लिए भी आवाज बुलन्द करनी होगी।और आज तो मतदान का सवाल है।ये रामदेई जाने कहाँ देश समाज के चिठ्ठे खोल कर बैठ जाती हैं, अरे यहां तो रोज के काम ही नहीं सिलटते, अभी तो पास पड़ौस तक नहीं देखा समाज और देश दुनिया की बात निगुनिया क्या जाने, उसका संसार तो ghr की चारदीवारी के अंदर ही है।सो उसने साफ साफ शब्दों में रामदेई को जबाब दे दिया है जिज्जी हम का कारिंगे वोट सोट देके,  हमारये एक वोट से कछु नहीं होने का,हम तो मन्थरा की नाई दासी ही भली ,कोऊ जीते कोऊ हारे हमें कौन रानी बननो है, हमें तो ऐसेइ रोटी पोनी है, घर को काम सिलटानो है,सो हमें तो बख़्श देयो जिज्जी।पर रामदेई कौन कच्ची गोली खेली है।सो कहानी सुनाने लगती है कि एक कुआ ए दूध से भरनो हतो तब जाके गांव की बिपत दूर होती, साधु कह ग्यो कि सब एक एक लोटा दूध डाल दीयो पर सबन ने सोची की इतने लोग डालींगे ई तो हम तो एक लोटा पानी डाल आबिन्गे काऊ ए का पतो चलेगो सबरे तो दूध कुरे ई रये हैं, अब जेई बात सबरे गांव वाले सोच रये तो रात के नीम अंधेरा में जो जाए सो एक लोटा पानी कुरे आये, खैर भैया भोर भई साधु समेत सबरे आये तो देखी कि कुआ में निरो पानी ही पानी है, दूध को तो नामोनिशान ऊ नाय।

     सो निगुनिया जैसे तू सोच रई है ऐसे ई सबरे सोचिबे लगे कि हमाये वोट डालने से का होयगो तो तो चल ग्यो देस, बन गई सरकार, जित ग्यो कमल को फूल।सो बाबरी मत बने।सब काम बाम छोड़,और चली चल वोट देबे, कोऊ टैम नाय लगेगो, बस तू तो घर ते तो निकल, वहां बूथ पे टीचर दीदी खड़ी हैं पच्ची ले के, हाल आजागे डाल के, बस तू चली चल।लग रहा है निगुनिया पर वार सही बैठा है, वह नई धोती बदल रई है चलने कू।तो जब जड़बुद्धि निगुनिया समझ गई तो तुम नाय मानोगे का हमाई रामदेई की बात, सबरे जरूर ते जइयो वोट डारिबे कू।अपनो वोट बेकार मती करियो ,भली।

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