सफर जारी है....929
07.05.2022
किसी परिवार में जन्म लेना ,माता पिता के लाड़ और सहोदरों के बीच पलना बढ़ा होना औऱ तीसरा पन आते आते माता पिता भाई बहिनों से एक एक कर बिछड़ते जाना बहुत सालता है, जो अभी इस भौतिक संसार में हैं ,उनसे भी मिलना नहीं हो पाता ।कहीं भौगोलिक दूरी आड़े आ जाती है तो कहीं मनों में खिंचाब पैदा हो जाता है । दूसरे घर की सदस्यता लेते ही आप की भूमिका में परिवर्तन आ जाता है। आप किसी घर के लाडले सदस्य पापा की परी और माँ के आंचल तले लुका छिपी खेलने वानी छोटी गुड़िया ही नहीं रह जाते, भैया और दीदी की छुटकी से अलग आपका अस्तित्व गहराता है।आपकी निजता, आपकी अस्मिता नए परिवार के साथ बंध जाती है. आपकी भूमिका में बदलाब आता है। नए परिवार के प्रति दायित्व शील हो जाते हैं,आपकी जीवन डोर बिल्कुल अनजान एक नये से परिवार से जुड़ जाती है ,अपनों के दायरे में कुछ नये अपने जुड़ते जाते हैं,परिकर में विस्तार होता है पर जन्मदाता परिवार की जड़ों से आप कटते नहीं है बल्कि दोनों को बराबर खाद पानी देने की कोशिश में लगे रहते हैं। वे मन में गहरे धंसे होते हैं तो हमेशा दिल में बसे ही रहते हैं फिर भले ही गाहे बगाहे ही मिलना क्यों न हो।
ये अलग बात है कि अपने को यहां वहां की व्यस्तताओं में फंसाये हम उन भावों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते।उन हवाओं को अपने आसपास भी फटकने नहीं देते जो उन भूले बिसरे दिनों की याद दिलाये जिन्हें हमने कहीं गहराईयों में गाड़ रखा है, ऐसे सीलन भरे कोनों में छिपा दिया है कि वहीँ सब गल सड़ जाए ताकि उचित हवा पानी धूप मिलते वे रक्त संबंध ,वे सहोदर भाव ,वे बचपन में खेल खेल में रूठना मटकना औऱ फिर सारे गिले शिकवे भूल गले लग जाना जैसे दबे छिपे भाव अपना सिर न उठाने लगे। फिर तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी.और जो कहीं ऐसा हो गया तो ये छितराये से भाव सारे रिश्तों पर भारी पड़ जाएंगे, इनकी अवधि लंबी तो है ही साथ ही गहरी भी है। फिर तो बड़ी आफत मच जाएगी. बड़ी उलझनें पैदा हो जाएगी,डर है कि नये रिश्तों में कहीं खिंचाब न आ जाये ,कहीं रस्सा कसी न होने लगे । तो बेहतर है जो जहां हैं उसे वहीं बने रहने दिया जाए हैं ,जैसा चल रहा है चलने दें। यथास्थिति बनी रहने दी जाए.
पर सोचो और खूब सोचो, गहराई से सोचो, दिमाग लगाओ कि घर तुम्हारे अकेले का थोड़े ही छूटा है ।अगले को भी नया परिवार मिला है, तो उसे भी नए माहौल में सामनजस्य बिठाना होगा, उसे भी अपना विगत एक किनारे कर नये रिश्तों में रचना पचना सीखना होगा।नये को याद करना होगा, पुराने को भुलाना होगा. तभी तो बात बनेगी, तभी तो नया परिवार बनेगा, तभी तो रिश्ते गहरे होंगे, उनमें मजबूती आएगी, रंग निखर कर आएगा, तभी तो आपसी सौमनस्य बढ़ेगा, तभी तो गाड़ी आगे बढ़ पाएगी.तो सबको अपने अपने सम्बन्धों के सम्बन्धियों के विषय में सोचना ही होगा,तभी तो गाड़ी आगे बढ़ पाएगी।
तो मिल बैठ कर रास्ते निकलते हैं ।यूं मुँह फुलाये बैठे रहने से कुछ नहीं होने वाला।अरे लड़ कौन रहा है भाई, बात कही जा रही है और बात कहने का अधिकार तो सबके पास है।ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला है।तो सबमें रचो बसो जरूर पर अपने उस बाग को भी झांक कर देखना, उसकी देखभाल करना, उसे दबाई दारू दिलवा कर,उसके सुख दुख पूछकर, जो बन सके सहयोग कर आप कोई अहसान नहीं थोप रहे होते हो, बल्कि अपने भूले बिसरे कर्तव्यों को ही निभा रहे होते हो।इसके लिए तुम्हारी प्रतिबद्धता होना बहुत जरूरी है।इन छोटे छोटे कामो से काम को कर आप अपने जिम्मेदारी का ही निर्वाह कर रहे होते हो।तो जो अपने हैं उन्हें भुला बिसरा मत दो, जो भुला दिए गए हैं ,उनकी खोज खबर लो,उनके पास जाओ, उनसे बोलो बतराओ ।जरा याद करो तुम उनको जो तुम्हारे ही हैं पर वक्त की धूल ने उन्हें भुला बिसरा दिया है।मन पछ्तैहै अवसर बीते न हो जाये कहीं।
No comments:
Post a Comment